हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श
माटी व मनुष्यता की अनूठी चेतना के कवि हलधर
(‘अछूत’ महाकाव्य व अन्य कविताओं के परिप्रेक्ष्य में)
-डॉ. सी. जय शंकर बाबू
एक प्रचलित उक्ति है, “रवि नहीं देख पाने वाली जगह को भी कवि देखता है।” पीड़ितों के मन की गहराइयों तक पैठ लगाने में कविकर्म की अद्भुत क्षमता होती है। कवि की वाणी से समूची सृष्टि के प्रत्येक कण की संवेदना सुन पाने का अवसर जन-जन को सहजतः मिल जाता है। हर किसी के संघर्ष को आवाज़ देकर सर्वत्र चेतना जगाने में कवि की महती भूमिका होती है। कवि पीड़ितों की संवेदनाओं को अपनी संवेदना मानते हुए प्रतिरोधी साँसों के लिए संबल बन जाता है। लोक कविरत्न हलधर नाग के मामले में उक्त उक्ति चरितार्थ होने के साथ, ये तमाम बातें भी कई दृष्टियों से सार्थक लगती हैं। ओड़िशा के किसी अंदरूनी इलाक़े में रहनेवाले सीधे-सादे कवि हलधर का चिंतन वैश्विक स्तर का है और वे पूर्ण प्रतिबद्ध चेतना के साथ समूचे राष्ट्र व अपनी माटी के पक्ष में हमेशा वाणी देते हैं। सादा जीवन और उच्च विचारों के वे जीवट पुरुष हैं। उनकी कविता में अपनी माटी के प्रति श्रद्धाभाव अकूत भरा हुआ है। इंसानियत और जीवकोटी के कल्याण के प्रति कवि प्रतिबद्ध हैं। कवि की चेतना के अभिन्न तत्त्वों के रूप में माटी और मनुष्यता उनकी हर पंक्ति में हम देख सकते हैं। कविवर हलधर यह मानते हैं कि कवि ब्रह्मा की तरह स्रष्टा होता है। स्रष्टा होने की बात उन पर भी निश्चय ही लागू होती है। अतः हम बेहिचक कह सकते हैं कि हलधर की कविता माटी के प्रति प्रतिबद्धता व मनुष्यता के आग्रह की कविता है।
माटी
स्वामी विवेकानंद पर केंद्रित एक कविता में वे कहते हैं–
विदेश से लौटकर आए स्वदेश स्वामी विवेकानंद;
भारत भूमि को छूते ही मिला उन्हें परम आनंद।
(‘कहानी खत्म’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 88)
भारत की माटी को छूते हुए स्वामी विवेकानंद को परम आनंद मिलने की बात करने वाले कवि हलधर अपनी माटी के प्रति उतने समर्पित हैं कि एक कविता में एक बुढ़िया के मुँह से कहलवाते हैं:
सात पीढ़ियों की मिट्टी है, जिसे मैं नहीं सकी बिसरा।
(‘मिट्टी का आदर’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 95)
उसी कविता की एक और पंक्ति में संवेदनात्मक स्वर में वह बूढ़ी औरत कहती है:
“असली धन जन्मस्थान की मिट्टी है, जिसे मैं ले जा रही हूँ
जहाँ मैं मरूँगी, डालना इस मिट्टी को ही
दुलना बूढ़ी की आत्मा को शान्ति मिलेगी तभी।
(‘मिट्टी का आदर’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 95)
मिट्टी के साथ कवि हलधर का कोरे भावनात्मक सम्बन्ध नहीं है, उस मृदा की रक्षा के लिए वे अपनी समूची चेतना को समर्पित करते हैं।
मिट्टी और मिट्टी की उपज ही जगत में ज़िन्दगी बचाने के लिए अपेक्षित हैं। कवि चेतावनी देते हुए संवेदनात्मक स्वर में कहते हैं:
भारत की मिट्टी हुई पथरीली, जीव होगा नाश
(‘चेतावनी’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 83)
इसी कविता में कवि की चेतना व संवेदना देखिए:
उच्च उपज योजना के नाम पर पूरे देश को पिला दी घुट्टी
रसायन, कीटनाशकों से प्रदूषित हुआ जल, वायु, मिट्टी
(‘चेतावनी’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 83)
मिट्टी के पारखी, मिट्टी से उपज फ़सल के रूप में उगाकर जीवकोटि को खिलानेवाले अन्नदाता किसान की स्थिति के प्रति आवाज़ देना व उनका पक्षधर बनना माटी के कवि की चेतना के अनिवार्य पहलू हैं।
उर्वरक, कीटनाशक, बीज बेचती विदेशी कंपनी,
मीठे गुड़ का आनंद लेती, सभी का धन चूसती
किसान के गले में फाँसी का फँदा, सिर पर हाथ बारह मास
किसान के गले में फाँसी का फँदा, होता भिखारी बनने को विवश,
किसान के गले में फाँसी का फँदा . . .
लाखों जीवों को पोसते कहाँ मिलेंगे वे किसान
ऋण में डूबकर माँगते फिर सरकारी ऋण
देखें उनकी दुर्दशा, बाँस की तरह भीतर से पोला;
देखें उनकी दुर्दशा, किसान लगता जैसे बैंगनी गोला,
देखें उनकी दुर्दशा . . .
(‘चेतावनी’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 83)
मिट्टी ही नहीं मिट्टी के पारखी, मिट्टी में अपना पसीना-लहू सिंचित करनेवाले किसान के प्रति भी हलधर नाग की पूर्ण निष्ठा, प्रतिबद्धता और श्रद्धा है। संयोग से उनका नाम भी हलधर है, हलधर किसान के प्रति समर्पित कवि है। उनकी असंख्य कविताएँ मिट्टी के प्रति अमिट श्रद्धा प्रकट करने के साथ-साथ उसके प्रति अपने दायित्व निभाने की पूर्ण चेतना से प्रतिबद्ध हैं। माटी का ऋण चुकाने और माँ पृथ्वी को बचाने के लिए कवि हलधर सदा प्रतिबद्ध व सन्नद्ध नज़र आते हैं। उनकी वाणी में माटी के प्रति असीम श्रद्धा हर पल झलकती है। व्यक्तिगत रूप से भी वे प्रकृति के साथ जीते हैं। उनकी समूची चेतना में प्रकृति की ओज भरी हुई है। प्रकृति की रक्षा के लिए वे पूर्णतः प्रतिबद्ध हैं। ये ही गुण उन्हें लोक कवि की दर्जा सहजतः प्रदान करते हैं।
मनुष्यता
छुआछूत इंसानियत के लिए बड़ा कलंक है। मानव-मानव के बीच अमानवीय व्यवहार का वह दुराचार है। इस दुराचार की नींव को सदियों पूर्व से दिखाते हुए रामायण में भी इसकी आभास दिलाकर भगवान राम के माध्यम से अछूतोद्धार के बहाने ईश्वर की समतापूर्ण दृष्टि को साबित करते हुए ममता, समता, मानवता के आग्रही के रूप में ही नहीं, न्याय निर्णेता के रूप में भी नज़र आते हैं कविवर हलधर नाग।
‘अछूत’ महाकाव्य का केंद्रीय चरित्र शबरी है। कवि ने त्रेता के समाज में, वह भी आश्रम जीवन बिताने वाले तथाकथित उच्च वर्ग के शिष्यों में छुआछूत की भावना एवं दुर्व्यवहार के मार्मिक चित्र खींचकर मानवता की प्रतिष्ठा व समन्वय की बड़ी चेष्टा करने वाले कवि हलधर गोस्वामी तुलसीदास को अपने गुरु मानते हैं। ‘अछूत’ महाकाव्य में तुलसीदास को प्रणाम कहते हुए वे कहते हैं:
जुहार-जुहार, गुरु महाप्रभु
कवि, ओ तुलसीदास
तुम्हारे लेखन के किस कोने से
करूँ मैं लिखने की आश।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 96)
भील परिवार में पैदा होने वाली शबरी के मन में जीवकोटि के प्रति दयाभाव का चित्रण बड़े ही संवेदनापूर्वक कवि ने किया है:
कल होगी ‘मडुआ’ के नीचे
भैंस की दावत वहाँ
सब शबर खाएँगे भरपेट
कुछ वराह भी कटेंगे वहाँ।
शबरी की आँखों में नींद नहीं, पूरी रात
बिस्तर पर करवट बदलती रही सोच
आँखों के आगे देखकर, जानकर भी
क्यों लगे मुझे पाप की मोच?
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 97)
शबरी के अंतर्मन में जीवदया की भावनात्मक लहर उमड़ पड़ती है:
मैं ख़ुद जीव मेरे ख़ातिर
बीस जीवों का संहार
हे प्रभु! मेरे सिर पर पाप
भाड़ में जाए घर-संसार।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 97)
अवसर था शबरी के विवाह महोत्सव की पूर्व संध्या। आगले दिन सुबह शादी की दावत के मौक़े पर कई सूअर काटे जाएँगे स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर परोसने के लिए। अहिंसा की पुजारिन शबरी यह सपने में भी नहीं चाहती है कि उनके ख़ातिर कई जीवों का संहार हो। यह सोचकर शबरी उसी रात भीषण अंधकार में मौक़ा पाकर पहले सूअर-बल (सूअरों के रखने का स्थान) में जाकर डंगिया खोलकर उन्हें मुक्त कर देती है। और वह अपनी मुक्ति का भी रास्ता तय कर लेती है। जीव-दयाहीन परिवार-समाज में रहने से बेहतर जंगल की दुर्गम राह पकड़ने में भी वह नहीं हिचकिचाती। इस स्थिति का हृदय विदारक वर्णन कवि हलधर ने किया है। कुछ पंक्तियाँ देखिए:
जगह-जगह गिरती-पड़ती
पाँवों में लताओं की बेड़ी
फूट गए घुटने, फूट गई कोहनी
जाँघें गई रगड़-रगड़ी।
चट्टानों पर लड़खड़ाई, पेड़ों से टकराई
चेहरे, कान, गर्दन पर घाव
ख़ून से सनी काया
टपकता रक्त बूँद-बूँद पाँव।
भागती गई नाक की सीध
न थकी, न रुकी
सअं सअं फअं फअं
साँसें फूली उसकी।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 98, 99)
घर से मुक्त होकर शबरी सुदूर जंगल में जाकर रक्त-सिक्त अवस्था में बेहोश होकर गिर पड़ती है। संयोगवश वह वनप्रांत मुनि मातंग के आश्रम के आसपास का प्रदेश था।
तथाकथित अछूत के प्रति समाज कितना अमानवीय व्यवहार करती है, इसका भरपूर मार्मिक वर्णन किया है कवि हलधर ने। मुनि मातंग के उदात्त संस्कारों से दीक्षित आश्रमवासी शिष्य भी शबरी के प्रति छुआछूत की भावना से कटु वचन कहते हैं:
शिष्यों ने पहचाना, “छिः! छिः!”
नीच जात की शबरन
नाक-भौं सिकोड़ गुरु से बोले
‘चलो, जल्दी करो निगमन’।
कोई अछूत शबरन
पड़ी कहीं से अधम
किसी ने मार फेंक दिया
शायद की हो दुष्कर्म।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 102)
आज हर दिन अख़बारों के पन्नों, टीवी पर्दों पर कहीं न कहीं हाशिए के लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार और दुष्कर्म की ख़बरें पढ़ने, सुनने, देखने को मिलती हैं, उन्हें कविधर मुनि मातंग के शिष्यों की उक्त पंक्तियों के माध्यम से उकेरते हैं उपेक्षितों के पक्षधर बनकर।
मुनि, देवी-देवता निश्चित रूप से मानव-मानव के बीच किसी भेदभाव को नहीं मानते। समदृष्टि रखनेवाले मातंग मुनि अपने शिष्यों के दुर्व्यवहार को वारते हुए कहते हैं:
गुरु ने कहा, वह शबरन नहीं है
श्वेत-धवल क्षीर समंदर
जिस समुद्र में रहते भगवान विष्णु
बनाकर अपना घर।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 102)
मातंग मुनि ने शबरी को उस दयनीय स्थिति से बचाकर अपने आश्रम में जगह दी। आमतौर पर छुआछूत मानने वाले अमानवीय शैतानी प्रवृत्ति के होते हैं। मुनि मातंग के शिष्य भी ऐसे ही शैतान ही साबित हुए। मुनि आश्रमवासी व शिष्य होकर भी गुरु के समझाने के बावजूद शबरी के प्रति हीन दृष्टि रखते हैं। गुरु के कार्यों के विरोध में उनकी कानाफूसी बढ़ते देख मुनि मातंग ने पोखरी के उस पार निर्जन जगह शबरी को कुटी बना कर दी। शबरी ख़ुशी से गुरु वचन स्वीकार वहाँ रहने लगी। मगर वहाँ रहते समय भी मातंग मुनि के शिष्यों का अमानवीय व्यवहार समय-समय पर शबरी को सहना पड़ता है।
