नंदन वन में कोरोना
बाल साहित्य | किशोर साहित्य कहानी डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी1 Apr 2020 (अंक: 153, प्रथम, 2020 में प्रकाशित)
एक बार की बात है, नंदन वन में एक ऐसी बीमारी फैल गई जिसका कोई इलाज न था। वन में बहुत सारे पशु पक्षी मारे गये। उसी जंगल में एक बड़ा हॉस्पिटल था जिसका नाम चम्पक चिकित्सालय था। वहाँ के डॉक्टरों ने जब बहुत खोजबीन की तो पता चला ये बीमारी पड़ोस के चिनचुन जंगल से आई है, जिसका नाम कोरोना है। ये बीमारी एक दूसरे के शरीर में आसानी से फैल जाती है और फिर उससे कितने ही लोगों में पहुँच जाती है।
नंदन वन के राजा बड़े चतुर, प्रजा प्रेमी और दूरदर्शी थे। उन्होंने इस बीमारी के प्रकोप से रोकने के लिए प्रजा के हित में कई कठोर क़दम उठाये। उन्होंने दूसरे सभी जंगलों से आने वाले पशु पक्षियों पर पूरी तरह तरह प्रतिबंध लगा दिया। जंगल के सभी संदेहादपद पशु पक्षियों के स्वास्थ्य की जाँच की गई। बीमारी को बढ़ता देख जंगल के राजा ने पूरे जंगल को लॉक-डाउन कर दिया, जिसमें ज़रूरत के अलावा जंगल में मटरगश्ती करने पर पूरी मनाही थी। ये अलग बात है कि कुछ जंगली कीड़े-मकोड़े इस आदेश के बावजूद बिना ज़रूरत घूमते-फिरते नज़र आ रहे थे।
उसी जंगल में एक बहुत पहुँचे हुए संत थे, जिनकी पूरे जंगल में प्रतापी बाबा के नाम से शोहरत थी। वो अक्सर शेर सिंह के इस ऐलान के बावजूद जंगल में फिरते रहते। उन्हें भालू, हिरण, हाथी सबने समझाया कि इस छूत की घातक बीमारी के प्रति तुम्हें लापरवाह नहीं रहनी चाहिए। ये सुनकर संत कहते.... "मैं इतना पहुँचा हुआ संत हूँ, दिन -रात भक्ति में लीन रहता हूँ.... मैं ईश्वर के निकट हूँ... उनके घर में रहता हूँ... एक छोटे से कीड़े की क्या मजाल जो मेरे शरीर में प्रवेश कर जाये..."बइस तरह वो किसी की बात नहीं मानता था।
एक दिन उन्हें बुख़ार आ गया..... साँस लेने में तक़लीफ़ हुई... पूरे शरीर में जकड़न होने लगी.. बदन का तापमान भी काफ़ी बढ़ गया था... उपचार के क्रम में पता चला उन्हें कोरोना हो गया है। कुछ दिनों में उनकी मृत्यु भी हो गई।
मौत के बाद जब वो ईश्वर के पास पहुँचे तो ईश्वर से शिकायत करते हुए बोले,"हे कृपानिधान, पूरा जंगल वहशी जानवरों से भरा पड़ा है... ऐसे में मैं तन्हा था जो तेरी इबादत करता था... और तू ही मुझे बचाने नहीं आया... यहाँ तक कि मेरी मृत्यु भी हो गई।"
सुनते ही भगवान ने कहा, "वत्स मैं तुम्हें बचाने आया था....। मैंने ही तुम्हें बुद्धि दी थी कि सही और ग़लत के निर्णय ले सको...। पूरे पशु-पक्षी जब घोसलों के अंदर थे तो तुमने अपनी अक़्ल का इस्तेमाल क्यों नहीं किया....। बुद्धि भी तो मेरी ही दी हुई थी....। जंगल के कई चतुर जानवर जो तुम्हें हिदायत दे रहे थे वो मेरे द्वारा भेजे गये थे ..। पर तुम हठधर्मी बने रहे.... इसलिए भुगतना भी तुम्हें ही पड़ेगा..।"
भगवान की ये बात सुनकर उस जंगल के संत के पास कोई जवाब नहीं था। उसने अपनी निगाहें नीची कर लीं थीं।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
अब पछताए होत का
किशोर साहित्य कहानी | प्रभुदयाल श्रीवास्तवभोला का गाँव शहर से लगा हुआ है। एक किलोमीटर…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
पुस्तक चर्चा
साहित्यिक आलेख
- कवि निराला की हिन्दी ग़ज़लें
- घनानंद और प्रेम
- दिनकर की कविताओं में उनका जीवन संघर्ष
- प्रसाद की छायावादी ग़ज़ल
- बिहार की महिला ग़ज़लकारों का ग़ज़ल लेखन
- मैथिली के पहले मुस्लिम कवि फ़ज़लुर रहमान हाशमी
- मैथिली खंडकाव्य ‘हरवाहक बेटी’ में फ़ज़लुर रहमान हाशमी की दृष्टि
- हिंदी ग़ज़ल का नया लिबास
- हिंदी ग़ज़लों में अंग्रेज़ी के तत्त्व
- हिन्दी ग़ज़ल की प्रकृति
- हिन्दी ग़ज़ल में दुष्यंत की स्थिति
- फ़ज़लुर रहमान हाशमी की साहित्यिक विरासत
पुस्तक समीक्षा
- अनिरुद्ध सिन्हा का ग़ज़ल संग्रह—‘तुम भी नहीं’ भीड़ में अपनों की तलाश
- अभी दीवार गिरने दो: जन चेतना को जाग्रत करने वाली ग़ज़लें
- उम्मीद का मौसम : रामचरण 'राग' की लिखी हुई भरोसे की ग़ज़ल
- तज कर चुप्पी हल्ला बोल: ग़ज़ल में बोध और विरोध का स्वर
- दुष्यंत के पहले के ग़ज़लकार: राधेश्याम कथावाचक
- बच्चों की बाल सुलभ चेष्टाओं का ज़िक्र करती हुई किताब— मेरी सौ बाल कविताएँ
- सन्नाटे में शोर बहुत: प्यार, धार और विश्वास की ग़ज़ल
- समय से संवाद करती हुई ग़ज़ल 'वीथियों के बीच'
- हिंदी में नये लबो लहजे की ग़ज़ल: 'हाथों से पतवार गई'
- ग़ज़ल में महिला ग़ज़लकारों का दख़ल
- ग़ज़ल लेखन में एक नए रास्ते की तलाश
कविता
किशोर साहित्य कविता
कविता - क्षणिका
बाल साहित्य कविता
- अगर हम बिजली ज़रा बचाते
- अब तो स्कूल जाते हैं
- आ जाती हो
- आँखें
- करो गुरु का
- खेल खिलौने
- चमकता क्यों है
- दादी भी स्मार्ट हुईं
- दी चाँद को
- देंगे सलामी
- नहीं दूध में
- नहीं ज़रा ये अच्छे अंकल
- पेड़ से नीचे
- पढ़ना ही है
- बाहर की मत चीज़ें खाओ
- भूल गई है
- मोटी क्यों हूँ
- योग करेगी
- रिमझिम पानी
- हैप्पी बर्थ डे चलो मनायें
- हो गई खाँसी
स्मृति लेख
बात-चीत
नज़्म
ग़ज़ल
किशोर साहित्य कहानी
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं
Rajender Verma 2020/04/01 06:06 AM
बहुत सुंदर रहमान जी !