अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

पैमाने नये आये: अवाम की आवाज़ से निकली हुई ग़ज़ल

 

 

पैमाने नये आये
ग़ज़ल संग्रह
अशोक कुमार नीरद
वर्ष-2025, मूल्य-375/-
लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नयी दिल्ली

हिंदी ग़ज़ल परंपरा में कई रचनाकार ऐसे हैं, जो मूलतः दूसरी विधाओं में रहकर हिंदी ग़ज़ल में आए हैं। उसमें भी वो रचनाकार अधिक हैं, जिनका त'अल्लुक़ हिंदी गीत अथवा नवगीत से रहा है। स्वयं दुष्यंत भी हिंदी कविता से ग़ज़ल की तरफ़ नमूदार हुए थे। उन्होंने इसकी वजह भी बताई, और वह वजह थी, अपनी बोझिलता के कारण छंद मुक्त कविता का पाठकों से दूर हो जाना। 

असल में नवगीत से ग़ज़ल की तरफ़ आने के कुछ अपने कारण भी हैं। ग़ज़ल और नवगीत अलग-अलग विधा होने के बावजूद दोनों एक दूसरे से कुछ न कुछ नज़दीक हैं। दोनों ही छान्दसिक विधा है, और दोनों का अपना तुक विधान है। अंतर मूल रूप से लहजे का है। ग़ज़ल में जहाँ पुरुषत्व बोलता है, वहीं नवगीत की विधा में कोमलता प्रमुख रही है। 

अशोक कुमार नीरद भी ऐसे ही रचनाकार हैं, जो ग़ज़ल में आने से पहले नवगीत में स्थापित हो चुके थे। नीरद दुष्यंत के समकालीन हैं। जिस समय दुष्यंत ग़ज़ल लिख रहे थे, अशोक कुमार नीरद उस समय गीत रचना में अपने को लगातार स्थापित कर रहे थे। 

मुशायरों में ग़ज़लों की लोकप्रियता ने उन्हें ग़ज़ल की तरफ़ आकृष्ट किया, इसका मतलब यह नहीं है कि वह ग़ज़ल के नए शायर हैं। अशोक कुमार नीरद पिछले पचास वर्ष से अधिक समय से ग़ज़लें कहते लिखते और सुनते आ रहे हैं, यह अलग बात है कि उनकी ग़ज़लों का पहला संग्रह 2008 में जुगनू को सूरज का भ्रम है नाम से प्रकाशित हुआ, लेकिन फिर यह सिलसिला लगातार चल पड़ा। दीवारों के जाल, अंकुर बोलते हैं, पैमाने नये आये जैसे ग़ज़ल संग्रह उनके लगातार प्रकाशित होते गए। यहाँ तक कि मुंबई विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी उनकी ग़ज़लें प्रमुखता से रखी गईं। 

अशोक कुमार नीरद की ग़ज़लें ज़मीन से जुड़ी हुई हैं, यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल के बेशतर आलोचकों के भी वह प्रिय शायर हैं। कमलेश भट्ट कमल को जहाँ उनकी ग़ज़लों का तेवर पसंद आता है, वहीं हरेराम समीप और अनिल गौड़ को उनके द्वारा ग़ज़ल में किए गए प्रयोग अच्छे लगते हैं। 

पैमाने नये आये अशोक कुमार नीरद के सौ से अधिक ग़ज़लों का संग्रह है। जिससे गुज़रते हुए उनकी ग़ज़लों के कथ्य की कसावट और बहर की पुख़्तगी का पता चलता है। नीरद जब कहते हैं:

 सबकी आँखों का नूर कंचन है
 दोषियों में शुमार दर्पण है 

तो वह उस सारी व्यवस्था को कटघड़े में लाकर खड़े कर देते हैं, जहाँ मज़लूम को ज़ालिम क़रार देने की रवायत चल पड़ी है। 

उनके ज़्यादातर शेर किसान मज़दूर और उस वंचित वर्ग के साथ हैं, जिनकी मासूमियत ने उन्हें फ़रेब में डाल रखा है। ऐसा भी नहीं है कि वह सिर्फ़ समस्या खड़ी करते हैं, बल्कि अक्सर उसका हल भी सुझाते हैं, और यही व्यवस्था उन्हें समकालीन ग़ज़लकार से अलग करती है। किसान पर हिंदी ग़ज़ल में बहुत लिखा गया। उससे सहानुभूति दिखाई गई, पर जब नीरद किसान को अपनी ग़ज़लों में लाते हैं, तो सबसे पहले इस मार्ग की कठिनाइयों के प्रति आगाह करते हैं:

 खेती करेगा ख़ाक मोहब्बत की बावरे 
 इसमें चुकाना पड़ता है ख़ुद को लगान में 

यह शेर अपनी व्यंजनावली में उस सिरफिरे लोगों के लिए भी है, जिन्होंने मोहब्बत को आसान समझ रखा है। कबीर ने कभी आगाह किया था कि यह वह रास्ते हैं जिसमें अपने घर को ख़ुद आग लगानी पड़ती है। 

शायर का ध्यान गिरते हुए नैतिक पतन पर भी है। एक समय था जब मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती थी। आज यह जगह दौलत ने ले ली है। अशोक कुमार नीरद का एक सीधा सा शेर इस सच्चाई को खोलकर रख देता है:

 दौलत बढ़ी है ख़ूब पर इज़्ज़त नहीं रही 
 इस दौड़ में ज़मीर की क़ीमत नहीं रही 

वह अपनी ग़ज़लों में सचेत करते हैं, और इस सच्चाई से अवगत कराते हैं कि वक़्त बदलने में वक़्त नहीं लगता:

 हिक़ारत से जिन्हें तुम देखते हो
 उन्हीं क़तरों से तो सागर बने हैं 

और फिर यह भी कि:

 इशारों पे मेरे चलती थी कल तक 
 वही दुनिया मुझे ठुकरा चुकी है

अशोक कुमार नीरद की ग़ज़लें कई शैली से होकर गुज़रती है। भाषा के नज़रिए से जहाँ उन्होंने हिंदी-संस्कृत का मोह अधिक रखा है, वह ग़ज़लें कमज़ोर पड़ी हैं, लेकिन जहाँ वह बोलचाल की आम ज़बान अपनाते हैं, जो हिंदी ग़ज़ल की फ़ितरत भी है, वह शेर अच्छे बन पड़े हैं। कई जगह पर बहर की बंदिश ने भी कथ्य को प्रभावित किया है। समकालीन हिंदी ग़ज़ल कई बार रूपवादी रुझानों के कारण यथार्थ और अभिव्यक्ति से दूर हो जाती है। 

कहना न होगा कि अशोक कुमार नीरद के पास ग़ज़ल का हुनर है। आसपास की घटनाओं को भी रखने के तौर तरीक़े हैं, और उसे ख़ूबसूरती से समेटने का शैली और मोडेलिटी है। यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल की नित्य बढ़ती हुई भीड़ में भी उनका चेहरा नुमायाँ नज़र आता है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक समीक्षा

कविता

बाल साहित्य कविता

साहित्यिक आलेख

नज़्म

पुस्तक चर्चा

किशोर साहित्य कविता

कविता - क्षणिका

स्मृति लेख

बात-चीत

ग़ज़ल

किशोर साहित्य कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

लेखक की पुस्तकें

  1. हिन्दी ग़ज़ल महत्त्व और मूल्यांकन