अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श

चर्चा में हलधर-साहित्य: एक छोटा-सा आकलन


मूल संबलपुरी: उत्पन्न कुमार भोई
सभापति, मनोहर सांस्कृतिक संसद, भेड़ेन, मो-8018049123
भाषान्तर: तेजरू बारिक

    

सारे जगत की एक अद्भुत प्रतिभा है कवि हलधर नाग। प्रदेश के अन्दर लोककवि उपाधि से भूषित कवि हलधर देश-विदेश में और भी ज़्यादा परिचित हैं। वे सारे जगत में एक ऐसे चर्चित चेहरे हैं, जो बिना देखे अपनी काव्य-कविताओं को सुन्दर बोली में व्यक्त करते हैं। इसलिए वे एक ही सारस्वत साधक हैं, जो कि संवैधानिक मान्यता पाने के लिए संघर्षरत संबलपुरी जैसे अस्वीकृत भाषा के कवि के रूप में पद्मश्री सम्मान पाने के साथ जातीय भाषा साहित्य सम्मान और स्वीकृति पाकर हमें गौरवान्वित किया है। 

वे गाँव की प्रतिभा हैं, फिर भी उनके बराबर दर्जा पाने वाले अभी तक पैदा नहीं हुए हैं। उनके पास एक विद्या और पैतृक संपत्ति भी नहीं है। केवल प्राथमिक विद्यालय के दरवाज़े पर अपना पैर रखकर तन-मन-चेतन को साधना की ओर ले जाकर सफलता के शिखर पर चढ़ने वाला एक आरोही, अपनी सृष्टि की हर एक पंक्ति को अपने कंठ में याद रखने वाली अनोखी प्रतिभा के रूप में पहचान पाने वाले हलधर को लेकर गर्व महसूस करते हैं हर कोई प्रशंसक। 

अलग-अलग भाव, आवेग, आवेदन और उपादान को लेकर कवि हलधर का गीत, कविता, कहानी, खंड-काव्य और काव्य का विशाल रूप देखने को मिलता है। उनके सैकड़ों गीत और कविताएँ हैं। उनमें से ‘सुरुत’ (1994) और ‘भाव’ (2002) कविता-संकलन को छोड़ कर इधर-उधर प्रकाशित कविताओं की संख्या भी कम नहीं है। जैसे पके हुए चावल के एक कण को छूकर पूरे भात की सारी अवस्थाओं का पता चल जाता है, उसी प्रकार उनकी एक छोटी-सी कविताओं में काव्यिक आवेदन और अपनेपन का पता चल जाता है। 

हमारी मिट्टी-पानी-पवन, जंगल-झरने-पहाड़, मन्दिर-खंडहर-गर्भगृह हो, भाषा भावनाओं के साथ सारस्वत साधन हो, संस्कृति हो या परंपरा हो, वीरता हो या विविधता हो, हर जगह पर महानता, उदारता और आध्यात्मिक आत्मीयता के स्पर्श से विभोर है कवि का मन। हर वक़्त अस्मिताओं का आवाहन करते हुए मिट्टी की महक में तल्लीन है कवि हलधर। हमारे गीत, वाद्य, नृत्य, रूप-रंग के साथ साहित्य, भूगोल, इतिहास आदि की सभी पहेलियों को उजागर करने के साथ इस मिट्टी के गान में मशग़ूल है कवि हलधर। उनके गीतों में पदों का सुन्दर विन्यास है, जिसे सुनने के बाद श्रोता के मन में अपने आप उच्चाट भावों की उमंग खिल जाती है।

एक सच्चा कवि हमेशा मिट्टी के मोह में बँधा होता है। जो जहाँ का है, उनका साहित्य उसी का जयगान करता है। हमारे कवि हलधर इस दिशा में धुरन्धर हैं। इस मिट्टी की महक उनकी हर पंक्ति में गुंजित होती है। हलधर-साहित्य की नींव है हमारी संस्कृति और परंपरा, इसलिए उनके हर सृजन में उनका सफल प्रयोग देखने को मिलता है। जिस तरह वे हमारे संस्कृति के उपासक हैं, उसी तरह भाषा आन्दोलन के नेता भी है। पल्ली से दिल्ली तक फैले संबलपुरी भाषा के प्रचार-प्रसार और सुरक्षा हेतु लोगों का आदर पाकर वे केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक सशक्त अनुष्ठान बन गए हैं। ऐसे विचारों से ओत-प्रोत हैं उनकी बहुत सारी कविताएँ। इससे पता चलता है भाषा-माँ की ममता में कितना विभोर है कवि हलधर का हृदय और पश्चिम ओड़िशा की भाषा संबलपुरी के संवर्धन के प्रति वे कितने आशावादी हैं। 

गंभीर दार्शनिक विचारों के धनी हैं कवि हलधर। ‘पाँच अमरूत, ‘कामधेनु, ‘माया बुरेईर हाट’, असुर, किर्तन, कुईलि, नएद, समुदर, गुनचा, लुई दामुर आदि उनकी कविताएँ इसका बयान करती है। 

ऊँची भावना हलधर साहित्य का मूल उपादान है, उसी प्रकार अगर देखा जाए उनका ‘पाँच अमरूत’ कविता ही एक सुदृढ़ काव्य चेतना का चिह्न है। केवल चौदह शब्दों की एक सुन्दर पद्यात्मक मिलन से रची गई छोटी-सी कविता, जिसमें बिंदु के भीतर सिंधु का दर्शन होता है। एक विशाल, कोमल, दरदी और उदार हृदय को लेकर असीम आनंद के भीतर अमृत झराने की कोशिश में लगे हैं कवि। इसलिए सात समुन्दर, स्वर्ग का चाँद, माँ का धन, महत नीति का धार और कवि की क़लम गार-जैसे पाँच स्तरों से अमृत झरन की मंगलमय सृष्टि की सम्भावना उन्होंने देखी हैं। केवल यही एकपदी कविता ही हलधर के काव्यादर्श को उजागर करने में काफ़ी है। 

हलधर एक आम आदमी है, इसलिए एक साधारण मनुष्य के भाँति उनमें कई गुणों के साथ-साथ थोड़ा सा चिड़चिड़ापन भी देखने को मिलता है। पिछले सन्‌ 2000 में एक घटना घटी। हलधर ग्रन्थावली विमोचन के बाद ओड़िया-साहित्य के एक प्रतिष्ठित कवि ने हलधर की प्रतिष्ठा से ईर्ष्या करते हुए एक बेनामी चिट्ठी लिखी। उसका उत्तर देने के लिए कवि ने लिखा ‘बेनामी चिठिर उतर’ कविता के रूप में। ठीक उसी तरह एक संबलपुरी कवि की असहिष्णुता को लेकर कवि श्री नाग ने क़लम चलाई। ‘जैसी धुन वैसा गाना’ कहावत को साकार करने के लिए उन्होंने ‘बुमेरां’ लिखी। बाद में लिखी ‘टेंकर गुड़ा’ इस तरह की एक कविता है। इसमें आक्षेप-विद्रूपता के साथ व्यंग्यात्मक तीरों का सुन्दर प्रहार है। उनके काल्पनिक काव्य ‘बछर’ और पौराणिक काव्य ‘महासती उर्मिला’ के ऊपर जो वितर्क किया गया, उसका प्रत्युत्तर ही ‘टेंकरगुड़ा’ है। इसमें कवि के निकट रहने वाले एक कवि को युक्ति-तर्क के ज़रिए कुचला गया है। इसके बाद सन्‌ 2011 में संबलपुरी कविता पत्रिका ‘जुहार’ में भी एक विद्वान कवि-समालोचक के दो लेख ‘महासति उर्मिला एक तुलनात्मक विश्लेषण’ और ‘बछर काव्य थी मोर शृंगार चित्र गुटे समीक्षा’ प्रकाशित हुए। आलोचक ने रूढ़ीवादी चिन्तन को उजागर करते हुए काव्य की समालोचना कर डाली। नाभी को पैरों से उखाड़ना जैसे बौद्धिक कौशल ने कवि को ठेस पहुँचाई। कवि उसका जवाब तुरंत दे दिया, लेकिन उसी कविता को किसी भी संपादक ने अपनी पत्रिका में छापने की हिम्मत नहीं जुटाई। दो साल तक भटकता रहा। अंत में सन्‌ 2013 में ‘बेनी’ संबलपुरी पत्रिका में वह कविता छपी। बुद्धि और अक़्ल की यह लड़ाई बहुत रंग लाई। समालोचक ने अपने पाण्डित्य और विद्वता के ज़रिए ‘बछर’ और ‘महासति उर्मिला’ काव्य की कटु समालोचना की, पर कवि हलधर ने हर युक्ति का लोग-लुहार से प्रहार किया है। उन्होंने स्पष्ट भाषा में कह डाला:

