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दिसंबर

 

ये यादों के बक्से ले आया दिसम्बर। 
मिले थे कभी अजनबी दो सड़क पर। 
वो घबरा रहा था कोई बात कहकर। 
वो शरमा गयी थी कोई बात सुनकर। 
ये यादों के बक्से ले आया दिसम्बर। 
बेचैनियाँ थीं मदहोशियाँ थीं, 
अजब जादुई लग रहा था वो आलम। 
पहचान कोई पुरानी नहीं थी
मगर लग रहा था मिले हैं कभी हम। 
युगों से जिन्हें ढूँढ़ा करती थी दर दर। 
लगा पा लिया उनको फिर से धरा पर। 
ये यादों के बक्से ले आया दिसम्बर। 
 
मिले थे कभी अजनबी दो सड़क पर। 
वो घबरा रहा था कोई बात कहकर। 
वो शरमा गयी थी कोई बात सुनकर। 
कहा भी नहीं कुछ सुना भी नहींं था, 
लिखी जा रही थी कहानी मिलन की। 
कोई अपना अपना सा लगने लगा था, 
वो नस नस की सिरहन हृदय की छुअन थी। 
कहाँ भूल पाना है उसको उमर भर। 
मिले थे प्रथम जिस नगर जिस डगर पर। 
वो रूहों से रूहों का रचता स्वयंम्बर। 
ये यादों के बक्से ले आया दिसम्बर। 
मिले थे कभी अजनबी दो सड़क पर। 

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