प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी के परलोक गमन से देश ने खोया एक महान सारस्वत पुत्र
आलेख | साहित्यिक आलेख दिनेश कुमार माली1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
दो दिन पूर्व लंबे समय से बीमार चल रहे प्रसिद्ध हिन्दी-कन्नड़ अनुवादक,लेखक, आलोचक प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी जी का निधन हो गया। इससे बीस दिन पूर्व हृदय गति रुकने से प्रसिद्ध हिन्दी आलोचक श्री विजय तिवारी जी का भुवनेश्वर में निधन हो गया। इन दोनों विख्यात हस्तियों की मृत्यु से हिन्दी जगत में शोक का माहौल है।
प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी साहब से मेरा डेढ़ दशक पुराना संबंध था। मेरी पहली अनूदित पुस्तक ‘पक्षीवास’ और दूसरी पुस्तक ‘रेप तथा अन्य कहानियाँ’ का उन्होंने अपने शिष्य प्रोफ़ेसरों द्वारा कन्नड़ में अनुवाद करवाया था, वे भी सेवानिवृत्त हो चुके थे। यह मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य की बात थी कि उन्होंने मूल लेखक सहित मुझे सपरिवार मैसूर आमंत्रित किया था, वहाँ के टाउनहाल में हुए इन पुस्तकों के विमोचन के भव्य अवसर पर। प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी साहब और उनके मित्र मंडली द्वारा हमारी शानदार आवाभगत भी की गई थी।
उन्हें कैसे भूला जा सकता है ? उन्होंने प्रोफ़ेसर नंदिनी साहू के अँग्रेजी से हिन्दी में मेरे अनूदित काव्य ‘सीता’ पर अपना अमूल्य ‘अभिमत’ लिखा था, जो आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं:
“भारत के गौरव ग्रंथों में आदिकवि वाल्मीकि कृत रामायण का सर्वोपरी स्थान है। रामायण हमारे देश के आदिकाव्य के रूप में गौरवान्वित हैं। रामायण न केवल संस्कृत भाषा का आदिकाव्य है, अपितु पूरे भारतीय साहित्य का आदिकाव्य है। रामायण के पात्रों और प्रसंगों ने पूरे भारतीय जनमानस को प्रभावित किया है। यही कारण है कि रामायण सबका काव्य है, रामायण के पात्रों और प्रसंगों से हर भाषा के कवि प्रभावित हुए हैं और अपनी-अपनी भाषा में रामायण का सृजन कर चुके हैं। रामायण भारतीयों का काव्य है। ऐसी कोई भाषा नहीं जिसने रामकथा से प्रेरणा ग्रहण न की हो।
रामायण पर सदियों से लिखा जा रहा है, विभिन्न विभिन्न परिप्रेक्ष्य में, फिर भी ऊँट के मुँह में जीरे की तरह कम पड़ रहा है विश्व के साहित्यिक सागर को गागर में भरने के लिए। भिन्न-भिन्न प्रकार से गिनने पर रामायण तीन सौ से लेकर एक हज़ार तक की संख्या में विविध रूपों में मिलती है। इनमें से संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण (आर्ष रामायण) सबसे प्राचीन माना जाती है। साहित्य शोध भगवान राम के बारे में अधिकारिक रूप से जानने का मूल स्रोत महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण है। इस गौरव ग्रंथ के कारण वाल्मीकि दुनिया के आदि कवि माने जाते हैं। श्रीराम कथा केवल वाल्मीकि रामायण तक सीमित न रही, बल्कि मुनि व्यास रचित महाभारत में भी चार स्थलों—रामोपाख्यान, आरण्यक पर्व, द्रोण पर्व तथा शांति पर्व पर वर्णित है। बौद्ध परंपरा में श्रीराम संबंधित दशरथ जातक, अनामक जातक तथा दशरथ कथानक नामक तीन जातक कथाएं उपलब्ध हैं। रामायण से थोडा भिन्न होते हुए भी वे इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं। जैन साहित्य में राम कथा संबंधी कई ग्रंथ लिखे गए, जिनमें मुख्य हैं—विमलसूरि कृत पदमचरित्र (प्राकृत), रविषेणाचार्य कृत पद्म पुराण (संस्कृत), स्वयंभू कृत पदमचरित्र (अपभ्रंश), रामचंद्र चरित्र पुराण तथा गुणभद्र कृत उत्तर पुराण (संस्कृत)। जैन परंपरा के अनुसार राम का मूल नाम ‘पदम’ था। दूसरे, अनेक भारतीय भाषाओं में भी राम कथा लिखी गई। हिंदी में कम से कम 11, मराठी में 8, बंगला में 25, तमिल में 12, तेलुगु में 12 तथा ओड़िया में 6 रामायणें मिलती हैं। हिंदी में लिखित गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस ने उत्तर भारत में विशेष स्थान पाया। कन्नड़ के प्राचीन कवियों ने भी रामकाव्य लिखे हैं। आधुनिक काल में ज्ञानपीठ से पुरस्कृत कवि कुवेंपु का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। क्योंकि उन्होंने रामकथा को आधार बनाकर ‘श्री रामायण दर्शनमः’ महाकाव्य लिखा है। इधर के वर्षों में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. वीरप्प मोइलीजी ने रामकथा पर आधारित अपना महाकाव्य ‘श्रीरामायण महान्वेषणम्’ प्रकाशित किया है। इसके अतिरिक्त भी संस्कृत, गुजराती, मलयालम, कन्नड़ , असमिया, उर्दू, अरबी, फारसी आदि भाषाओं में राम-कथा लिखी गई।
महाकवि कालिदास, भास, भट्ट, प्रवरसेन, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर, कुमारदास, विश्वनाथ, सोमदेव, गुणादत्त, नारद, लोमेश, मैथिलीशरण गुप्त, केशवदास, गुरु गोविंद सिंह, समर्थगुरु रामदास, संत तुकडोजी महाराज आदि चार सौ से अधिक कवियों ने, संतों ने अलग-अलग भाषाओं में राम तथा रामायण के दूसरे पात्रों के बारे में काव्यों/कविताओं की रचना की है। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री ने रामायण मीमांसा की रचना करके उसमें रामगाथा को एक वैज्ञानिक आयामाधारित विवेचन दिया। वर्तमान में प्रचलित बहुत से राम कथानकों में आर्ष रामायण, अद्भुत रामायण, कृत्तिवास रामायण, बिलंका रामायण, मैथिल रामायण, स्वार्थ रामायण, तत्वार्थ रामायण, प्रेम रामायण, संजीवनी रामायण, उत्तर रामचरितम्, रघुवंशम्, प्रतिमानाटकम्, कम्ब रामायण, भुशुण्डि रामायण, अध्यात्म रामायण, राधेश्याम रामायण, श्रीराघवेंद्रचरितम्, मन्त्र रामायण, योगवाशिष्ठ रामायण, हनुमन्नाटकम्, आनंद रामायण, अभिषेकनाटकम्, जानकीहरणम् आदि मुख्य हैं।
विदेशों भी तिब्बती रामायण, पूर्वी तुर्किस्तान की खोतानी रामायण, इंडोनेशिया की ककबिन रामायण, जावा का सेरतराम, सैरीराम, रामकेलिंग, पातानीरामकथा, इण्डोचायना की रामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैर रामायण, बर्मा (म्यांम्मार) की यूतोकी रामयागन, थाईलैंड की रामकियेन आदि रामचरित्र का बख़ूबी बखान करती है। इसके अलावा, विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य इलियड, रोम के कवि नोनस की कृति इंडोनेशिया तथा रामायण की कथा में अद्भुत समानता है। विश्व साहित्य में इतने विशाल एवं विस्तृत रूप से विभिन्न देशों में विभिन्न कवियों/लेखकों द्वारा राम के अलावा किसी और चरित्र का इतनी श्रद्धा से वर्णन नहीं किया गया।
रामायण के पात्रों और प्रसंगों भर भारतीय कवियों ने अपनी-अपनी दृष्टि से जैसे चिंतन-मंथन किया है, वैसे सीता के चरत्रि पर भी अपनी-अपनी दृष्टि से चिंतन-मंथन किया है। रामायण के पात्रों में सीता का चरित्र सबको आकर्षित करनेवाला है। सीता रामायण की नायिका है, राम की पत्नी हैं राम की पत्नी होने के बावजूद भी पति से अलग होकर साल-भर रावण के आँगन में रहकर वापस आने पर पति से तिरस्कृत होकर, फिर अपमानित होकर उसका अग्नि प्रवेश करना साधारण घटना नहीं है। समाज में नारी जीवन में आनेवाली विषम घड़ियों का सीता ने सामना करके जो जीवन-मूल्य रखे हैं, वे सोचने को मजबूर करते हैं। प्रस्तुत काव्य में सीता की दुर्बलताओं के साथ-साथ उसके चरित्र के प्रबल अंशों को अनावृत्त किया गया है। सीता प्रस्तुत काव्य में दुर्बलताओं का नहीं, अपितु जीवन मूल्यों का प्रतिपादन करती है। वह वर्तमान समाज की नारी अस्मिता का प्रतिनिधित्व करती है। प्रस्तुत काव्य में सीता के उदात्त चरित्र को स्वीकार करते हुए उसके जीवनमूल्यों पर भी कटाक्ष किया गया है। पर यह भी देखने योग्य है कि सीता के चरत्रि के प्रति कभी-कभार उदासीन भावना उभरकर आयी है। उसके चरित्र के प्रति न्याय नहीं किया गया है, नंदिनी जी सीता के संदर्भ में कहती हैं, जो कि सही है और विचारणीय भी है। प्रस्तुत काव्य में डॉ. नंदिनी साहूजी ने सीता के अंतरंग और बहिरंग का सम्यक मूल्यांकन करने का प्रयास करते हुए सीता को एक समर्थ नारी के रूप में प्रस्तुत किया है।
सबसे बड़ी बात यह है कि रामायण की रचना करने वाले अधिकांश कवि पुरुष थे, अतः उन्होंने सीता को सदैव पुरुष वर्चस्ववादी दृष्टिकोण से ही देखा, इसमें कोई दो राय नहीं है। बहुत ही कम महिला रचनाकारों ने रामायण के पात्रों पर क़लम उठाने का साहसिक कार्य किया है, डॉ. नंदिनी साहू एकमात्र आधुनिक समय की ऐसी पहली कवयित्री है, जिसने महिला होने के नाते एक महिला के दृष्टिकोण से त्रेतायुगीन सीता के जीवन के हर पहलू को बारीक़ी से झाँकने का प्रयास किया है और तत्कालीन समाज की अनेकानेक कुरीतियों पर प्रकाश डालने से वह पीछे नहीं रही है जैसे ‘स्वयंवर’ भी उनमें से एक ऐसी ही कुप्रथा थी और पितृसत्तात्मक समाज में सीता जैसी महारानी को अगर ऐसे दुर्दिन देखने पड़ते थे तो बाक़ी सामान्य औरतों की तो क्या बिसात! पाप-पुण्य के बारे में कई ऐसे सवाल कवयित्री ने सीता के मुख से राम को बहाना बनाकर आधुनिक समाज के सम्मुख रखे हैं जैसे:
क्या नारी देह में बसते हैं पाप-पुण्य, हे भगवान?
या रहते हैं वे किसी मनुष्य के अंतर-मन?
क्या मैं दोषी, अगर रावण ने किया मेरा अपहरण?
क्या होगी नारी ज़िम्मेदार,
किसी आकस्मिकता से हुआ उसका कौमार्य भग्न?
उसके शरीर का हुआ धर्षण, क्या बदल जाएगा उसका तन-मन?
क्या प्रेम हो जाएगा विलीन या बदल जाएगा उसका मन?
बिना उसकी ग़लती के, क्या हो नहीं सकती कोई दुर्घटन?
अगर अनब्याही बेटी पर हुआ आक्रमण,
घर वाले कर देंगे उसका निष्कासन?
अगर ऐसा पत्नी के साथ हुआ, तो क्या देना चाहिए निर्वासन?
इस महाकाव्य में नारीवादी विमर्श बहुत हुआ है। या यूँ कहें नारीवादी विमर्श न केवल आधुनिक युग की देन है, बल्कि आदिकवि वाल्मीकि ने तो पहले से ही नारी की अस्मिता पर आधारित रामायण जैसे आदि महाकाव्य की रचना कर डाली थी। दूसरी बात, मुझे जो सबसे ज़्यादा पसंद आई—वह है, कवयित्री का अपने परिवेश के प्रति अधिकाधिक सचेतन होना, जबकि त्रेतायुग में न तो जल-प्रदूषण था और न ही वायु या ध्वनि प्रदूषण। फिर भी कवयित्री डॉ. नंदिनी साहू ने सीता को जैव-मैत्री और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक दिखाकर आधुनिक समाज को सशक्त संदेश देने का काम किया है कि ‘जल ही जीवन है’, ‘वन ही जीवन है’ और ‘जियो और जीने दो’ आदि सकारात्मक उक्तियों को चरितार्थ करना ही मानवता की पहली माँग है। तभी तो कवयित्री अपने बीसवें सर्ग में कहती है:
घायल हिरणों और मयूरों का करती इलाज अपने हाथ
मैं खाना बनाती, हँसती, प्रार्थना करती, खेलती-कूदती
अपना जीवन साझा करती आश्रमवासियों के साथ।
जैव-मैत्री कला में जिससे मुझे मिली महारत
जुड़ते पेड़, गिलहरी, पशु और पक्षी आर्त्त
स्पर्श, गंध और अनसुनी ध्वनि के स्वर।
पारिस्थितिकी अब बनी मेरा घर
आलीशान हवेली और महलों की चार-दीवारी हुई विस्मरण
धरती माता की पुत्री, आख़िरकार आई प्रकृति की शरण।
अपनी भूमिका में कवयित्री बिल्कुल सही कह रही है कि सीता विश्व की पहली महिला है, जो पर्यावरण नारीवादिता की प्रतिनिधि है। कवयित्री के एक और दृष्टिकोण से मैं बहुत ज़्यादा प्रभावित हुआ, वह यह है कि सदियों से सीता के दब्बूपन और सहनशीलता के कारण उसके द्वारा दी गई अग्नि-परीक्षा कालांतर में सती प्रथा में बदल गई और सीता को सती प्रथा जैसी कुरीति के प्रवर्तक की बदनामी झेलनी पड़ी—इस तथ्य को कवयित्री पूरी तरह से नकार देती है। अपने गाँधीवादी दृष्टिकोण का परिचय देते हुए वह कहना चाहती है कि सीता तो अहिंसा की पुजारिन थी, वह पुरुष वर्ग के साथ मन, वचन और कर्म से हिंसा नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने अपने ऊपर ‘वन-गमन’ और ‘अग्नि परीक्षा’ जैसे कठोरतम अत्याचार भी झेलना स्वीकार किया।
डॉ. नंदिनी साहू सीता को ‘सर्वभूतेषु’ अर्थात् सभी नारियों में वह सीता के तत्त्व को देखती है, निर्भया से लेकर महिला राष्ट्रपति तक, भारत की प्रत्येक सामान्य नारी से लेकर विश्व की प्रमुखतम नारी तक अगर उसमें सीता की तरह धैर्य, अहिंसा और पितृसत्तात्मक मूल्यों के ख़िलाफ़ विद्रोह की भावना धधकती हो। पच्चीसवें सर्ग में कवयित्री के शब्दों में:
युग बीतें राम से बिछुड़े, पर जारी मेरा शाश्वत एकालाप
होता रहा मेरा जन्म के बाद पुनर्जन्म,
हृदय भावनाओं से ओत-प्रोत, मगर मेरी क्षुधा ख़त्म।
मैंने अपने परमाणुओं को वितरित किया अपने पुनर्जन्म
हर नारी के ‘सीतापन’ में अनायास साँस लेती सीता
मैं मदर टेरेसा, फ्लोरेंस के रूप में फिर से पैदा हुई धरती-माता।
नाइटिंगेल, लूसी ग्रे, हेलेन ऑफ़ ट्रॉय, क्लियोपेट्रा,
अटलांटा, कोर्डेलिया, डेसडेमोना, पेनेलोप, सिल्विया प्लाथ,
एथेना, कुंती, द्रौपदी, गांधारी, शकुंतला,
राधा, मीराबाई, कल्पना चावला, किरण बेदी,
इंदिरा, निर्भया, दामिनी, लता, नंदिनी, रेवती या आनंदी
मैं अनेक नारी-जीवन जीती हूँ सुंदर और निर्भीक।
इस कृति के सर्जन हेतु डॉ. नंदिनी साहू बहुत-बहुत धन्यवाद की पात्र है कि उन्होंने विश्व-विख्यात अंग्रेज़ी कवि टी.एस. इलियट की तरह भारतीय पौराणिक ग्रंथों का सहारा लेते हुए अपनी कल्पना-शक्ति के आधार पर पौराणिक सीता को आधुनिक सीता में बदलकर नए विमर्श को जन्म दिया है, जो समाज में नए मौलिक विचारों को अवश्य आंदोलित करेगा।
मुझे इस बात की न केवल ख़ुशी है, बल्कि बहुत गर्व भी है कि श्री दिनेश कुमार माली जैसे समर्पित हिंदी अनुवादक ने उनके ‘सीता’ महाकाव्य के अनुवाद का बीड़ा उठाया और अत्यंत ही सुंदर काव्यिक भाषा में अपने कार्य को संपन्न किया है। अगर मैं कहूँ कि अनूदित रचना की पठनीयता और संप्रेषणशीलता मूल-काव्य से किसी भी दृष्टिकोण में कम नहीं है, दूसरे शब्दों में, यह अनुवाद न होकर अनुसर्जन है। ख़ासियत यह भी है कि अनूदित सारे सर्गों को विशिष्ट लय, ताल और विशेष संगीत के साथ वाचन किया जा सकता है, जो हमारे रोम कूपों को भी उद्वेलित कर देता है, आज के समय में इस प्रकार के अनुवाद का आना हिंदी जगत के लिए न केवल सुखद संकेत है, वरन् एक विशिष्ट उपलब्धि भी है।
अंत में, मैं इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी, दिल्ली की अंग्रेज़ी भाषा की प्राचार्या डॉ. नंदिनी साहू को अपनी कृति की रचना के लिए और मेरे प्रिय भाई हिंदी के विशिष्ट साहित्यकार, समीक्षक और अनुवादक श्री दिनेश कुमार माली को उनके उम्दा अनुसर्जन के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।
-डॉ. तिप्पेस्वामी
हिन्दी प्राध्यापक एवं अध्यक्ष (विश्रांत)
369, ए बी ब्लॉक, कुवेम्पु नगर
मैसूर-570023 (कर्नाटक)”
प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी को मैं अनुवाद के क्षेत्र में अपना प्रथम गुरु मानता हूँ, क्योंकि उन्होंने जितना हिन्दी-कन्नड़ के परस्परिक अनुवाद का जितना कार्य किया। वह मेरे लिए अकल्पनीय है। उनके आशीर्वाद से मैंने भी अपने जीवन में अनुवाद को प्राथमिकता दी। मेरे लिए यह भी गौरव की बात है कि उन्होंने अपनी अंतिम कृति ‘कन्नड़ के शिखर कवि कुवेम्पु तथा अन्य निबंध’ की भूमिका लिखने के लिए योग्य समझा और यह सुवसर मुझे प्रदान किया। यह भूमिका इस प्रकार थी:
“केन्द्र साहित्य अकादमी का अनुवाद पुरस्कार, कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत अन्य पुरस्कारों से सम्मानित डॉ. तिप्पेस्वामी भारतीय साहित्य के उज्जवलतम नक्षत्र हैं, जिनकी छत्रछाया में भारतीय साहित्य की अनेक विधाओं के विटप पुष्पित एवं पल्लवित हुए हैं। हिन्दी और कन्नड़ में पारस्परिक शताधिक अनुवादों के अतिरिक्त अन्य मौलिक कृतियों की रचना कर उन्होंने दोनों हिन्दी और कन्नड़ साहित्य में सुनाम अर्जित किया है।
सन् 2013 में अखिल भारतीय राजभाषा परिषद देहरादून के तत्वावधान में मदुरै में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में मेरी उनसे मुलाक़ात हई थी, जिसमें वे मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किए गए थे। उनके साथ मुझे मदुरै के आस-पास के पर्यटन स्थलों और मंदिरों का भ्रमण करने का भी सुअवसर प्राप्त हुआ था। तीन दिवसीय इन संगोष्ठी के दौरान मौक़ा पाकर मैंने उन्हें ओड़िया ख्यातिलब्ध लेखिका डॉ. सरोजिनी साहू के उपन्यास ‘पक्षीवास’ तथा कहानी-संग्रह ‘रेप तथा अन्य कहानियाँ’ के अपने अनुवाद भेंट किए थे। अपने घर मैसूर पहुँचने के लगभग एक महीने बाद उन्होंने मुझे हिन्दी साहित्य जगत की दो श्रेष्ठ कृतियाँ उपलब्ध कराने के लिए बधाई दी थी और उन्होंने आशीर्वचन भी दिया था कि ये कृतियाँ न केवल हिन्दी और ओड़िया साहित्य संस्कृति के बीच सेतु का काम करेगी, वरन् हिन्दी भाषा में अनुवाद के कारण देश की विभिन्न भाषाओं में भी अपनी पैठ जमाएँगी। हुआ भी ऐसा ही।
उनके दो शिष्यों डॉ. एच.एम. कुमार स्वामी और प्रोफ़ेसर जी, चंद्रशेखर ने दो-तीन साल के भीतर उनका कन्नड़ में अनुवाद कर दिया। उनका कथन पूरी तरह सही था, श्रेष्ठ साहित्य देश को भावात्मक एकता के सूत्र में पिरोता है। कन्नड़ में अनूदित दोनों कृतियों के विमोचन पर्व पर डॉ. सरोजनी साहू और मुझे सपरिवार मैसूर आमंत्रित किया था। उनके द्वारा की गई आवाभगत सदैव चिर स्मरणीय रहेगी। मैसूर के टाउन हॉल में पुस्तक विमोचन का शानदार कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। रहने और खाने-पीने का समुचित प्रबंध इस तरह किया गया था, मानो हम सभी विशिष्ट वीआईपी अतिथियों के रूप में आमंत्रित किए गए हो। डॉ. तिप्पेस्वामी के साधारण रहन-सहन, आँखों में वात्सल्य भाव, हृदय में निश्छलता और वाणी में माध यं देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ था। एक दिन उनके घर भी चाय-नाश्ते पर आमंत्रित थे। मैसूर के कुर्वेपुनगर में उनका घर था, जिसकी चौखट के शीर्ष पर लिखा हुआ था ‘अनुवाद भवन'। घर का वह नाम मेरे लिए आकर्षण का केन्द्र बना। उनके व्यक्तिगत गुणों, साहित्यिक अवदानों और अनुवाद के प्रति गहन आस्था निष्ठा और समर्पण के कारण मैंने मेरी अनूदित कृति ‘विषादेश्वरी’ उन्हें समर्पित की थी, जिसमें मैंने लिखा था।