“अचानक ढेले पत्थरों की वर्षा हुई
शबरी के शरीर
‘मदद करो, हे गुरु! मैं मर रही हूँ’
किया उसने चीत्कार।
एक पत्थर लगा उसकी ठुड्डी पर
सिर खाने लगा चक्कर
होने लगा ख़ूनी वमन
शबरी हो गई वही ढेर।
तुरंत-तुरंत गुरु हाज़िर
सुन शबरी की चीत्कार
कहा, “तुम्हारी इस दशा का दोषी
मातंग ऋषि का सत्कार।”
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 109)
आदिवासी स्त्री शबरी की जंगल के नर पशुओं (संस्कारित कहलाने वाले मानव) के बीच दयनीय स्थिति में देखकर पत्थर भी पिघल सकते हैं। मगर मुनि आश्रम में दीक्षित तथाकथित शिष्य नराधम के रूप में शोषण अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हुए दुर्व्यवहार करते हैं। ऐसे नराधमों को दूषित, दंडित करने में हमारा समाज सदियों से असफल ही नज़र आ रहा है। इसका चित्रण बड़े मार्मिक ढंग से किया है कवि हलधर ने।
मुनि मातंग शबरी को पुनः बचाते हैं। शिष्यों के आमानवीय व्यवहार से चिंतित वे कहते हैं:
गुरु ने कहा, “नष्ट होता है मनुष्य
हमेशा अपने स्वभाव से, भाई
मुनि शिष्य से होकर भी किया अधर्म
दुखी है गंगा माई।”
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 110)
गुरु मातंग अपने अंतिम समय की बात जब शबरी को बताते हैं, वह रो पड़ती है, आख़िर उनके रक्षक गुरु के जाने से उसकी रक्षा कौन करेंगे? वह अपनी संवेदना व दीनता गुरु के समक्ष प्रस्तुत करती है:
सिसक-सिसककर बोली शबरी
पकड़ गुरु के चरण
“अगर छोड़कर चले गए गुरु,
कौन देगा मुझे शरण?”
पूर्वजन्म के पापों से जन्म लिया
मैंने अछूत घर
दौड़ा-दौड़ा कर मारते यहाँ-वहाँ
जैसे मैं जानवर।
अछूत होने से आश्रम में
मुझे नहीं मिला है स्थान
आदेश दे गुरु के साथ
तज दूँगी प्राण।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 111, 112)
मुनि मातंग ने शबरी को सांत्वना देते हुए आश्वस्त किया:
“मरने की बात मत करो, शबरी, ”
गुरु बोले, “जिंदा रहो”
काले बादलों के नीचे घर बनाई हो
भले ही पत्थर गिरे, मगर सहो।
***
“तुझे शबरी जीवित रहना होगा
पाने को असल धन
कहता हूँ आज, इस देह में तुझे
राम देंगे दर्शन।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 112)
मुनि मातंग अपने शिष्यों को आश्रम का भार सौंपकर योगमुद्रा में बैठकर अनंत ज्योति में अंतर्लीन हो गए।
राम के प्रसंग को लेकर मन ही मन भाव-विभोर होकर सोचते हुए शबरी पुनः अपने प्रति जग के अमानवीय व्यवहार को भी राम से कहने के बारे में सोचती है:
नहीं मानते छुआछूत
भेदभाव नहीं तुम्हारे पास बिलकुल
अछूत शबरी को क्यों छू लिया तुमने
कहीं डूब न जाए तुम्हारा कुल।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 115)
शबरी के निर्मल प्रेम व भक्ति से राम अभिभूत होकर शबरी की कुटी जाने की बात जब लक्ष्मण से कहते हैं कि ‘शबरी मेरी गर्दन खींच रही है’ तब लक्ष्मण क्रोधित होता है, तो राम उसे समझा देता है:
राम ने कहा, “अरे, लक्ष्मण
तुम बात कर रहे हो जैसे हो मूर्ख
सौ राम को दबा सकती है
अकेली शबरी अपनी काँख।”
“तुम देख नहीं सकते कितनी मज़बूती से
बँधा हूँ मैं उसके प्रेम-बंधन
सुत भाव से कहूँगा शबरी
ढीली कर दो मेरी गर्दन।”
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 122, 123)
राम और लक्ष्मण के बीच आगे के संवाद के क्रम में राम अपने अनुज लक्ष्मण को यह भी स्पष्ट करते हैं:
“अरे, लक्ष्मण! तिलक चंदन
ललाट की शोभा
गिरते पड़ते जाना, नाम-कीर्तन
यह तो मात्र लोक-दिखावा।”
