युद्ध
काव्य साहित्य | कविता डॉ. रानू मुखर्जी15 Mar 2026 (अंक: 294, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
काले धुँए से आसमान था भरा हुआ,
एक बच्चा अचरज से आसमान को था ताक रहा
ऐसा रंग आसमान का उसने कभी नहीं देखा
कैसा रंग बदल रहा है आसमान बच्चा सोच रहा
बैचेन थी धरा आतंक से थी घिरी हुई
कैसा समय आया
बिन कारण मानव द्वंद्व में है फँस रहा
लाखों लोग आपस में अकारण हैं मर रहे
आपस में जैसे लगी हो मरने मारने की होड़
हम विनाश नहीं नव जीवन चाहते हैं,
हम जंग नहीं जीवन चाहते हैं।
हम युद्ध नहीं प्रगति चाहते है,
आतंकहीन जीवन चाहते हैं
परिपक्व मस्तिष्कों के जंग में
साधारण मानव पिस रहा
घर से बेघर हो
शान्ति की टोह में है भटक रहा।
हम जंग नहीं जीना चाहते हैं,
हम युद्ध नहीं नव जीवन चाहते हैं।
हम युद्ध नहीं शान्ति चाहते हैं,
हिंसा दूर हो मैत्री का राज हो
विश्व में शान्ति हो,
हम आपस में शान्ति से रहें।
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Prithwi Nath Mukharji 2026/03/21 11:04 AM
very good poem relevant to particularly to present time.