“बेद पुरान की उपनिषद के हलधर यिबा काहीं
तर भाबें से त साधन करूछे माटिर गाथा के गाइ।”

हलधर की यह युक्ति हर सचेतन पाठक को कवि की अस्मिता आवाहन करने की धारा और मिट्टी की महक के प्रति चेतना को उजागर करती है। अवश्य यह सही है कि मानवता को उजागर करने की भावना हलधर साहित्य का सबसे बड़ा दिग है। सारे जहाँ के लिए उनके हृदय में जो आवेग है, उसे कविता के माध्यम से प्रकाशित किया है। इसमें वे कितने सफल हो पाए हैं, इन पर कभी-कभी मानस-मंथन भी करते हैं। इसी आत्म-चिंतन का सफल रूपायन है ‘कवि हलधर के चिठि’। चिट्ठी भेजने वाले का पता नहीं है, पर एक त्रिकालदर्शी बुज़ुर्ग की तरह उनका भाव और भाषा बहुत प्रभावी है। इसमें मनुष्य के दर्द को समझ कर पहले ख़ुद को स्वच्छ करके त्याग के बलबूते पर समाज सुधार और अपना सुख त्याग कर दूसरों का उपकार करने जैसा चेतना-वार्ता के साथ उन्होंने हलधर से कहा:

“आपें बिष खाई अमरूत बाँट
गंगा पछे मुड़े धर
चिठि दउछें रे हलधर।” 

अगर हम ग़ौर से देखें तो यह चिट्ठी दूसरी जगह से नहीं, बल्कि कवि भावनाओं का साक्षात्‌ काव्यरूप है। इसलिए साधारण दृष्टि से जो कुछ सामान्य बोध होता है, कवि की नज़र उसकी गहराई को उजागर करता है। उनकी तीसरी आँख खुलती है असल ज्ञान। इसी दृष्टि से देखें तो हमें मालूम होता है कि हलधर के सृजन का प्रसंग जो भी हो, उनकी चेतना की जड़ें बहुत गहराई तक गई हुई है। इसी से प्रभावित होकर आन्तर्जातिक ख्याति संपन्न चलचित्र निर्देशक गुलज़ार जैसे नामी कलाकार आवेगपूर्ण संलापन देते है, हमारे साहित्य के लिए गर्व की बात है। 

उनका काल्पनिक काव्य ‘बछर’, पौराणिक काव्य ‘अछिया, ‘तारा-मन्दोदरी’, ‘महासती उर्मिला’, ‘सतिआ बिहा’, ‘प्रेम पएचान, किंवदन्ती और जनश्रुति से प्रेरित ‘रसिआ कवि’, ‘संतकवि भीमभोई’, ‘ऋषिकवि गंगाधर’ के साथ ऐतिहासिक काव्य ‘वीर सुन्दर साए, वीर माटिर गाथा’ जैसे हरेक विचार और प्रसंग से जुड़े हुए उनके काव्य के कथानक। ठीक उसी तरह शक्ति उपासना के परम साधन पर उन्होंने कई काव्य लिखे है, ‘सिरि समलेई’, ‘करमशानी’ और ‘महेश्वरी पुरान’। सच्चा प्रेम की सही पराकाष्ठा, महानता और विस्तृत भावों का सृजनशील प्रतिफलन है पौराणिक काव्य ‘प्रेम पएचान’। गंभीर उपलब्धियों के साथ ईमानदार, निर्मल और निष्कपट विचारों वाले सारस्वत संदेश से भरपूर। कवि सरल से कठोर और खलबल से निर्बल तक-हर चरित्र के साथ सही प्रसंग जोड़ कर गंभीर दृष्टि से प्रेम की पहचान करवाई है भिन्न रंग से, भिन्न ढंग से, अलग आचार और अलग विचारों से। 

संबलपुरी सांस्कृतिक अस्मिता की धरोहर है हलधर साहित्य। यहाँ के रीति-रिवाज़ों का सरस संस्करण हुआ है उनके हर काव्य में। ‘बछर’ में जिस तरह स्वर्ग इन्द्रसभा में ‘डालाखाई’ नृत्य का असर, शादी के वक़्त ‘शलाबिधा’ मारने का उल्लेख हुआ है, उसी तरह ‘प्रेम पएचान’ काव्य में गोस्वामी प्रभु के भोजन में हमारे इलाक़े का ‘हेंडूआ’, ‘करड़ि’ और ‘लेथातुन’ के प्रसंग देखने लायक़ है। संबलपुरी-कोशली भाषा से भीगा हुआ है कौशल। इसलिए देवकी रानी यहाँ के ‘भाई जिइँतिआ’ करना, नन्दरानी यशोदा पुत्र पाने के लिए ‘करमशानी’ की स्थापना करना, ‘पुओनिउँतिआ’ के साथ ‘नहना गुधा’ जैसे प्रसंगों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। इसलिए संबलपुरी लोक-संस्कृति के सुन्दर प्रयोग से भरपूर है ‘प्रेम-पएचान’। पौराणिक प्रसंग होते हुए भी हमारे यहाँ का आचार, विचार और विश्वास की धुरी है। काव्य में वर्णित साग-सब्जियों का एक सफल अभिधान जैसा लगता है। गोस्वामी प्रभु को खाने के लिए दिए गए व्यंजनों का नाम भी उसी तरह का है। जम्बेव राजा के राज्य में राजकुमारी जम्बोवती की सहेलियाँ ‘घएसान’, ‘टेआ’ जैसे नाम काफ़ी पुराने हैं। इसे सुन्दर ढंग से चित्रित करना कवि की चतुराई है। पांचाली का वस्त्र-हरण में संबलपुरी कपड़ों के व्यवहार से हमारे बान्ध कलाओं का गरिमा पुराण युग तक ले जाकर उसे उजागर किया है। उनके सभी काव्य नायिका संबलपुरी रीति-नीति, चाल-ढाल, पहन-ओढ़न, आचार-विचार से जुड़े हैं।

घटना के चक्रव्यूह में और भाव के बँधन में बँधे है सभी प्रसंग। एक सच्चा कवि जब काव्य-कर्म संपादन करता है, तभी वह स्त्री-पुरुष, बच्चा-बूढ़ा, राजा-रानी जैसे अलग वर्ग के चरित्र और विचारों का सही ढंग से चित्रण करता रहता है। इसलिए कृष्ण-बलराम के साथ गोपाल बालक खेतों में काम करने का खेल और हँसी-मज़ाक के ज़रिए हलधर ने इसमें दिखाई है मिट्टी का महक।

स्वभाव कवि गंगाधर मेहेर के जीवन में घटी दुर्दशाओं के काले बादल को विवेक-विचार के उगते सूरज की रोशनी से कैसे हटाया गया और उसके साथ गंगाधर के सामाजिक तथा व्यक्ति जीवन कैसे निखर कर आया है उसका सार्थक रूप है ‘ऋषि कवि गंगाधर’।

कवि गंगाधर के भीतर जो सहन-शक्ति, उदारता और ऋषिवत जीवन के साथ रोक-टोकपन है, हलधर उसे उजागर किया है। कवि का दर्द एक दर्दी कवि ही सही ढंग से पहचानता है। काव्य के पहले कवि अपनी कला-कौशल दिखाते हुए महान कवि के धरम और उसमें गंगाधर के जीवन-धारा तथा काव्यिक-धारा किस तरह चिपककर एक और अभिन्न है, मेहेर साहित्य के बहुमुखी आदर्शों से उसके प्रमाण दिए हैं सरस-सुन्दर ढंग से, जिसमें गंगाधर के मातृभाषा प्रेम, कर्त्तव्य के प्रति जागरूकता, वैचारिक सभ्यता, चाल-ढाल में साधुता जैसे सद्‌गुणों का उजागर करके उनके विशाल व्यक्तित्व का पहचान करवाई है। ज़्यादातर देहाती चिन्तन और लोक-चेतना की चमक से हरा-भरा है यह खंड-काव्य। इसमें लोक-चरित्र चित्रण इस तरह सशक्त है, जिसे पढ़कर हमें गाँव के बीच खुले आम नाटक देखने जैसा अनुभव होता है। दुख के लिए जैसा दरद भरपूर, प्रयोग कौशल में छंद गरिमा से यह हमेशा भरमार है। 

कवि के ऐतिहासिक और किंवदन्ती मूलक दो जातीय चेतनाधर्मी काव्य हैं ‘वीर सुन्दर साए’ और ‘वीर माटिर गाथा’। इन दोनों काव्य में इतिहास के साथ जनश्रुति को प्रधानता दी गई। पर काव्य के आरंभ से अन्त तक हर पंक्ति में वीरों के तेज, उत्साह और चमक साफ़ दिखाई पड़ती है। कोशलांचल का एक असली सांस्कृतिक धरोहर है घेंस की मिट्टी, जहाँ इस मातृभूमि की मुक्ति हेतु हमेशा अस्मिता का आवाहन किया जा रहा था। यहाँ के वीर सन्तान देश के लिए मर मिटने की क़समें खाते थे, इसी चेतना को लेकर लोककवि और लोक कलाकार वीरता और सांस्कृतिक यादों को लेकर गीत गाते थे। बिंझाल बिहा गीत में हर भाव आवेग के साथ फूट कर सामने आ जाता है। इसी मिट्टी की सन्तान है हलधर, जो कि एक सफल गीतकार, कविता लिखने वाला कवि और ‘डण-दूल्हा बिहा’ नाच करने वाला कलाकार हैं। इसलिए वे कारीगरी और कलाकारी दोनों में अपना नाम कमाया है।

बाहरी आटोप या अतिरंजन नहीं, बल्कि वास्तविकता का प्रतिफलन करते हुए इन दोनों काव्य अपने आप आलोकित है। संलाप के ज़रिए कथा-भाग को आगे ले जाने वाले चरित्र थोड़ा-सा है, पर घटना को क्रियाशील करने वाले चरित्र तक हर कोई अपनी प्रकृति के अनुसार खेल दिखाया हैं कवि के कल्पना में सही और वाजिब वर्णन से भरपूर है ये दोनों काव्य। स्वाभिमान को सम्मान और स्वीकृति दे रहे प्रसंग ही यहाँ सबसे ऊँचे स्थान प्राप्त किये हैं और भी यह है कि यहाँ के प्राकृतिक परिवेश भी अपनी स्वाभाविक स्थान लेते हुए कवि की क़लम से अस्मिता को हमेशा उजागर की है।

हर कवि समय का सफल रूपकार है, इसलिए वीर भूमि घेंस का संग्रामी परिवेश इसमें शामिल है। सच में यहाँ के ताल-खोल, सिंगड़ाघाटी, झुलेन बरगद, भाटेन डुंगरी, साई दुएल, लेखा पथर जैसी जगह के साथ झार-जंगल नदी-नहर, झरना-पहाड़ी जैसे बातें कर रहें है, जो कवि के कानों में स्पष्ट सुनाई दे रही है। इसलिए कवि पहले सर्ग में ही वीरत्व की गाथाएँ गाने लगे हैं:

“नाई काहिं नाईं भारत भुई, एन्ता लढुआ जमा
बाप सांगे चारि पुओ जान देले छाति डेरि दम्दमा।” 

यह काव्य घेंस ज़मींदारी के हर गाँव, गली, मुहल्ले आदि के योगदान से हुआ है सरस और सुदृढ़। लोगों के बोल-चाल की भाषा-शैली इस काव्य को सजीव बनाया है। अव्वल संबलपुरी शब्दों के व्यवहार के साथ यहाँ के रंग ढंग का सुन्दर प्रयोग से समृद्ध हुआ है हलधर साहित्य, सही जगह पर सटीक शब्द प्रयोग कौशल में पारंगम है कवि। इसलिए इसमें व्यवहृत गाली-झगड़े, नोक-झोंक, मुहावरे-लोकोक्तियों काव्यिक मर्यादा से बँधें हैं, इसलिए यह मर्मस्पर्शी है। 

आम आदमी की बोली हलधर साहित्य का प्राण है। लोगों में प्रचलित तद्भव और देशज शब्दों का व्यवहार से यह रमणीय है। रूढ़ि, दाएका, नोक-झोंक आदि लोकोक्ति से काव्यिक प्रयोग जैसा सुन्दर, वैसा ही संबलपुरी भावों का रस पिलाकर उसे बनाया है सरस-मनोहर। अनुप्रास, उपमा, उतप्रेक्षा आदि अलंकारों का व्यवहार काव्य में चार चाँद लगा दियें। ओज गुण का प्रयोग से वीर रस का होना तो अनिवार्य है। सपने में भी वीरता की झलक देखने को मिलती है। प्रकृति के जीव-जगत के भीतर कवि ने वीरत्व का आह्वान, सियार और मुर्गे की आवाज़ों में भी लड़ाई का स्पष्ट रूप दिखाई देती है। ‘कुंभाटि’ चिड़िया के आवाज़ में लहेंक भरी संदेश सुनाई दे रही है। कवि की भाषा में:

“आम बुरेईन कुंभाटि गुगाला हुक हुक हुक हुक
तार बुलि नु कहुछे काएँ त ठुकरे पुहेकु ठुक।” 

इस प्रकार ओज गुण संपन्न वीर रसों का चमत्कार प्रयोग हुआ है काव्य में। और भी माधो सिंह के मुँह से लहेंकी गीतों का स्वर देकर आदिवासी-जनजाति को ललकारा है धैर्य और दृढ़ता के साथ अपने चार वीर सन्तानों को माधो सिंह जिस तरह आह्वान दी, उनसे देशप्रेमी चारित्रिक भावनाएँ गहराई से उमड़ पड़ा है। अतः हम ये स्वीकार कर सकते हैं कि सहज और सरल ढंग से प्रयोग किया गया रस, रीति, गुण, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि अलंकारिक विन्यास के हेतु हलधर साहित्य समृद्ध और सशक्त है।

