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सोना तो थी ही

 

सोना तो थी ही—
अब और निखर गई हूँ, 
लोगों की नज़र में—
उम्र का अंतिम पड़ाव
शायद पार कर रही हूँ। 
दिन—रात मेहनत का—
बाँध कफ़न सर, 
अब तक—
जूझ रही हूँ। 
कुछ कर गुज़रने को—
अभी भी, 
बढ़ रही हूँ। 
दुनिया को बहुत जाना—
अब भी जान रही हूँ, 
रोज़ नए अनुभव पा—
कुछ सोच में, 
डूब रही हूँ। 
माँ–बाप चले गए—
जो थे मुझे सराहते, 
अब तो देख सब—
अपनों को जैसे, 
ग्लानि से भर रही हूँ। 
बहुत थे—
जो संगी-साथी, 
सब में बदलाव—
देख रही हूँ। 
मैं हूँ कारण—
या उनके, 
रंग बिखरते—
देख रही हूँ। 
पढ़ा था जो कि—
जीवन है एक स्वप्न, 
उसे सच मान—
जी रही हूँ। 
ग़लती तो—
अपनी ही थी, 
क्यों दूसरों पर—
मढ़ रही हूँ? 
सच लिखा है—
ग्रंथों में, 
अब वास्तव में—
समझ गई हूँ। 
देना प्रभु! 
इतना साहस—
अब जब—
पथ से भटक रही हूँ। 
जीवन के—
इस मेले को, 
जैसे सत्य मान—
विचलित सी, 
हो रही हूँ। 
माया के—
इन बंधनों से, 
मुक्त कर मेरे ईश—
अब आशीष पाने आपकी, 
आपको ही—
ढूँढ़ रही हूँ। 
रचना थी आपकी—
स्वयं को रचनाकार, 
समझने की, 
भूल कर रही हूँ। 
राह दिखाएँ—
सत्य पथ की, 
कंचन पड़ी माया धूल में—
धूसरित हो रही हूँ। 
मात-पित भाई-बांधव—
सब आप, 
शरण में आपकी आकर—
ख़ुद को सम्मानित पा रही हूँ। 

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टिप्पणियाँ

mahek 2026/05/07 11:43 PM

Bohot sundar!!

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