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आत्मस्वीकार

क्या कहा उसे जो कहना था, 
अनकहा रहा, जो कहना था, 
नाहक़ तूँ ताली पीट रहा, 
वह कोसों पीछे छूट गया, 
जिसको मुट्ठी में गहना था . . .
 
मैं कवि हूँ, मेरी मर्यादा है, 
यह लिखा पत्र तो सादा है, 
बुद्धि भला हृदयों का दुःख
किस सीमा तक कह सकती है, 
क्या कहीं क़लम की स्याही भी, 
अश्रु बनकर बह सकती है? 
 
पर कवि होने का अहंकार, 
असमर्थता पर करता प्रहार, 
अनकहा लिखूँ इस कोशिश में, 
रंगता काग़ज़ मैं बार-बार, 
बना लेखनी को पतवार, 
बुद्धि-नाव पर हो सवार, 
चला थाहने हृदय-सिंधु को, 
जिसका कहीं आर न पार॥

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टिप्पणियाँ

shaily 2022/01/31 02:04 PM

वाह, बहुत सुन्दर

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