चरित्र चित्रण में भी कवि ने कंजूसी नहीं की। चुंबक और रोक-टोक उनके हर चरित्र। मुख्य चरित्र सुरेन्द्र साए, ज़मींदार माधो सिंह, से लेकर हटे, कुंजेल, बएरि, अएरि, मनोहर सिंह तक सभी को समान दर्जा और गुरुत्व देकर चित्रित किया है। ज़मींदार माधो सिंह दमदार और स्वाभिमानी है, पर किराएदार या अभिमानी नहीं। इसलिए कभी-कभी अपनी इलाक़े में उत्पात मचाने वाले शेर को धनु-कमान से मार कर भी कभी अपनी बहादुरी का ढोल नहीं बजाते और उनकी चुप्पी से नायक का महान गुण उजागर होता है। दूसरी और अपनी रोज़ी-रोटी के लिए अंग्रजों के पास नौकरी कर रहे गोरे चपरासी को भी आतिथ्य देकर अपनी उदारता दिखाई है। उन्हें लिआ, गुड़, पोहा खिलाकर वापस करते थे। ठीक वैसा ही दरिआर सिंह का चापलूसी, गुपी गड़तिया की चुग़लख़ोर और खूफिया प्रकृति का वर्णन सहराने लायक़ है। जो जैसा आदमी है, उसे उसी प्रकार चित्रित किया है उपमा और उत्प्रेक्षा का रंग लगाकर। 

ज़्यादातर गौण चरित्रों का भी प्रसंग और परिवेश के अनुसार ज़ोर देकर उनमें त्याग का महिमा गान और मानविक मूल्य-बोध की स्थापना करने के सफल प्रयोग से हलधर साहित्य और भी गरिमामय है।

अंत में हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि पुरानी विषय-वस्तुओं का नया रूप-गुन-चेतना देकर अपनी काव्यिक-कुशलता को साबित करने वाला एक सफल-सच्चा कवि है हलधर। इसमें थोड़ा भी झूठ नहीं बल्कि अटूट सत्य है। हलधर एक त्यागी पुरुष, योगी पुरुष है। उनका पैर कभी दबे नहीं, उनकी क़लमें कभी रुकी नहीं। हर रोज़ सारस्वत-साधना में तल्लीन है उनका तन-मन। कवि परिवार का एक सच्चा पथ-प्रदर्शक होते हुए वे हमें दिखा रहे हैं आवेग और अस्मिता का उजाला। उनका अभियान चलता रहे। माँ समलेई सदा उनको अपनी छत्र-छाया में रखें। उस कालजयी महान प्रतिभा के चरणों में हमारा कोटि-कोटि नमन। 

पुस्तक की विषय सूची

  1. संदेश
  2. हलधर नाग की सर्जना पर एक सार्थक विमर्श
  3. संपादकीय
  4. ‘हलधर नाग का काव्य-संसार’ के अनुवादक की क़लम से . . . 
  5. कालिया से पद्मश्री हलधर तक 
  6. युग-पुरुष पद्मश्री हलधर नाग
  7. कवि हलधर नाग-भारतीय साहित्य का एक विस्मय स्वर
  8. हलधर का काव्य-चातुर्य
  9. ‘रसिया कवि’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया
  10. चर्चा में हलधर-साहित्य: एक छोटा-सा आकलन
क्रमशः

लेखक की पुस्तकें

  1. हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श
  2. हलधर नाग का काव्य संसार
  3. शहीद बिका नाएक की खोज दिनेश माली
  4. सौन्दर्य जल में नर्मदा
  5. सौन्दर्य जल में नर्मदा
  6. भिक्षुणी
  7. गाँधी: महात्मा एवं सत्यधर्मी
  8. त्रेता: एक सम्यक मूल्यांकन 
  9. स्मृतियों में हार्वर्ड
  10. अंधा कवि

लेखक की अनूदित पुस्तकें

  1. अदिति की आत्मकथा
  2. पिताओं और पुत्रों की
  3. नंदिनी साहू की चुनिंदा कहानियाँ

लेखक की अन्य कृतियाँ

साहित्यिक आलेख

पुस्तक समीक्षा

व्यक्ति चित्र

अनूदित कहानी

बात-चीत

ऐतिहासिक

कार्यक्रम रिपोर्ट

अनूदित कविता

यात्रा-संस्मरण

रिपोर्ताज

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

विशेषांक में