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अब आलिंगन न होगा . . . 

पाषाण हुआ है हृदय प्रिये! अब आलिंगन न होगा . . .
 
चुम्बन के सारे अर्थ मिटे, 
आँसू बन सारे सुमन लुटे, 
आँधी आयी प्रणय-तरु में, 
प्रिय, नीड़ गमन न होगा . . . 
पाषाण हुआ है हृदय प्रिये! अब आलिंगन न होगा . . . 
 
निष्फल हो गई प्राण प्रतिष्ठा, 
खोयी श्रृद्धा, सोई निष्ठा, 
खंडित मूरत के दर्शन को, 
प्रिय, मंदिर गमन न होगा॥
पाषाण हुआ है हृदय प्रिये! अब आलिंगन न होगा . . .
 
विस्मृत हो गयीं तेरी बातें, 
साथ गुज़ारी दिन व रातें, 
अब मन के इस बंजर में, 
प्रिय, कोई सुमन न होगा . . . 
पाषाण हुआ है हृदय प्रिये! अब आलिंगन न होगा . . . 

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