हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श
हलधर नाग के काव्य के परिप्रेक्ष्य में लोक-साहित्य विमर्श
डॉ. सुधीर सक्सेना
हिन्दी साहित्यकार, दिल्ली
सबसे पहले तो पांडिचेरी विश्वविद्यालय, पुदुच्चेरि के प्रति हार्दिक आभार और कृतज्ञता ज्ञापन करता हूँ कि उन्होंने एक सामयिक और महत्त्वपूर्ण विषय पर वेबीनार में मुझे शिरकत के लिये आमंत्रित किया। लोक कविरत्न हलधर नाग के काव्य के परिप्रेक्ष्य में लोकसाहित्य विमर्श एक बड़े फलक को छूता है और बरबस उन संदर्भां को उद्धाटित करता है, जो हमारी मनीषा, स्मृति और वांग्मय से जुड़े हुए हैं। यह विषय लोकसाहित्य की महत्ता और उसकी मूल्यवान परंपरा को भी रेखांकित करता है और किसी भी कथा या चरित की लोक में व्याप्ति की अहमियत की भी पुष्टि करता है। मेरी मान्यता है कि क्लासिकी काव्यों और परंपराओं के बीज या स्रोत भी प्रायः लोक की स्मृति में उपस्थित या निहित होते है।
मैं हलधर नाग को जानता हूँ। हलधर नाग से कभी मिला नहीं, लेकिन उन्हें जानता हूँ और यह जानना सुखद और प्रीतिकर है। मैं उन्हें उनके काव्य के ज़रिए और उनके विशिष्ट व्यक्तित्व के ज़रिये जानता हूँ। वे लोक के कवि हैं, लोकभाषा के कवि हैं और आचार-विचार और व्यवहार में लोक से गहरे जुड़े हुए हैं। रहन-सहन और पहरावे से भी वह लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं। हलधर लोक से गहरी आसक्ति के कवि हैं। कह सकते हैं कि लोक हलधर के काव्य में ठौर पाता है। हलधर लोक का मुक्त कंठ है। हलधर लोक की स्मृतियों, परंपराओं स्वप्नों, इच्छाओं, हर्ष-विषाद और अभीष्ट को वाणी देते हैं। हलधर के काव्य में लोक की पीड़ाएँ हैं और मंगल-गान भी। जिज्ञासा हो सकती है कि मैं हलधर को कैसे जानता हूँ? तो हलधर और मेरे दरम्यान परिचय का सेतु है दिनेश कुमार माली, हिंदी और ओड़िया के समज्ञाता, कवि-लेखक और निष्णात अनुवादक दिनेश कुमार माली के अनुवाद जिसे मैं अनुसृजन कहना पसंद करूँगा के ज़रिये मैंने हलधर नाग को जाना। उन्हीं के ज़रिये मैं नाग की महत्ता को बूझ सका।
हलधर नाग को जब हम लोक कवि कहते हैं तो लोक और कवि दोनों की महत्ता हो स्वीकार करते हैं। लोक का विस्तार अपरिचित है और यहीं लोक स्मृतियों का अक्षय भंडार है। प्रसंगों और नायकों को लोक निरवधि जीवित साक्ष्य है। हिन्दी के ख्यातिलब्ध और अग्रणी आलोचक डॉ. रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि लोक की परिधि के बाहर साहित्य का कोई अस्तित्व नहीं होता तो काव्य, जो मनुष्य की सर्वोत्तम कलात्मक अभिव्यक्ति है, अपने अस्तित्व, संप्रेषण, आकर्षण, प्रभाव और ग्राह्यता के लिए लोक पर आश्रित है, लोक की कृतज्ञ है। कोई भी साहित्य विधा या कला-अभिव्यक्ति का लोक-बाह्य अस्तित्व सम्भव नहीं है। साहित्य का दायरा लोक के विस्तार के समक्ष बहुत संकुचित है। साहित्य की जड़ें लोक में जितनी गहरी और छितरी हुई होगी, उसका गाछ उतना ही ऊँचा, सघन और हरा-भरा होगा।
