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अँधेरे के प्रकाश में 

 

देखता हूँ आकाश 
काला 
कत्थई 
और 
भयानक आकाश! 
जो लील गया है 
न सिर्फ़ सूरज को 
बल्कि 
असंख्य तारों को भी 
जिसके अँधेरे में 
समा गए हैं 
सारे मार्ग 
उन मार्गों पर चलते 
सारे मनुष्य 
प्रारम्भ और अंतिम बिंदु के बीच 
केवल ठहरा है अँधेरा 
या शायद चल रहा है 
उल्टे पैर 
प्रारम्भ से अंत की ओर 
हवा के बेतरतीब झोंके 
अनेकानेक दिशाओं-कोणों से 
ठेल-ठेलकर 
उभार रहे हैं 
आत्मा का अंधापन 
दिशाओं की 
खोयी हुई स्मृति में 
भटक रही है 
केवल गड़गड़ाहट 
यकायक तेज़ गरज! 
एक क्षण को 
चमकती है बिजली 
खुलती है मानो 
कोई स्याह आँख 
तदोपरांत 
किसी राक्षस का 
भयंकर अट्टहास 
जड़ों की कँपकँपाहट 
और हवा के तमाचों से 
डरकर 
सरसरा रहे हैं पत्ते 
चौड़ी होती जा रही है 
कविता और मेरे बीच 
अँधेरे की खाई 
धूमिल होता जा रहा है 
चेतना का पुल 
उफनती हुई नदियाँ 
और बलबलाते नाले 
समेटते जा रहे हैं 
खेत दर खेत 
फ़सल दर फ़सल 
पानी की असंख्य धाराएँ 
खरोंचती जा रही हैं 
धरती की हरी देह 
मेंढकों और चमगादड़ों की 
अस्फुट लिपि में 
बड़बड़ा रहा है 
विराट अँधेरा! 

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