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भग्नांश

 
 
(सॉनेट) 
 
​भग्नांश असीम व्यथा का, तुम्हारा दिया एक उपहार, 
मैं हूँ एकाकिनी नीरव पृथ्वी, विनष्ट होता मेरा शृंगार। 
पाषाण की आकृति में गुप्त प्रेम सा, मेरा यह अनुनय, 
भाग्य से अनभिज्ञ, अज्ञात कोठरी का अप्राप्य प्रणय। 
 
​प्रत्यागमन की ऋतु में . . . असमाप्त अहंकार के चित्र, 
तुम्हारे पदचाप से रचित कविता में, विक्षिप्त चरित्र। 
नवजन्मा संताप संग अनंतर संघर्ष, भ्रम में भी भ्रमित, 
तरु-वल्लरी से कोई प्रश्न नहीं, वह समय से है क्षुभित। 
 
​नीरव द्रष्टा हूँ मैं, अजस्र क्षुब्ध आत्माओं के आर्त्तनाद का, 
स्व-घातक यह क्षण, नितांत निर्जनता में आत्मदाह सा। 
कृत्रिम ईप्सा की अर्धदग्ध काया में, सम्मिलित असत्य, 
इस परिधि में अद्य है असहाय, है निभृत गुहा का कथ्य। 
 
​अदृश्य हो जाओ प्रिया! हाँ, यह है पुनर्जन्म की प्रक्रिया, 
तुम हो कल्पित सुगंधा, सृजित हो खंडकाव्य, ऋतुप्रिया। 

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