अब हम प्रसंगवश हलधर नाग की बात करें। हलधर लोक कवि हैं; लोक से लोक में उत्पन्न, लोक को समर्पित कवि। लोक उनकी भूमि है, परिधि है, शक्ति है, और सीमाएँ भी। वे ऊर्जा और चमक भी लोक से अर्जित करते हैं। मुझे बरबस फ़िराक़ साहब का यह शेर याद आ रहा है “दुनियाँ ने तजुर्बातो-हवादिस की शक्ल में। जो कुछ दिया है, उसको लौटा रहा हूँ मैं।” हम कुछ नया कमाल नहीं करते। अनुभव, अध्ययन-मनन, स्वप्न-कामनाओं से शब्दो से नये-नये ‘स्थापत्य’ खड़े करते हैं और यही कमाल है। हलधर नाग भी यही कमाल कर रहे हैं। सन् 1990 में पहले-पहल ‘ढोडो बरगाछ’ (पुराना बरगद) से शुरू शाब्दिक-स्थापत्य रचने का उनका अटूट क्रम अहर्निश जारी है। बड़ी संख्या में स्फुट कविताएँ और 20 महाकाव्य। हलधर अपनी युवावस्था में 16 साल रसोइया रहे हैं। वे घटसे के अनुपात, परिपाक, रस और आस्वाद के ‘भेद’ बख़ूबी जानते हैं और इसी से उनकी रचनाएँ कम समय में व्यापक भूखंड में जनमानस में पैठ सकी हैं। हलधर संबलपुरी कौसली में लिखते हैं। संबलपुरी-कौसली भाषा से जनपद में एक अल्पज्ञात बोली है। कवि प्रायः यश प्रार्थी होता है और अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करता है किन्तु हलधर ऐसा नहीं करते। वे काव्य रचना के लिए लोक में प्रचलित उपभाषा या बोली का चयन करते हैं। मनोज दास उनके काव्य में अजस्र स्त्रोत का अनवरत प्रवाह देखकर मुग्ध होते हैं, तो उत्कल विश्वविद्यालय के जतींद्र कुमार उनके जीवित मनुष्यों की आवाज़ से जुड़ने के गुण को विलियम कार्लोस से जोड़ते हैं, जो कहते है कि “स्थानिकता में ही सार्वभौमिकता है।” अनुवाद के ज़रिये हलधर के वृहत्तर विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर्त्ता दिनेश माली उनमें विश्व साहित्य की आत्मा और राष्ट्ररंग-विश्व संग की द्युति देखते हैं। इससे मेरी यह मान्यता दृढ़ हुई है कि हलधर का काव्य ओड़िशा के फ़ोकलोर का पर्याय है। लोककाव्य प्रायः सामूहिक या जातीय परंपरा का द्योतक होता है किन्तु हलधर अपने काव्य उपक्रम से लोक काव्य का पर्याय होकर उभरे हैं। गीतकार गुलज़ार कहते है, “यह कवि जब अपने गाँव की ज़मीन पर चलता है, तो लगता है मानो पूरे ग्लोब पर चलता है, और जब यह ख़ुद कहता है, यही लगता है कि इस ग्लोब पर बसे हर इंसान से बातें करता है। वह ख़ुद से कहता है “समुद्र से निधारी / माँ की छाती से बही / अमृत की बूँद / कवि की क़लम पर उतरी है।” हलधर को पढ़ते हुए मुझे रूसी कवि सेर्गेई येसेनिजु की कविता में बहता लाल-लाल गायों का धारोष्ण दूध याद आता है। मुझे बरबस याद आती है अवार कवि रसूलगयजतोव की रचनाएँ और कार्यासन कुलियेन की तरल-निश्छल भावनाओं में गुँथी निर्मल कविताएँ . . .।
कविता क्या है? कविता की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं होती। कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है। वह सर्वाधिक परिष्कृत और कलात्मक मित-कथन है, जिसमें मंत्र होने का सामर्थ्य है। वह कौंध है। आलाप है। आत्मालाप भी, प्रलाप भी, संलाप भी। ज़िरह भी, प्रतिकार भी, आर्त्तनाद भी। प्रार्थना भी। यक़ीन और आश्वस्ति भी। कविता विरेचन की देन है आसवन और रसाकर्षण की भी। उसका कोई सर्वमान्य फ़ॉर्मूला नहीं है। कविता के लिए लोक से अधिक मूल्यवान और कुछ नहीं। वह लोक से उपजती है और लोक में ही मान्यता पाती है। कविता रची जाती है और रचित को पुर्नरचित भी करती है। वह काल के अनुरूप प्रसंगों और चरित्रों की व्याख्या भी करती है। लोक की सबसे बड़ी और मूल्यवान संपदा है स्मृति। स्मृति विस्मरण के विरुद्ध सार्थक मानवीय हस्तक्षेप है। स्मृति घट का आयतन अपरिमेय है। वहाँ एक नहीं, अनेक रामयणों और महाभारतों के अच्छे-बुरे प्रसंग और मानवीय व खल पात्र उपस्थित हैं। हलधर वहीं से कच्चा माल और प्रेरणा पाते हैं। वे सारस्वत प्रतिभा हैं। उनके सरोकार स्पष्ट होते हैं, जब वे उर्मिला या शबरी को काव्य की नायिका बनाते हैं—विपन्न, उपेक्षित और दमित की नायकत्व में अवधारणा मायने रखती है। संबलपुरी-कौसली का सारस्वत प्रवाह नाग के कंठ से फूटकर हलधर-धारा बन जाता है। लोक साहित्य में सिद्धि ही हलधर को लीजेंडरी व्यक्तित्व बनाती है। उन्हीं की पंक्तियाँ हैं: झूठ बोलने से बढ़ता धन / धन बढ़ने से बढ़ता मन / मन बढ़ने से भोग / भोग बढ़ने से बढ़ता रोग / रोग बढ़ने से जाती जान / जान गई तो मिलता नरक-स्थान। हलधर नाग ऐसी ही सरल-सुबोध पंक्तियों में अपनी बात कहते हैं। उनकी सत्यनिष्ठा बरबस सत्याग्रही बापू की नैतिकता की याद दिलाती है। सुखद है कि हलधर के लेखन से ओड़िशा के लोक साहित्य की ओर वृहत्तर समाज का ध्यान गया है। लोकरत्न हलधर शतायु हों और विपुल साहित्य रचें। तदर्थ स्वस्ति कामना . . .!
पुस्तक की विषय सूची
- संदेश
- हलधर नाग की सर्जना पर एक सार्थक विमर्श
- संपादकीय
- ‘हलधर नाग का काव्य-संसार’ के अनुवादक की क़लम से . . .
- कालिया से पद्मश्री हलधर तक
- युग-पुरुष पद्मश्री हलधर नाग
- कवि हलधर नाग-भारतीय साहित्य का एक विस्मय स्वर
- हलधर का काव्य-चातुर्य
- ‘रसिया कवि’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया
- चर्चा में हलधर-साहित्य: एक छोटा-सा आकलन
- माटी व मनुष्यता की अनूठी चेतना के कवि हलधर
- हलधर नाग के ‘अछिया’ (अछूत) महाकाव्य की पड़ताल
- हलधर नाग के ‘अछूत’ और नरेश मेहता के ‘शबरी’ काव्यों का तुलनात्मक अध्ययन
- हलधर नाग का महाकाव्य ‘श्री समलेई’
- जन्मजात कवि
- हलधर नाग के काव्य के परिप्रेक्ष्य में लोक-साहित्य विमर्श
लेखक की पुस्तकें
- पबित्र मोहन प्रधान: भारत रत्न के दावेदार
- भारत रत्न के दावेदार: पवित्र मोहन प्रधान
- हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श
- हलधर नाग का काव्य संसार
- शहीद बिका नाएक की खोज
- सौन्दर्य जल में नर्मदा
- सौन्दर्य जल में नर्मदा
- भिक्षुणी
- गाँधी: महात्मा एवं सत्यधर्मी
- त्रेता: एक सम्यक मूल्यांकन
- स्मृतियों में हार्वर्ड
- अंधा कवि
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