अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मोनालिज़ा 

 

यह शहर की अभिजात आबादी का डबल स्टोरी स्थानीय रेस्टोरेन्ट है। काफ़ी स्पेशियस, लिफ़्ट, लंबी चौड़ी पार्किंग, चमचमाते वाशरूम, प्रवेश द्वार पर गार्ड, अनेकों कर्मचारी, व्यवस्थापक-—कुछ लगातार सफ़ाई कर रहे हैं, कुछ ऑर्डर ले रहे हैं, कुछ ऑनलाइन पेमेंट के लिए पैनल पकड़े निर्धारित टेबल पर जा रहे है। हर टेबल के लिए अलग-अलग अटेंडेंट। क्विक सर्विस पसंद है उसे। अक्सर आया करती है। कभी लंच के लिए, कभी पानी-पूड़ी के लिए, कभी फ़लूदा कुलफ़ी के लिए, कभी अपने या इस उस के जन्मदिन पर-सबके साथ। यहाँ का नींबू पानी उसे विशेषतः पसंद है, उसकी प्रेज़ेंटेशन तो लाजवाब होती है।

यहाँ मालरोड के ब्रांडेड आभूषण शो रूम हैं—तनिष्क और टाइटन भी, साथ-साथ। चली आती है—कभी-कभार। बहुधा अपने लिए, कभी किसी के साथ और कभी-कभार उपहार हेतु-कुछ ख़रीदने। आभूषण या लेटेस्ट वॉच। वैसे इस सब की अच्छी कलेक्शन है अब उसके पास।

साड़ी सूट के लिए तो रूबी, पाहवा, शारदा, परिधान, लिबास ही ठीक हैं, लेकिन जीन्स, टॉप, पर्स के लिए वार्ड रोब, साउथ हाल, पेंटालून, हैंगर, ओबसेशन, गुरुनानक, प्यूमा, लेविस, केंटाबिल, ओकटेव-सब हैं उसके शहर में। अल्फा, ट्रिलियम, विशाल माल के भी चक्कर लग ही जाते हैं।

वह उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियों और ट्रैवल एजेंसियों के लिए संपन्न ग्राहक है। खुला पैसा और अत्याधुनिक एप्रोच-ख़रीददारी और ट्रिप उसका पैशन हैं। ट्रैवल ऐजन्सियों के वर्ष में दो-एक पैकेज पसंद आ ही जाते है। आउटिंग भी हो जाती है और एडवेंचर भी। आत्मविश्वास और साहस बना रहता है। ऐसे में मोबाइल उसके लिए बाह्य संसार की खिड़की बनता है। इस पर परिचितों से बात हो जाती। आस-पास की भी खोज-ख़बर रहती। घूमने जाने पर पड़ोसियों से अपने ताला बंद घर की सूचनाएँ भी मिल जाती। वैसे दो एक कैमरे भी लगा रखे हैं। घर को वह सदैव साफ़-सुथरा रखती है। सब क़रीने से व्यवस्थित होता है। अगर पड़ोसिनों ने वहाँ कबूतरों द्वारा फैलाई गंदगी की बात की, आते-जाते वाहनों से फैली-जमी धूल-मिट्टी की बात की तो उसने कामवाली से बात कर, उसे वहाँ पहुँचा झट से सफ़ाई करवा दी। घर उसका संसार है। छज्जू का चौबारा—स्वर्गों से भी न्यारा।

अपने को मोनालिज़ा तो समझती ही है। अपने सौंदर्य पर स्वयं मुग्ध। बनने सँवरने की शौक़ीन, परियों की तरह कल्पना की ख़ुशबूदार वादियों में मस्त, रूमानी संगीत से हर पल तरोताज़ा, झूमती, मदमाती। गीतों के अनेक ऐप उसके मोबाइल में हैं। गुनगुनाना हर पल तरोताज़ा करता है। यह उसकी जीवन शैली का अभिन्न अंग है। पार्लर का चक्कर भी हर दो-एक सप्ताह में लग ही जाता।

उस गली में, उस मुहल्ले में, उस संस्थान में उसका वर्चस्व मोटे अक्षरों में दर्ज हो चुका है। वह अर्थस्वतंत्र है, दबंग, बिंदास, मुँहज़ोर और अत्याधुनिका-हवा के घोड़े पर सवार-उड़ती फिरती है। कड़क रहना उसकी आदत भी रही और ज़रूरत भी। न कल आवाज़ नीची की या नज़रें झुकाई न आज कर पाती है। न किसी पड़ोसिन-परिचित की आर्थिक दुविधाओं से कभी भावुक हुई है और न इधर-उधर के लोगों को ज़रूरत से ज़्यादा मुँह लगाया है। न किसी का फ़ालतू अहसान लेती है और न करती है। संतुलित रहना, सीमा-रेखा खींचना उसे बहुत पहले ही आ गया था।

वैवाहिक जीवन के आतंक, किचकिच, तनाव, झगड़े, अपमान और अनेक प्रकार के उत्तरदायित्वों से मुक्त-सम्पन्न शहराती सिंगल महिला। सरल, सहज, आनंदमय, स्वछंद जीवन है उसका। ज्ञान, साहस, कौशल, अनुभव, करुणा, जीवन की गहराई सब है उसमें।

उसे किसी को एवरेस्ट पर नहीं चढ़ाना, किसी पति, पुत्र, भाई को स्तरीय वैज्ञानिक, सफल खिलाड़ी या बड़ा ऑफ़िसर नहीं बनाना। उसके जीवन का केंद्र बिन्दु कोई पुरुष नहीं, वह स्वयं ही रही। स्त्री/मादा नहीं मनुष्य है वह। अपने लक्ष्यों को लेकर नित्य ऊँचाइयाँ नापना हॉबी भी है और लक्ष्य भी। ट्विटर, एक्स, इंस्टा आदि में उसका स्टेटस सिंगल वुमन है। पुरुष उसके लिए सिर्फ़ वर्कर है—रसोइया, कर्मचारी, ड्राइवर, हॉकर, सेक्युर्टी गार्ड, माली, धोबी, चपरासी वग़ैरह-वग़ैरह।

बॉलीवुड या वेब सिरीज़ की ‘सिंगल वुमन’ के नायकत्व वाली ‘क्वीन’, ‘पीकू’ जैसी फ़िल्में। ‘फ़ोर मोर शॉट्स प्लीज़’ जैसी वेब सिरीज़ उसकी पसंद रही हैं।

आज देश की जनसंख्या अगर 140 करोड़ है तो माना जा सकता है कि 70 या 68 करोड़ के आसपास महिलाएँ होगी और कोई सात-आठ करोड़ एकल स्त्रियाँ। आज भारत में सिंगल वुमन ब्रिटेन या फ़्राँस की जनसंख्या से कहीं अधिक हैं। सब मस्त और व्यस्त। कार्य को शत प्रतिशत देने वाली एकल कामकाजी स्त्री अपने कार्यक्षेत्र में अधिक सफल है, प्रसन्न और संतुष्ट है।

वैवाहिक जीवन की रेलमपेल और उत्तरदायित्वों का भले ही उसने चुनाव न किया हो, लेकिन अपने जीवन लक्ष्य के प्रति वह पूर्णतः प्रतिबद्ध और समर्पित रही—अटल बिहारी वाजपेयी, नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, रत्न टाटा, योगगुरु रामदेव, ममता बैनर्जी, जयललिता, मायावती, उमा भारती की तरह। साहित्य जगत की सिंगल वुमेन महादेवी वर्मा और कृष्णा सोबती का कोई मुक़ाबला नहीं। बॉलीवुड की ओर नज़र घुमायें तो लता मंगेशकर अपने में एक लिजेंड रही। सुष्मिता सेन, तब्बू, शमिता शेट्टी, तनिषा मुखर्जी, नग्मा, अमिषा पटेल, साक्षी तंवर, दिव्या दत्ता, एकता कपूर—यानी देश की सात-आठ करोड़ सिंगल वुमन सफल और बहुत सफल बन झंडे गाड़ रही हैं।

सिंगल रहना उसका अपना निर्णय रहा। अन्यथा सिर्फ़ एक पत्नी और माँ बनकर रह जाती और आज उसके खाते में भी नंबर दो पर रखने वाला पति और विदेश जाकर भूल जाने वाले बच्चे ही होते। पारिवारिक दबावों की देन विवाहित स्त्री का तनाव और परिवार में होकर भी अकेले होने की विडम्बना। टीवी, मोबाइल और अधखुले मुख्य द्वार से बाहर की भागती दौड़ती दुनिया में कुछ खोजती ढूँढ़ती प्रौढ़ायें।

अपने में पूर्ण इकाई है वह। किसी प्रेमचन्दीय ‘बूढ़ी काकी’ सी ‘सेंटीमेटल फूल’, भावुक, मूर्खा, असुरक्षा पीड़ित नहीं। उस पर कोई बुद्धिराम अत्याचार नहीं कर सकता। प्रसादीय ‘ममता’ की तरह न हृदय में वेदना है, न मन में तूफ़ान, न मस्तक में आँधी। घर के दरवाज़े पर सूखे कपड़ों सी टँगी रहकर पति बच्चों की प्रतीक्षा उसे नहीं करनी, उसकी सारी सोच, सारे प्रयास तो कामयाबी के दरवाज़े खोलने, शिख़रों को छूने के रहे। वह अपनी उपलब्धियों की वैज्ञानिक-आधुनिक दौड़ से संतुष्ट और आश्वस्त है।

शॉपिंग में अतिरिक्त रुचि के बावजूद उसके पास मोटा बैंक बैलेन्स है, आभूषण हैं, दोमंजिला घर है। मेहनत से कमाए धन से उसने अपनी हैसियत भी बदली है और औक़ात भी। बच्चों की गंदगी साफ़ करती माँएँ, उनकी उठा-पटक सँभालती माँएँ, हर पल उनके लिए हाल-बेहाल होती माँएँ, उनकी हर जायज़-नाजायज़ ज़रूरत के लिए अपनी हर ज़रूरत से विराम लेती माँएँ। सिर्फ़ पति और बच्चों के कैरियर का सोचने वाली माँएँ। कालांतर में नवासे-नवासियों, पोते-पोतियों के लिए हलकान होती दादी-नानी-ऐसे बहुत से झंझटों-व्यस्तताओं से वह मुक्त रही। ज़िन्दगी उसने जी भर कर जी, अपने लिए जी, मज़े से जी। वह अपने लाइफ़-स्टाइल के कारण सदैव परिचितों, पडोसियों, संबंधियों के लिए ईर्ष्या और अनुकरण का सबब रही। वह असली अर्थों में राजकुमारी है, रानी महारानी है, अपने शासनतन्त्र की सूत्रधार-अपने मन की करने वाली। झगड़ा करना, डाँट देना, किसी की भी बजाकर अपने मन की भड़ास निकाल लेना और फिर सुलह भी कर लेना उसके बाएँ हाथ के खेल रहे। ज़बान की तेज़ है। किसी को सीमा नहीं लाँघने देती, लक्ष्मण रेखा पार करने से पहले ही औक़ात बता देती। हुक्म हकूमत उसके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग थे और हैं।

♦ ♦

मध्यवर्गीय परिवार के अति सुरक्षित वातावरण की उच्च शिक्षित युवती। पहली संतान। धड़ल्लेदार। बड़े होने का गौरव और अधिकार। प्रभुत्व कामना अपने शिखर पर, पूरा परिचित संसार मेरी सलाह पर चलना चाहिए। सब की कमियाँ कंठस्थ, अपने को सर्वोपरि मानना। बारह साल छोटा भाई-अमूल्य और लाड़ला, लेकिन संरक्षक वही रही। उस की शादी में तो डोर अपने हाथ में रखी ही, उसके बच्चों के दिमाग़ में भी अपनी महानतायें। सफलतायें इंजेक्ट करती रही।

♦ ♦

युवावस्था नौकरी, कामकाज में, सहेलियों-सहकर्मियों के साथ मौज-मस्ती में, वेतन के पैसे गिनने-बचाने, आसपास के लोगों के झगड़े, दुख, समस्याएँ सुनने-सुलझाने, घर को सजाने-सँवारने में कब बीत गई, पता ही नहीं चला। अवकाश प्राप्ति के दिन की दस्तक थोड़ा आंदोलित तो कर ही गई। घुटने, कंधे तकलीफ़ देने लगे। नींद अकड़ दिखाने लगी, चढ़ती उम्र रंग दिखाने लगी। जबकि न वह किसी की आश्रिता रही, न फ़ाइनेंसर। बुढ़ापा और रोग आदि की आशंकायें पिछली उम्र में थोड़ा त्रस्त अवश्य करने लगीं, कैसे यक़ीन हो कि जीवन के लगभग तीन पड़ाव लाँघ चुकी हैं—मुड़ मुड़ कर शैशव, यौवन या प्रौढ़ावस्था में ताक-झाँक करने से वे वापस तो आ नहीं सकते। लेकिन पराजय शब्द तो उसके शब्दकोश में ही नहीं रहा। समय के साथ-साथ बुढ़ापे ने स्वास्थ्य-नूर, नायिकात्व-अधिकार, पसंद-नापसंद सब छीनने की कोशिश तो की, लेकिन जल्दी ही उसे औक़ात बता दी गई। पतझड़ को बसंत में बदलने का जीवट वह जानती है। नव जीवन का जुगाड़ करना समय की माँग भी रही और मन की आश्वस्ति भी।

खोल लिया कम्प्यूटर सेंटर और शुरू हो गई मार्केटिंग। अब, आज की तारीख़ में उसके पास शहर की पाश मार्केट में अपना कम्प्यूटर संस्थान है। भिन्न संस्थाओं के ऑर्डर हैं। अलग-अलग विषयों के एक्सपर्ट नौकरी में हैं और आते–जाते छात्र-छात्राएँ हैं। अच्छी वेटिंग लिस्ट है। हर कोई एक बार तो यहाँ एड्मिट होना ही चाहता है। संघर्ष उसका प्रेय है और बुलंदियाँ उपलब्धि। स्वतंत्र व्यक्तित्व, स्वतंत्र बैंक बैलेन्स, स्वतंत्र कार, स्वतंत्र फ़्लैट। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 तो ऽ . . .
|

  सुखासन लगाकर कब से चिंतित मुद्रा…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

कविता

पुस्तक समीक्षा

लघुकथा

साहित्यिक आलेख

शोध निबन्ध

रेखाचित्र

यात्रा-संस्मरण

पुस्तक चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं