मैं सिंधी हूँ
काव्य साहित्य | कविता रेखा भाटिया15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
मैं सिंधी हूँ,
हाँ! मैंने कभी शोर नहीं मचाया।
मेरा गौत्र क्या है, जाति क्या है?
अच्छा प्रश्न है,
चाहकर भी मैं तुरंत उत्तर नहीं दे सकता।
मैं सिंधी हूँ,
यही मेरा गौत्र है, मेरी जाति है।
ब्राह्मण हूँ, वैश्य हूँ, क्षत्रिय हूँ, शुद्र हूँ?
समय की चक्की में पीसकर
मैं सभी मापदंडों को पार कर चुका हूँ।
अब मैं मात्र सिंधी हूँ। यह कोई परिहास नहीं है,
यह सत्य है।
मैं मात्र सिंधी हूँ, इसे समझने के लिए
थोड़ा इतिहास समझाना होगा।
बँटवारे में जब खींच दी गई रेखाएँ,
भारत वर्ष के नक़्शे से मिटा गया गया सिंध,
चला गया वह एक ऐसे देश में,
जहाँ न थी मेरी कोई पहचान, न कोई अस्तित्व।
हज़ारों वर्षों से था मेरा उस धरती से नाता।
मैं उस मिट्टी का बना हूँ,
सबसे पहले मेरा अस्तित्व आया भारत में।
पनपी पहली सभ्यता, बना पहला शहर,
हुआ पहले-पहल शहरीकरण का विकास।
भाषा, व्यापार, संस्कृति, सभ्यता जन्मे यहाँ।
सरस्वती-सिंध समृद्ध सभ्यता,
मेरा घर, मेरी ज़मीन, मेरा वतन।
खेत-खलिहान फले, मानव ने सभ्य बन रहना सीखा
भारतवर्ष में।
बँटवारे के दिन छूट गई मेरी मिट्टी, मेरा घर,
मेरी ज़मीन, मेरा आसमान,
मेरा आँगन, मेरा अस्तित्व।
मैं भी रोया, ख़ूब रोया।
मोहनजोदड़ो में मेरी साँसें थीं,
जिसे गठरी में बाँध कर साथ ला न सका।
टूटा-फूटा, डरा हुआ, घबराया हुआ!
सूफ़ियाना, सरल, सच्चा मैं ठुकराया गया,
भुलाया गया।
मैंने शिकायत नहीं की, मैं बेघर बिना पते के चल पड़ा,
अनजान रास्तों पर, भटकता, सिंध को सीने में साथ लिए।
लोग कहते हैं—
इतिहास में मेरा ज़िक्र कम है।
पर कोई ये क्यों नहीं पूछता,
कि मैं इतिहास से बाहर कैसे हुआ?
क्या मैं कायर था?
मैंने लड़ी एक लड़ाई।
मैंने बस तलवार की जगह चुना सहनशीलता को,
मैंने लड़ाई लड़ी लेकिन बंदूकों से नहीं,
ख़ुद के मनोबल से, ख़ुद के हौसले से,
टूटकर फिर से जुड़ने की हिम्मत से।
मैं अकेला मेहनत करता रहा,
बिना रुके, बिना थके,
मैंने न माँगी कभी भीख, न आरक्षण, न दी दुहाई
जो अन्याय हुआ मेरे साथ हुआ,
न जात, न धर्म के लिए रोया।
मैं चलता रहा, कर्म करता रहा,
जीवन धर्म निभाता रहा।
कृष्ण ने कहा है गीता में,
वही वचन मेरा सारथी जीवन में।
मैं हर दिन उगता रहा एक नए सूरज की तरह,
मैं हर दिन ढलता रहा एक सुहानी शाम की तरह।
वक़्त के साथ चलना सीख लिया।
मैं उसी धरती का पुत्र हूँ,
जिसने हेमू कालानी को जन्म दिया।
और वही हूँ
जो आज भी हर बिखरे घर में
नया संसार बसाता है।
मैं सिंधी हूँ, आत्मनिर्भर हूँ।
मैं रच-बस गया हूँ सम्पूर्ण विश्व में।
आज मैं हूँ बाज़ारों में, दुकानों में, फ़ैक्ट्रियों में,
देश-विदेशों की गलियों में, आर्थिक संस्थानों में,
धर्मशाला, हॉस्पिटल, स्कूलों में,
और हर उस दिल में
जो अपनी जड़ों को दिल में सँजोए बढ़ रहा है।
ना मैं इतिहास की एक पंक्ति हूँ,
ना किसी किताब का छूटा हुआ नाम।
मैंने बनाई है अपनी पहचान अपने बूते पर।
मैं पहचान की वह लौ हूँ
जो बुझने से इनकार करता है।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
- अधूरे संकल्प
- अनुभव
- आस्था
- आज़ादी का दिन
- इतनी-सी बात है
- ऊर्जा
- औरत देवी स्वरूप
- किसी दिन
- कोई मुँह छिपाता नहीं
- चार दृश्य
- ज़िन्दगी के चार पाए
- जीवन का शून्य
- तेरे भीतर मेरे भीतर
- थोड़ी उलझन
- धुँधला मनस्मृतियों में
- नए रंग में होली
- नमक दिलों में
- निज सन्नाटा
- पराक्रम की गाथा
- मन में राम
- महत्वाकांक्षाएँ
- मेरा मन समुन्दर बना
- मेरे अश्रु नहीं बेमोल
- मेहँदी
- मैं सिंधी हूँ
- यह चाहत
- रोशनी में आओ
- सपने की तलाश
- सफ़र
- ज़्यादा गुमान ठीक नहीं
कहानी
पुस्तक समीक्षा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं