महत्वाकांक्षाएँ
काव्य साहित्य | कविता रेखा भाटिया15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
सिर उठाकर महत्वाकांक्षाएँ
मेरे भीतर मौजूद हैं
मौजूद हैं और बढ़ रही हैं
अमर बेल की तरह
चीत्कार करती हृदय में कई सूराख़ करती
किसी असाध्य रोग की तरह बढ़ रही
स्मृतियों में पीछे झाँककर देखते महसूस होता
महत्वाकांक्षा का बीज पड़ा था समझ से पहले
कुछ बनने
कुछ कर दिखाने की धुन और ललक में
खरपतवार बन लालसा उग आई मन-बुद्धि में
बुद्धि को अंधा बना
मन को रोगी बना बैठी
इन्द्रियों को जकड़ विवेक को शून्य कर गई
अब मैं मैं नहीं हूँ
महत्वाकांक्षाओं की पुतली हूँ
अब मैं यंत्रवत् वही करती हूँ
जो करवाती हैं महत्वाकांक्षाएँ
बिना सोचे-समझे, बिना सवाल-जवाब किए
पहले वक़्त भी थरथराया था
जब उसने जाना
मैं कुछ भी कर सकती हूँ, किसी भी हद तक
वक़्त ने गवाही दी थी
जब समझ आया उसे
मैं भाग रही हूँ स्वहित में
स्वार्थी ऊर्जा से पूर्ण
वक़्त से पहले और उसे भगा रही हूँ बलपूर्वक
कुछ हासिल न कर पाती
तब कोसती वक़्त को
थके वक़्त ने भागना चाहा दूर
लेकिन मैं डटी रही
वक़्त की आकांशा थी परहित की
वक़्त को भोगा मैंने बहुत
यही सोचकर . . .
सभी भोग रहे हैं, यह दुनिया ऐसे ही चलती है
वक़्त दो क़दम पीछे सरका
अब मेरे साथ बढ़ आई थीं
बहुतों की महत्वाकांक्षा
जिसका परिणाम वक़्त ने भूलना चाहा
दुष्परिणाम जब वक़्त ने पढ़ा-सुना
वक़्त बहरा हो गया
वक़्त ने आँखें बंद कर ली
युग बदल गए हैं, अंत वक़्त ठहर गया है
बदलकर वह भी महत्वाकांक्षी हो गया है
अजीब विडंबना है
महत्वाकांक्षाओं के इस जंगल में
असहाय काँव-काँव शोर मचाते
मैं क्यों आकांशा के प्रकाश की
उम्मीद बाँधे हूँ!
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