भीतर यदि हिंसा-अहंकार
क्रूर-कपट, धोखा, छल
भले ही, वे मुझे आजीवन पुकारे
नहीं मिलूँगा उन्हें बिल्कुल।
माटी के पुतले जैसी शबरी से
करते हो ईर्ष्या
ख़ून, मांस, हड्डियों को भेदकर
मानस-पटल पर छाई वह शिष्या।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 125, 126)
वैष्णव भक्ति के आचार्य जिस नवधा (नव विध) भक्ति अथवा प्रपत्ति मार्ग पर चलने वाले भक्तों को विष्णु के श्रीचरणों की सहज प्राप्ति को मानते हैं, गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरितमानस के अरण्यकांड में भक्ति के नौ रूपों का वर्णन राम की वाणी में प्रस्तुत किया है। अरण्यकांड में ही मैं दो संदर्भों में राम स्वयं नवधा-भक्ति की विशिष्टता के बारे में बताते हैं। पहला प्रसंग सीता सहित राम-लक्ष्मण गोदावरी तट पर पर्णकुटी में रहते संदर्भ का है, जहाँ लक्ष्मण की जिज्ञासा की संतुष्टि के क्रम में श्रीराम की वाणी से नवधा भक्ति का संकेत मिलता है। और दूसरा संदर्भ सीतापहरण के बाद उन्हें ढूँढ़ने लक्ष्मण सहित राम वनों में भ्रमण करते हुए शबरी के आश्रम पहुँचते हैं, उस संदर्भ साध्वी शबरी की जिज्ञासा की पूर्ति के लिए श्रीराम नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं:
“नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरूँ मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
गुर पद पकंज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहू करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हर्ष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।”
(गोस्वामी तुलसीदास, (टीकाकार-हनुमानप्रसाद पोद्दार), श्रीरामचरितमानस, गीताप्रेस, गोरखपुर, पृ. 651, 652)
नवधा भक्ति में सारवत क्रमशः नौ प्रकार की भक्ति की अपेक्षा है–1. संतों का सत्संग 2. राम-भक्ति कथा प्रसंग में प्रेम 3. अभिमानरहित होकर गुरु की सेवा 4. कपट छोड़कर राम का गुणगान 5. राम मंत्र जाप और राम में दृढ़विश्वास 6. इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र) व धर्माचरण 7. जगत् भर को समभाव से देखना 8. प्राप्ति से संतुष्टि और पराए दोषों को न देखना 9. सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना।
गोस्वामी तुलसीदास ने नानापुराण निगमागमों के सार को राम के मुख से जिस नवधा भक्ति के रूप में विवेचित किया उसके और सरल बनाकर कविवर हलधर ने मानव के प्रति मानववत व्यवहार (सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव) करना ही राम को पाने के सर्वेत्तम उपाय के रूप में पेश किया है।
इस क्रम में राम का दर्शन मिलने पर शबरी अपने ढंग से भोली-भाली ममतापूर्ण उनकी सेवा-सुश्रुषा करने के बाद राम से अपनी आंतरिक संवेदना मार्मिक रूप से निवेदित करती है। यह निवेदन कविवर हलधर नाग की मौलिक उद्भावना है। दलितोद्धारक कवि की वाणी शबरी का वाणी बनकर राम के सामने प्रस्तुत होती है। उसका वास्तविक अर्थ आधुनिक समय के परिप्रेक्ष्य में ‘अछूत’ महाकाव्य में कविवर हलधर ने राम की वाणी में ही पेश किया है। क्रूर, कपट, धोखा, छल करनेवाले भले ही तिलकधारी हो, नाम संकीर्तन गाते हो, राम उनके चेहरा एक बार भी नहीं देखना चाहते हैं। तथाकथित अछूतों के उद्धारक के रूप में राम को पेश करते हुए कवि पीड़ितों के पक्षधर होकर वास्तविक मानवीय धर्म की स्पष्ट परिभाषा देते हैं:
राम के पैर पकड़ बोली शबरी
“दुख की बात सुन
मैं किससे कहूँ, क्या बताऊँ,
दुनिया के अवगुण?”
नाम की मैं मनुष्य योनि में पैदा हुई
असल कुत्ते से भी हीन
यह बात बताने के लिए
मैं गिन रही थी अपने दिन।
मेरे पानी के छींटे से वे डरते हैं,
दूर से करते मुझसे बात,
वे कपड़े धोते हैं
अगर मेरे शरीर से छुई हवा, करती उन्हें आघात।
“गुरु ने कहा था छप्पन कोटि में
मानव-जीवन ही सार
मिलने-जुलने का फिर क्यों
नहीं मेरा अधिकार।
क्या मैंने किसी की गाय मारी या किया कोई पाप
नाक-भौं वे सिकोड़ते इतना
अछूत कहकर ठुकरा देते मुझे
सारा जगत जितना।
सभी मनुष्यों को बनाने के बाद
बचे-खुचे कीचड़ से, हे विभु
क्या उस मिट्टी से मुझे बनाया?
मुझे बताओ, मेरे प्रभु!।
मुझे चाहिए था गुरु के पीछे मर जाना
रह गई उनकी बात मान
क्या लाभ, क्या उपलब्धि इस जीवन में
सभी ने देखा मुझे हीनमान।
पूरी दुनिया का अभिशाप मैं हूँ
धिक यह जीवन धिक
अछूत जन्म लेकर मुझे
मर जाना ही ठीक।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 128, 129)
तथाकथित अछूत होने से समाज की अमानवीयता जो झेलनी पड़ती है, उस गहन संवेदना को शबरी राम के समक्ष बड़ी वेदनापूर्वक प्रकट करती है। उक्त पंक्तियाँ पढ़कर पत्थर भी पिघल सकता है दुःख से, मगर छुआछूत माननेवालों की अमानवीयता बदलती क्यों नहीं? कवि हलधर शबरी की वाणी में आख़िर राम से इसका समाधान प्रस्तुत करवाते हैं। अपनी भावनाओं को बड़े ही सहज ढंग से स्पष्ट करते हुए कविवर हलधर नाग मानवीयता को झकझोर देते हैं। अभिशप्त जीवन जीते हुए तड़पनेवाली शबरी के मन में संवेदना उफ़ान के रूप में उठकर राम के समक्ष दीनतापूर्ण वाणी में प्रकट विचार अक्षरशः जायज़ हैं। राम से सीधा सवाल करने की वह अधिकारिणी है।
शबरी की बातें सब सुनकर राम कहते हैं:
“मैंने बहुत कोशिश की पाश को तोड़ने की
मेरी ताक़त हो गई कम
ज़बरदस्ती खींचा चला आया तुम्हारे पास
कौन है दुनिया में तुम्हारे सम?
“अगर दुनिया कहती है तुम हो
अछूत शबरी
फिर क्यों खिलाई मुझे
अपनी झूठी बेरी?
“तुम्हारे चाटने से
क्या राम नहीं हुए अपवित्र
फिर भी तुम कहती हो अछूत शबरी
है शबरी अछूत।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 130)
लोककवि रत्न हलधर नाग मानवीयता के महान कवि हैं। ‘अछूत’ महाकाव्य को आगे चार पंक्तियों में अंत करते हैं:
अछूत शबरी का खाना खाकर
हुए अछूत राम
नाम पड़ा उस दिन
पतित पावन राम।
(‘अछूत’, हलधर नाग का काव्य-संसार, पृ. 130)
दुनिया की आँखों में राम के दर्शन से मुक्ति पानेवाली शबरी को लोग यदि ‘अछूत’ ही मानेंगे, उनके अज्ञान पर कविवर हलधर की उक्त पंक्तियाँ बड़े ब्रह्मास्त्र हैं, जिसमें वे तर्क-युक्ति प्रस्तुत करते हैं। शबरी को ‘अछूत’ ही मानता है लोक, तो शबरी का खाना खाकर ही तो पतित पावन कहला रहा है राम। यदि राम पतित जन रक्षक हैं, लोक पूजक हैं तो यह अमानवीयता उसी राम से ख़त्म हो जानी चाहिए। अन्यथा राम भक्ति का कोई अर्थ नहीं निकलता। इंसान को इंसान के रूप में देखना ही सच्ची राम भक्ति है। ‘अछूत’ कहकर इंसान के साथ किये जानेवाले अमानवीय व्यवहार से बढ़कर कोई पाप नहीं। अपने साथी इंसान को अछूत कहने, अमानवीय बर्ताव करनेवाले पापियों को नरक से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। ‘अछूत’ काव्य के माध्यम से युगीन समाज से लेकर आधुनिक समाज तक फैली अमानवीय भावना को, अज्ञान को, राम के माध्यम से अंत करने की सफल चेष्टा की है कविवर हलधर ने। लोकमंगलकारी समन्वय की भावना उन्हें तुलसीदास के बराबर लोक नायक साबित करती है। संयोग से गोस्वामी तुलसीदास को अपने गुरु माननेवाले लोक कवि हलधर निश्चय ही लोक नायक हैं। सही मायने में वे मानवीयता के कवि हैं। मनुष्यता उनकी वाणी की अजस्र शक्ति है। लोककवि के लोकप्रिय पाठक, श्रोता भी निश्चय ही उनकी उदात्त भावनाओं के अनुसरण करने से अमानवीयता से कवि की लड़ाई में जीत सुनिश्चित होकर मानवीयता प्रतिष्ठित हो सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं है। माटी और मनुष्यता के मार्मिक व मधुर कवि हलधर नाग के उदात्त विचारों की बड़ी प्रासंगिकता है। सहज, सरल शब्दों में संवेदना को वाणी देकर, कुटलि, जटिल समस्याओं, प्रवृत्तियों के लिए सरलतम समाधान प्रस्तुत करनेवाले लोककवि रत्न हलधर नाग अपनी इस सहज काव्य प्रतिभा के लिए सदा अभिनंदनीय हैं। माटी और मनुष्यता के पक्षधर कवि के रूप में कविवर हलधर नाग की प्रशंसा सदा होती रहेगी, इसमें संदेह नहीं।
संदर्भ:
हलधर नाग का काव्य-संसार (मूल–हलधर नाग, अनुवादक–दिनेश कुमार माली), पांडुलिपि प्रकाशन, दिल्ली। (प्रथम संस्करण, 2020)
पुस्तक की विषय सूची
- संदेश
- हलधर नाग की सर्जना पर एक सार्थक विमर्श
- संपादकीय
- ‘हलधर नाग का काव्य-संसार’ के अनुवादक की क़लम से . . .
- कालिया से पद्मश्री हलधर तक
- युग-पुरुष पद्मश्री हलधर नाग
- कवि हलधर नाग-भारतीय साहित्य का एक विस्मय स्वर
- हलधर का काव्य-चातुर्य
- ‘रसिया कवि’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया
- चर्चा में हलधर-साहित्य: एक छोटा-सा आकलन
- माटी व मनुष्यता की अनूठी चेतना के कवि हलधर
लेखक की पुस्तकें
लेखक की अनूदित पुस्तकें
लेखक की अन्य कृतियाँ
साहित्यिक आलेख
- अमेरिकन जीवन-शैली को खंगालती कहानियाँ
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- कुछ स्मृतियाँ: डॉ. दिनेश्वर प्रसाद जी के साथ
- गिरीश पंकज के प्रसिद्ध उपन्यास ‘एक गाय की आत्मकथा’ की यथार्थ गाथा
- डॉ. विमला भण्डारी का काव्य-संसार
- दुनिया की आधी आबादी को चुनौती देती हुई कविताएँ: प्रोफ़ेसर असीम रंजन पारही का कविता—संग्रह ‘पिताओं और पुत्रों की’
- धर्म के नाम पर ख़तरे में मानवता: ‘जेहादन एवम् अन्य कहानियाँ’
- प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी के परलोक गमन से देश ने खोया एक महान सारस्वत पुत्र
- प्रोफ़ेसर प्रभा पंत के बाल साहित्य से गुज़रते हुए . . .
- भारत और नीदरलैंड की लोक-कथाओं का तुलनात्मक विवेचन
- भारत के उत्तर से दक्षिण तक एकता के सूत्र तलाशता डॉ. नीता चौबीसा का यात्रा-वृत्तान्त: ‘सप्तरथी का प्रवास’
- मुकम्मल इश्क़ की अधूरी दास्तान: एक सम्यक विवेचन
- मुस्लिम परिवार की दुर्दशा को दर्शाता अनवर सुहैल का उपन्यास ‘मेरे दुःख की दवा करे कोई’
- मेरी नज़रों में ‘राजस्थान के साहित्य साधक’
- रेत समाधि : कथानक, भाषा-शिल्प एवं अनुवाद
- वृत्तीय विवेचन ‘अथर्वा’ का
- समकालीन भारतीय साहित्य में प्रो. मीन केतन प्रधान के ‘पिता’ की सार्वभौमिकता
- समकालीन यथार्थवाद को उजागर करता प्रो. मीनकेतन प्रधान का काव्य-संग्रह ‘दुनिया ऐसी’
- सात समुंदर पार से तोतों के गणतांत्रिक देश की पड़ताल
- सोद्देश्यपरक दीर्घ कहानियों के प्रमुख स्तम्भ: श्री हरिचरण प्रकाश
पुस्तक समीक्षा
- उद्भ्रांत के पत्रों का संसार: ‘हम गवाह चिट्ठियों के उस सुनहरे दौर के’
- डॉ. आर.डी. सैनी का उपन्यास ‘प्रिय ओलिव’: जैव-मैत्री का अद्वितीय उदाहरण
- डॉ. आर.डी. सैनी के शैक्षिक-उपन्यास ‘किताब’ पर सम्यक दृष्टि
- नारी-विमर्श और नारी उद्यमिता के नए आयाम गढ़ता उपन्यास: ‘बेनज़ीर: दरिया किनारे का ख़्वाब’
- प्रवासी जीवन-संघर्षों पर आधारित धर्मपाल महेंद्र जैन का बहुचर्चित उपन्यास ‘इमिग्रेंट’
- प्रवासी लेखक श्री सुमन कुमार घई के कहानी-संग्रह ‘वह लावारिस नहीं थी’ से गुज़रते हुए
- प्रोफ़ेसर नरेश भार्गव की ‘काक-दृष्टि’ पर एक दृष्टि
- मानव-मनोविज्ञान के महासागर से मोती चुनते उपन्यासकार प्रदीप श्रीवास्तव
- वसुधैव कुटुंबकम् का नाद-घोष करती हुई कहानियाँ: प्रवासी कथाकार शैलजा सक्सेना का कहानी-संग्रह ‘लेबनान की वो रात और अन्य कहानियाँ’
- सपनें, कामुकता और पुरुषों के मनोविज्ञान की टोह लेता दिव्या माथुर का अद्यतन उपन्यास ‘तिलिस्म’
व्यक्ति चित्र
अनूदित कहानी
बात-चीत
ऐतिहासिक
कार्यक्रम रिपोर्ट
अनूदित कविता
यात्रा-संस्मरण
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 2
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 3
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 4
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 5
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 1
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