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चिड़िया

चिड़िया चहचहाती है,
नन्हे को उड़ना सिखाती है!
नन्हा कुछ घबराता है,
उड़ने से कतराता है!
नन्हे के पंख पकड़ती है,
थोड़ा उसे झिड़कती है!
नन्हा उड़ना सीख जाता है,
थोड़ा अकड़ता है फिर मुस्कुराता है,
पंख फैला देखते-देखते दूर नभ मे उड़ जाता है,
चिड़िया गर्दन उठाती है अपने पर इतराती है!
दिन साँझ में ढल जाता है,
चिड़िया का मन घबराता है,
नन्हा फिर नहीं आता है,
चिड़िया जड़ हो जाती है,
गर्दन झुका मन को यूँ समझाती है,
बड़ा हो गया नन्हा मेरा,
यह नया घोंसला बनाएगा,
अपने नन्हे को उड़ना सिखायेगा!
यही सिलसिला चलता रहेगा, 
बस यूँही-बस यूँही,
चिड़िया फिर चहचहायेगी, 
नन्हे को उड़ना सिखायेगी!

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टिप्पणियाँ

डॉ पदमावती 2021/07/13 08:05 AM

बहुत सुंदर मार्मिक कविता । जीवन की सच्चाई का बयान कितनी सटीक शब्दों में कर दिया ।,कितना सार छुपा है कविता में । सच है परिंदों से हमें बहुत कुछ सीखने का अवसर मिलता है । बहुत बहुत बधाई आपको । यूँही लिखते रहिएगा ।

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