जीवन का शून्य
काव्य साहित्य | कविता रेखा भाटिया1 Aug 2023 (अंक: 234, प्रथम, 2023 में प्रकाशित)
एक मन में आस थी, एक मन में प्यास थी
एक थी आरज़ू और एक स्वप्न था बसा
चल रही थी वक़्त से होड़ एक दौड़ में हम
तय था करना कौन आता है अव्वल इसमें
पल-पल वक़्त था बीत रहा और मैं रुकी
तिल-तिल रिस रही थी और सहम रही थी
जल रही थी उस सैलाब को थामे भीतर
पल-पल की टीस से उग रहीं थी भीतर
कई उलझनें कैक्टस बन मरू धरा मन पर
उस उमस की तपन से और मन का दरिया
काट रहा था उलझनों के जंगल दलीलों से
भौगोलिक दूरियाँ कई संकेत देती रहीं मुझे
मैं चाह कर, समझकर भी अनदेखा कर देती
वक़्त की ज़रूरतों को भविष्य ने छिपा लिया
गर्भ में और नज़रें ही चुराता रहा कहीं न भाँप लूँ
वक़्त से पहले आने वाले कल का परिणाम
बिफर पड़ूँगी क्या यह डर था उसे या साज़िश
जानकर कहीं बिफर अपना आपा खो देती
मानसिक संतुलन या बिखरकर टूट जाती
टूटी तो अब भी हूँ, बिखरी तो अब भी हूँ
जीती है मौत निकल भविष्य के गर्भ से
प्राणों ने छोड़ दिया साथ दर्द भरी साँसों का
थाम लिया मौत ने, प्राणों को मुक्ति दर्द से
न वक़्त हारा है, न ही वक़्त जीता है और मैं
जीवन के समीकरण में उलझ रही हूँ शून्य से!!!
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