“आधुनिक युग में अनुवाद-विधा को नए आयाम प्रदान करनेवाले मैसूर के सेवानिवृत्त प्रो.॥तिप्पेस्वामी जी को सादर समर्पित। अनुवाद जिनके हिन्दी से कन्नड़ और कन्नड़ से हिन्दी में किए गए सैकड़ों अनुवाद भारतीय साहित्य की शोभा बढ़ा रहे हैं, उन्होंने अपने अमरत्व प्रदान करने के लिए अपने आवास-स्थल का नाम दिया है ‘अनुवाद भवन' इस अमूल्य योगदान को आपको शत-शत नमन और आपके आशीर्वाद की आकांक्षा करता हूँ”
डॉ. तिप्पेस्वामी जी की अद्यतन कृति ‘कन्नड़ के शिखर कवि कुर्वेपु और अन्य निबंध’ की भूमिका लिखना मेरे लिए गौरव का विषय है और साथ ही साथ, एक प्रकार का दुस्साहस भी। क्या कोई शिष्य गुरु की कृति पर गार खींच सकता है? अवश्य ही, वह गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा अंभिव्यक्त कर सकता है। इस भूमिका के माध्यम से मैं उनसे जुड़ी हुई अपनी स्मृतियों को ताज़ा कर रहा हूँ। किसी भी साहित्यिक कृति का आकलन सहज तभी हो सकता है, जब आकलनकर्ता उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से भलीभाँति परिचित हो। डॉ. तिप्पेस्वामी से सात-आठ साल के दौरान तीन-चार, दो-तीन दिवसीय मुलाक़ातें होना तथा उनकी मौलिक व आलोचनात्मक पुस्तकें पढ़ना मेरे लिए उनके प्रति धारणा बनाने के लिए पर्याप्त था।
यह कृति डॉ. तिप्पैस्वामी जी के ग्यारह निबंधों से गूँथी हुई माला है जिसने कन्नड़ कहानियों, पत्रकारिता, समकालीन प्रवृत्तियों, लोक साहित्य, शरण साहित्य, काव्यानुवाद एवं अन्य समीक्षात्मक निबंधों के सुवासित पुष्प लगे हुए हैं। अवश्य ही, फूलों का यह गुलदस्ता हर भारतीय के मन में भावात्मक एकता के लिए आवश्यक परिवेश तैयार करेगा।
इस कृति की शुरूआत में बीसवीं सदी के शिखर कवि कुर्वेषु के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उन्होंने विस्तार से लिखा है। कुर्वेपु का नाम भारतीय साहित्य में सम्मान से लिया जाता है। उनके महाकाव्य ‘श्रीरामायण दर्शन’ का भारतीय साहित्य में अलग स्थान है। कुवेंपु ने रामकथा का आधुनिक संदर्भ में पुनसृजन कर इस शताब्दी की भारतीय महाकाव्य परंपरा को नया रूप प्रदान किया है। महाकाव्यों के अलावा कुवेंपु ने साहित्य की अन्य विधाओं में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। उनके दो कहानी संग्रह ‘संन्यासी और अन्य कहानियाँ', और ‘मेरा भगवान और अन्य कहानियाँ'। ‘वीर जिसे कोई नहीं जानता', ‘ईश्वर भी हँसा होगा', ‘छह आने तीस पैसे', ‘सहारा प्रेत का', ‘धन्वंतरी की चिकित्सा', ‘कर्ज का बेटा', आदि बहुचर्चित रहें। उनकी हर कहानी में विश्वमानवतावाद की झलक दिखाई देती है।
डॉ. तिप्पेस्वामी का आलेख ‘कन्नड़ कहानी साहित्यः एकसर्वेक्षक’ कन्नड़ कथा यात्राओं के विभिन्न पर्यवेक्षणों में शामिल है। इसमें कई प्रतिष्ठित कन्नड़ कथाकार जैसे कि सक्रिय मंगेशराव, श्रीनिवासमस्ति, आनंदकंद, कुर्वेशु, गोसर रामस्वामी अयंगर, एम। वी। सीतामाराय, कृष्ण मूर्ति उल्लूर आदि की कहानियों के कथानक का संक्षिप्त में उल्लेख किया गया है।
भारत जैसे बहुल भाषी देश में भावात्मक एकता के लिए सभी भाषाओं को समानरूप से महत्त्व देना नितांत ज़रूरी है। डॉ. तिप्पेस्वामी ने अपने निबंध ‘भावात्मक एकताः कुछ सवाल, कुछ समाधान’ में अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को पाठकों के समक्ष रखा है कि देश की सारी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ है न कि केवल हिंदी। हिंदी को अपने सर्वांगीण विकास के लिए पटरानी बनने की जगह दूसरी भाषाओं की सखी बनना चाहिए। अवश्य, हिंदी बृहत्तर भारत को जोड़ती है तथा दूसरी भाषाओं के लिए सेतु का काम करती है, मगर देशवासियों में भावात्मक एकता के सूत्र तो तभी स्थापित हो सकते हैं, जब उत्तर भारत का व्यक्ति दक्षिण भारत की तेलुगु, तमिल, मलमालय और कन्नड़ भाषाओं में से किसी एक भाषा को सीखें और दक्षिण भारत का निवासी उत्तर भारत की हिंदी समेत किसी दूसरी भाषा को सीखें। इससे सभी भाषाएँ जीवित रहेगी, वरन् भावात्मक एकता के सूत्र भी मज़बूत होंगे। हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दुस्तान के हर विश्वविद्यालय से एक हिंदी पत्रिका का प्रकाशन होना चाहिए। यही नहीं, अनुवाद ही एक ऐसा माध्यम है जो भावात्मक एकता को असंदिग्ध रूप से बढ़ावा देता है।
उनके निबंध ‘कर्नाटक में हिंदी प्रचार की गतिविधियाँ’ में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभी की पत्रिका ‘हिंदी प्रचार समाचार', रेडियो और दूरदर्शन के प्रोग्राम, कर्नाटक सरकार द्वारा हिन्दी लेखकों और अनुवादकों को पुरस्कृत करना तथा विभिन्न स्वैच्छिक संस्थानों की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।
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पत्रिका में डॉ. तिप्पेस्वामी ने एक कुशल अनुवादक होने के कारण अपने आलेख ‘काव्यानुवादः एक पुनसृजन’ में काव्यानुवाद की कठिनाइयों और उनके समाधान पर सूक्ष्मता से प्रकाश डाला है। काव्यानुवाद के कई उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया है कि काव्यानुवाद पुनसृजन की प्रक्रिया है तथा कविता का अनुवाद केवल कविता में ही हो सकता है, न कि गद्य में। उनकी दृष्टि में सफल अनुवाद वही हो सकता है जिसमें मूल (स्रोत) भाषा के प्रति निष्ठा और लक्ष्य भाषा में सहजता झलकती हो। कविता का शब्दानुवाद नहीं हो सकता है, भावानुवाद ही श्रेष्ठ अनुवाद बन सकता है।
डॉ. तिप्पेस्वामी ने अपने आलेख ‘कन्नड़ साहित्य की समकालीन प्रवृत्तियाँ’ में कन्नड़ काव्य, कन्नड़ उपन्यास, कन्नड़ नाटक, ललित निबंध जैसी सभी विधाओं पर विस्तारपूर्वक वर्णन किया है जबकि अपने अन्य आलेख ‘शरण साहित्यः एक परिचय’ में लिंगायत धर्म की विशेषताओं का उल्लेख किया है। इस धर्म में परमात्मा को निराकार निर्गुण और अलख के रूप में माना जाता है। इसके अतिरक्ति, शरणों ने आध्यात्मिक साधना मार्ग में स्त्री के समान अधिकारों की वकालत की है। जातिविहीन समाज की परिकल्पना भी इस धर्म की प्रमुख विचारधारा है। निर्गुणवादी शरणों के प्रतिनिधियों के रूप में बसेश्वर, अल्लमप्रभु, अक्कमहादेवी आदि का संक्षिप्त परिचय देते हुए लेखक ने उनके उच्च विचार, उदारवादी चिंतन, आध्यात्मिक साधना, सामाजिक समरसता, धर्म-साधना के इतिहास में वैचारिक क्रांति की खुले मन से तारीफ़ की है।
इस कृति के अंतिम आलेख ‘कन्नड़ लोक साहित्य’ में कर्नाटक की लोक-संस्कृति, पुराण, गीत, कहावतें, कलाएँ, नाट्य, पहेलियाँ, लावनियाँ, महाकाव्य, क्रीड़ाओं और जादू-टोने आदि की रस्मों का गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है।
अगर कोई भी हिन्दी पाठक कर्नाटक की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक परिवेश को बारीक़ी से देखना, परखना और जानना चाहते हैं तो डॉ. तिप्पेस्वामी की यह रचना शोधार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।
