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मृत्यु-मुक्ति


 (सॉनेट) 
 
क्षुण्ण यह तारिका तिमिर के तिरस्कार से 
शुभ्रा की शय्या पर स्मृति सुरभि है स्तीर्ण 
जाओ! आमंत्रित व्यथा में विरह वास के 
यह वर्ष भी असह्य अत्यंत, अक्षि भी तीर्ण 
 
वक्ष-बद्ध विलाप से, हो क्षुब्ध, आया प्रलय 
कैसी ऋतु है! कैवल्य की है कामना केवल 
इस कुमारी का कारागृह है काव्य कुवलय 
क्षणभर हो जाओ स्थिर अज्ञात अरातिदल! 
 
पत्र का एक भाग रिक्त, अन्य भाग ब्रह्माण्ड 
अभिव्यक्त है असंख्य प्रतिवाद व प्रतिस्वर
हो रहा ध्वस्त विष से विश्वास वृक्ष प्रकाण्ड 
मृदु मलय है तप्तकुंड सा, अग्निधौत अध्वर 
 
मृत्यु किंवा मुक्ति, नहीं है यहाँ कोई आकृति 
अहंकार-अंकित अक्षांश ही मेरी शेष सृति!

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