जड़ से कटते रिश्ते
कथा साहित्य | लघुकथा संजय मृदुल1 Apr 2025 (अंक: 274, प्रथम, 2025 में प्रकाशित)
“बी प्रैक्टिकल पापाजी! आपको भी मालूम है कि मैं अपनी बचत से मुम्बई जैसे शहर में घर नहीं ले सकता। फिर आपके बाद सब मेरा ही तो होगा, तो आज क्यों नहीं? आप भी साथ चलिये हमारे। यहाँ अब रखा ही क्या है?”
अपूर्व तल्ख़ी के साथ बात कर रहा था पापा के साथ।
विमल बड़ी शान्ति से उसकी बातें सुन रहे थे। जानते थे ग़ुस्सा दिखाने से बात नहीं बनेगी और कोई हल नहीं निकलेगा।
तीन दिन से घर में यही चल रहा है। बेटा बहू मानों ठानकर आये हैं कि इस बार इस पार या उस पार। दस बरस की नौकरी में कितने घर बदलने पड़े हैं उसे। वो भी परेशान है ऊपर से ख़र्चे भी अनाप-शनाप। अपने बेलगाम ख़र्चों पर अक्सर वो सफ़ाई देता है पापाजी जैसा देश वैसा भेस। अब वहाँ की लाइफ़ स्टाइल से मैच नहीं करेंगे तो पिछड़े कहलायेंगे। लाख समझाने पर भी उन्हें ये नहीं समझ आता कि बचत जीवन में कितनी ज़रूरी है।
ऊपर से प्राइवेट नौकरी, भले कम्पनी मल्टीनेशनल है।
दोनों जब भी आते मौक़ा देखकर घर को बेचने की बात करते। माँ तो सख़्त विरोध में थी मुंबई जाने और घर बेचने के, इसलिए वो इनके झगड़े से दूर ही रहती।
इस बार विमल समझ रहे थे कि मामला टलेगा नहीं, कोई न कोई निर्णय तो लेना ही होगा।
रात जब सब खाने को बैठे तो उन्होंने अपूर्व से कहा, “मैं सहमत हूँ तुम्हारी बात से। अगर घर को बेचना ही ज़रूरी है तो एक रास्ता है।
“पुरखों के सम्पत्ति पर तुम्हारा भी हक़ बनता है। इसी बात का तुम फ़ायदा उठाना चाहते हो। तुम अगर थोड़ा प्लानिंग के साथ चलते तो अब तक ख़ुद का घर होता। पर तुम्हेंं दिखावे वाली ज़िन्दगी पसन्द है।
“मैं इस घर को बेचने के लिए तैयार हूँ, इसका जो भी दाम मिलेगा उसका आधा मैं तुम्हेंं दे दूँगा। बाक़ी आधे का हक़दार मैं हूँ उसका मैं जो चाहे करूँ तुम नहीं पूछोगे। हम तुम्हारे साथ जाकर नहीं रह सकते ये तुम भी जानते हो, तुम्हारी लाइफ़ स्टाइल में हम फ़िट नहीं बैठते। सो हम दोनों यहीं भले। तुम एक बार अपनी जड़ से कट गए तो फिर यहाँ से उखड़ ही जाओगे। लेकिन मुझे इसी जड़ से जुड़कर रहना है, सूखकर गिरेंगे भी तो इसी पेड़ के नीचे ही। हमें नहीं चाहिए इस उम्र में खुला आसमान। तुम्हारे पिंजरे के पंछी बनकर रहने से अच्छा है अपने आसमान में आज़ादी से घूमना।
“तुम इस भावना को कभी नहीं समझ पाओगे। तुम क्या तुम्हारी पीढ़ी ही इस अनुभव से वंचित है क्योंकि तुम लोगों ने कभी अपने महल्ले अपने शहर वहाँ के लोगों को अपनाया ही नहीं। तुम आगे बढ़ने की होड़ में सबको बस सराय सा इस्तेमाल करके बढ़ते गए हो। तुम क्या जानो रिश्ते, परिवार की क़ीमत। तुम सब के लिए सफलता, तरक़्क़ी ही सब कुछ है। पर एक दिन आएगा जब इन सबकी कमी खलेगी। पर तब तक देर हो चुकी होगी।
“मुझे मालूम है अपना हिस्सा मिलने के बाद शायद यहाँ आना भी पसन्द न करो तुम।”
अपूर्व और उसकी पत्नी सर झुकाए सुन रहे थे। उनके मन में पिता जी की बातों का मर्म समझने से ज़्यादा ख़ुशी इस बात की थी कि आख़िरकार वो राज़ी हो गए थे।
माँ की आँखें नम थी लेकिन वो ख़ुद को मज़बूत किए बैठी थी, व्यवहारिक होती दुनिया का एक रंग और देखने मिल रहा था उन्हें जहाँ रिश्तों से ज़्यादा सिक्कों की ख़नक सुनाई दे रही थी।
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