मुझे आशा ही नहीं वरन् पूर्ण विश्वास है कि डॉ. तिप्पेस्वामी जी की इस कृति का हिन्दी जगत में भरपूर स्वागत होगा। इन्हीं चंद शब्दों के साथ मेरी लेखकीय प्ररेणा के स्रोत, अनुवादक गुरु, श्रद्धेय डॉ. तिप्पेस्वामी के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ, उन्हें शत-शत नमन करता हूँ और इस पुस्तक की भूमिका लिखने का गौरव प्रदान करने के लिए हार्दिक धन्यवाद देता हूँ।
दिनेश कुमार माली
तालचेर, ओड़िशा”
वे अत्यंत ही दयालु प्रवृत्ति के थे और कनीय लेखकों को सम्मान देना जानते थे। ‘कन्नड़ के शिखर कवि कुवेम्पु तथा अन्य निबंध’ पुस्तक में उनके द्वारा लिखे गए ‘दो शब्द’ से आप जान सकते हैं।
“कन्नड़ के शिखर कवि कुर्वेषु तथा अन्य निबंध मेरे ग्यारह साहित्यिक निबंधों का संग्रह है। इसमें संकलित निबंध अलग-अलग समय पर लिखे गए और अलग-अलग ग्रंथों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पाठकों का ध्यानाकर्षण करने में सफल हुए हैं जोकि मेरे लिए गर्व का विषय है। जब ये निबंध छपे थे, तब पाठक मित्रों ने इनकी सराहना की थी। ये निबंध कन्नड़ साहित्य पर केंद्रित हैं।” भावात्मक एकता: कुछ सवाल, कुछ समाधान निबंध भावात्मक एकता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालनेवाला है। यहाँ का हर निबंध चर्चित विषय पर गंभीरता से विचार करता है।
यहाँ के निबंध मुख्यतः कन्नड़ साहित्य पर केंद्रित हैं। यहाँ कन्नड़ साहित्य की वर्तमान झलक को अखिल भारत के स्तर पर प्रस्तुत करने का नम्र प्रयास है। सो भी, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कुर्वेषु के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय इस संग्रह के लेखों के माध्यम से भारतीय पाठकों तक पहुँचेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
प्रस्तुत संग्रह ‘इंडिया नेटबुक्स’ से प्रकाशित हो रहा है, जिसके मालिक श्री संजीव कुमार जी का मैं ऋणी हूँ और इस संग्रह को सम्भव बनाया मेरे प्रिय एवं आत्मीय मित्र दिनेश कुमार मालीजी ने। श्री दिनेश कुमार मालीजी इस संग्रह के लेखों को पढ़कर ऐसे प्रभावित हुए कि उन्होंने इन्हें पुस्तकाकार में प्रकाशित कराने का निश्चय करके इसके लिए एक सुंदर भूमिका लिखी है। उन्होंने ही इंडिया नेटबुक्स वालों से संपर्क करवाया और अब ये सारे निबंध आपके हाथ में हैं। इस संदर्भ में भाई श्री संजीव कुमार जी तथा श्री दिनेश कुमार माली जी के प्रति मैं आभारी हूँ। मेरी प्रिय आत्रा एवम् सरकारी कॉलेज की हिन्दी अध्यापिका श्रीमती के.एस. कटुणालक्ष्मी ने इस पुस्तक के प्रकाशन के संदर्भ में हार्दिक सहयोग दिया है, अतः मैं उनके सहयोग का स्मरण करता हूँ।
डॉ. तिप्पेस्वामी,
दूरभाष: 9448181562”
अचानक उनके हमारे बीच से चले जाना मुझे न केवल मर्माहत कर रहा है, बल्कि एक विचित्र ख़ालीपन का अहसास हो रहा है। प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी के निधन से देश ने एक महान सारस्वत पुत्र खो दिया हैं।
मैं उनकी दिवंगत आत्मा के प्रति अश्रुल श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परमपिता ईश्वर से उनकी आत्मा के सद्गति की प्रार्थना करता हूँ कि वे उन्हें अपने चरणों में स्थान प्रदान करें और अनंत से उनका आशीर्वाद हमें प्राप्त हो ताकि आजीवन साहित्य की अमूल्य कृतियों पर अपनी क़लम चला सकें।
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