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कुछ करते-करते हो जाता है कुछ-कुछ

 

गुज़रे बरस-दर-बरस गुज़रता गया वक़्त
गुज़रे बरसों में किया क्या मैंने जिया क्या
बड़ी बातें बड़े तूमार बहुत हो-हल्ला
मगर शायद यों ही गुज़रता गया मैं गुज़रते वक़्तों के साथ 
मैंने किया कुछ ख़ास नहीं
हाँ, जिया कुछ-कुछ थोड़ा, बहुत थोड़ा-सा 
उसमें कुछ भी नहीं जो कहीं दर्ज करने लायक़ हो
मगर हाँ, हुआ कुछ-कुछ करते कुछ 
यों भी तो कुछ करते-करते हो जाता है कुछ-कुछ
उसमें किया मैंने क्या? 
 
कभी-कभी यों ही हो जाता है कुछ
हलके हाथों से खींचते लकीरें
कभी नहीं भी हुआ जो तनकर डाँड चलाते लगाकर ज़ोर
धकियाया बहुत गया
कब क्यों हो जाता है कुछ, राम जाने! 
कब क्यों अकारथ होतीं सब कोशिशें, यह भी क्या कहूँ? 
मगर हक़ीक़त तो बस इतनी कि कुछ हुआ कुछ नहीं
जो हुआ उसकी ऐसी क्या ख़ुशी कि उछलता फिरूँ
चमकाए माथा चौड़ाए छाती, 
जो हुआ नहीं उसका क्या ग़म? 
क्या था जो मैंने किया, 
क्या था जो मैंने जिया? 
 
असल में तो एक खेल है
जो कि है मेरे और तुम्हारे आसपास . . . 
और खेल-खेल में बनता जाता है खेल
पहले से नहीं था जो ज्ञात
कि कुछ-कुछ करते हो जाता है कुछ-कुछ
उसमें कुछ साथ चलता है
कुछ मिट जाता है बनते-बनते छाया-प्रकाश की तरह, 
खेल को और भी ग़ज़ब और अजब कौतुक भरा बनाने। 
 
यों खेल यह जारी है हज़ारों बरसों से
और चलता रहेगा हमारे जाने के बाद भी
अभी लाखों बरसों तक . . . 
ऐसे ही अजब कौतुक से मोहता न जाने किस-किस को। 
 
और हम खेलते जाते हैं
चमकते उत्साह में चूर, 
भूलकर कि हम खेलते हैं या हमसे खेलता है कोई
छिपा हुआ धूप-छाँही परदे में? 

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