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राम पूछते हैं

कर सकोगे 
मन की अयोध्या तैयार!
राम पूछते हैं।


तह से कुरेदना होंगी
रोम-रोम में घर कर चुकी बेईमानियाँ
जड़ से उखाड़ना होगा
पुष्ट हुआ दम्भ का बट- वृक्ष
खुरचनी होंगी
लोभ की महीन एक पर एक चढ़ी परतें
मौलिकता को प्रकट करना होगा
वनवासियों की धूसरता की तरह
क्या तैयार हो
राम पूछते हैं।


क्या उगा सकोगे
सहृदयता की कोमल दूब
फिर चाहे कपटी स्वर्णमृग ही चरे
दे सकोगे अपनी महत्वाकांक्षाओं को वनवास
गले लगा सकोगे ढुलाई देने के बाद कुली को
मान दे सकोगे सिंहासन से परे
भेजेने वाली कैकेयी को
राम पूछते हैं!


हे देवी!
अग्निपरीक्षा पर प्रश्न शेष है
या श्रद्धा हो गई छाया प्रसंग पर
वैभव की बनावटी परतें धो सकोगी
सादगी और सौम्यता पिछड़ापन तो नहीं लगेंगे
त्याग के निमित्त राज़ी कर सकोगी अपने राम को
राम पूछते हैं!


पुनश्चः
वचन निभाने में निर्मम हो सकोगे?
दशरथ की भाँति
कर सकोगे कल्याण के निमित्त अपनी संतानें
राजसुख से दूर!
बनो अपने मन की अयोध्या के मोदी
करो भूमि पूजन
बनाओ मंदिर
बना सकोगे?
राम पूछते हैं।

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