अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

माँ का भोज

 

कॉलोनी में नवरात्रि की बड़ी धूम है, मंदिर के बाज़ू में दुर्गा जी की स्थापना हुई है। रोज़ रात आरती के बाद तरह तरह के आयोजन होते हैं, एक दिन ऑर्केस्ट्रा, दूसरे दिन बच्चों की प्रतियोगिताएँ, तीसरे दिन महिलाओं का फ़ैशन शो। शालू इतनी भव्यता देखकर अभिभूत है। उसके छोटे से शहर में तो छोटे–छोटे पंडालों में दुर्गा जी की मूर्ति होती है जहाँ रोज़ रात कभी महल्ले की महिलाएँ तो कभी भजन मंडली भजन सुनाती हैं। नौ दिन सारा क़स्बा भक्ति भाव में डूबा रहता है। 

पति का तबादला हुआ और दोनों को इंदौर आना पड़ा। पति की इच्छा थी अच्छी कॉलोनी में घर लिया जाए तो शहर की इस वृंदावन वाटिका में किराए से घर ले लिया। यहाँ ज़्यादातर बिज़नेस मैन हैं। शालू थोड़ा असहज तो महसूस करती है पर सोचती है ठीक भी है ऐसे ही तो सीखने मिलता है। 

कन्या भोज को लेकर वह बहुत परेशान हुई। परिवार में हर साल कन्या भोज की परंपरा है, उसे यहाँ भी इस रीत को निभाना था। उसे लगा यहाँ तो बहुत सी बच्चियाँ हैं तो परेशानी नहीं होगी। सप्तमी के दिन उसने पड़ोसन से चर्चा की तो पता चला की यहाँ कोई अपनी बच्चियों को नहीं भेजता भोज में। कारण? मालूम नहीं। बस यहाँ ऐसा ही है। पड़ोसन ने कहा। 

शालू अब चिंता में कि क्या करें? सासू माँ से पूछकर उसने सारी तैयारी कर ली है। अब नौ कन्याएँ कहाँ से लाए? इसी उधेड़बुन में अष्टमी की रात आ गई। 

दुर्गा पंडाल में कार्यक्रम चल रहा है। कॉलोनी की बुज़ुर्ग महिलाएँ एक कोने में बैठे उकता रही हैं। आधुनिकता से भरे हुए इस तरह के आयोजन बुज़ुर्गों को पसंद नहीं आते। वो चाहते हैं भजन संध्या हो, माता की चौकी हो, पर उनकी सुनता कौन है। चूँकि घर पर खाना बनता नहीं इसलिए उन्हें भी खाना खाने यहाँ आना पड़ता है। पूरे नौ दिन तरह तरह के खाने की वेरायटी बनती है यहाँ। 

शालू को एक विचार आया। वो उठकर उनके पास गई। शुक्ला आंटी से उसकी अच्छी बनती है तो सीधे जाकर उनसे कहा, “आंटी जी, एक बात कहें अगर आप सब बुरा न मानें तो!”

उन्होंने भी स्नेह से कहा, “अरे बोलो ना। बुरा क्यों मानेंगे।”

“क्या आप सब कल मेरे यहाँ दोपहर को खाना खाने आयेंगे? कल नवमी है और मुझे कन्या भोज करना है। आप तो जानती हैं यहाँ कोई अपने बच्चों को भेजता नहीं तो मैंने सोचा की आप सब बुज़ुर्गों की टोली को बुला लूँ। मुझे लगेगा माता रानी कन्या रूप में ना आकर माँ के रूप में आकर आशीर्वाद दे रही हैं मुझे,” शालू ने डरते हुए कहा। 

सब एक दूसरे का मुँह देखने लगी। सब के चेहरे पर असमंजस के भाव थे। 

एक ने कहा, “ये क्या नया शगूफ़ा छोड़ा है तुमने, परम्परा बदलने की कोशिश कर रही है तू तो?” 

शालू ने शालीनता से जवाब दिया, “तो क्या करूँ आंटी जी, आप ही बताइए? मुझे जो रीत है उसका निर्वाह भी करना है, कन्या भोज के लिए कन्या कहाँ से लाऊँ।”

“इस परेशानी के कारण यहाँ सबने बंद कर दिया है कन्या भोज करना। कोई घटना हुई थी कुछ साल पहले। उसके बाद सब डर गए। कोई अपनी बेटी को नहीं भेजता। देवी बोलना अलग बात है और मानना अलग। इंसान की बुरी प्रवृत्ति केवल भक्ति, पूजा–पाठ से नहीं बदलती,” गुप्ता आंटी ने कड़वाहट के साथ कहा। 

“जी, सुना है मैंने भी आंटी। लेकिन कोई हल तो निकालना पड़ेगा न। माँ तो माँ है किसी भी रूप में आए,” शालू ने कहा। 

“ए सुनो! पूरी के साथ कद्दू की सब्ज़ी बनाना, और खीर भी,” गायत्री आंटी ने अचानक ऐसे हक़ से आदेश दिया की सब उनका मुँह देखने लगे। 

“क्या है, ऐसे क्यों देख रहे हो सब मुझे? इतने प्यार से बुला रही है तो चलो। घर में इतने प्यार से बोलता है कोई खाने? कल भोज के बहाने हम भी माँ का रूप धर लें कुछ देर को,”गायत्री जी ने सब को जैसे आदेश दिया। 

सब खिलखिला उठे। शालू को लगा इस बार नवरात्रि में माँ दुर्गा इन सब का रूप लेकर घर आने वाली है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अँगूठे की छाप
|

सुबह छोटी बहन का फ़ोन आया। परेशान थी। घण्टा-भर…

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

लघुकथा

कविता

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं