अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

होली के रंगों जैसी

इस बार की होली नई नवेली दुल्हन हीरा के लिए अद्भुत एहसास लेकर आई थी, क्योंकि यह उसके ब्याह के बाद की पहली होली थी। अभी-अभी नया घर-संसार, नया परिवार मिला था, नये लोगों के साथ त्यौहार मनाना था ।

यूँ तो  प्रायः लड़कियाँ शादी के बाद पहली होली अपने नैहर में ही मनाती हैं, मगर हीरा की ससुराल के रिवाज़ के मुताबिक़ बहू को पहली होली ससुराल में ही करनी थी ।

अतः वह मन में कुछ उदासी छिपाए ख़ुद को ख़ुश दिखाने की कोशिश के साथ होली की तैयारी करती सासू माँ के काम में हाथ बटाने लगी।

उसे अपने माँ, पिता, भाई व सखियों की याद तो आ ही रही थी।

तभी अचानक उसकी सास सुनहरे रंग का जड़ाऊ लहँगा चुनरी लेकर आँगन में आयीं और हीरा के पति को आवाज़ देते हुए बोली, “बेटा बहूरानी को होली में मायके घुमा ला। लड़की को शादी के बाद शुरुआत के त्यौहार अपने मायके में ही अच्छे लगते हैं। नए घर में धीरे-धीरे ही घुल मिल पाती है। जा बेटी जा मैं यह लहँगा लाई थी कल तेरी होली पर पहनने के लिए, इसे पहन कर चली जा  नैहर।”

हीरा की आँखों में अपनी सासू माँ के प्रति आस्था और अथाह श्रद्धा के आँसू उमड़ पड़े ।

गुलाबी रंग की साड़ी में बेहद ख़ूबसूरत लग रही हीरा बोली, “नहीं माँ जी मुझे आप लोगों के साथ ही होली मनानी है; मायके में तो मैंने हमेशा ही होली मनाई है। फिर जिसके पास आप जैसी सासू माँ हो उसके लिए तो हर रोज़ ही होली और दिवाली हैं।”

हीरा के मुँह से ऐसे बोल सुनते ही उसके पति की तो मानो मुराद ही पूरी हो गई हो। पति से नज़र मिलते ही हीरा शर्म से लाल हो गयी . . . होली के रंगों जैसी!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य कविता

कविता

दोहे

लघुकथा

कविता-मुक्तक

स्मृति लेख

गीत-नवगीत

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं