नए रंग में होली
काव्य साहित्य | कविता रेखा भाटिया15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
अब के बरस होली मनाऊँ कैसे
जिस रंग में अब रँगी है दुनिया
धीरज धर उसे झुठलाऊँ कैसे
अब के बरस होली मनाऊँ कैसे
कोई उड़न खटोला उड़ रहा है
बाबुल देस की दिशा में बताना?
सोचती हूँ कब ख़त्म होगी उलझन
अबोला वनवास बन गया है जीवन
उड़न खटोले में बैठ राम लौटे थे
अयोध्या, बरसों के वनवास बाद
संग सीता और लक्ष्मण के साथ
किया अंत अधर्म का, जीती लंका
स्थापित हुई थी मर्यादा फिर से
अब की बार धर्मों और ताक़तों ने
रचा है एक अभेद चक्रव्यूह जग में
न करुणा बची है, न संवेदना कोई
इंसानों का विश्वास टूटा इंसानों पर
असहिष्णुता की भावना बलवान होती
काल ने नए रंग चढ़ाए, कई रूप धरे हैं
लेकिन असल योद्धा बन सका न कोई
भीष्म की प्रतिज्ञा का मोल अब कहाँ
धैर्यवान बन कर त्याग देना कोई न जाने
जो मानवता की बात करे, अपमानित हो जाए
इतिहास याद कर जिन्हें आज भी रोता है
चारों दिशा सातों समुंदर हाहाकार मचा है
बल से छिन्न-भिन्न कर श्वेत रंग शान्ति का
हर रंग ख़ुद को ही श्रेष्ठ मान उग्र बना है
कोई रंग भाये न मुझको, धैर्य कहाँ से लाऊँ
अब के बरस होली मनाऊँ कैसे
जिस रंग में अब रँगी है दुनिया
धीरज धर उसे झुठलाऊँ कैसे
अब के बरस होली मनाऊँ कैसे!
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