आँगन की गौरैया
काव्य साहित्य | कविता दीपमाला1 Apr 2024 (अंक: 250, प्रथम, 2024 में प्रकाशित)
कहाँ गई वो आँगन की नन्ही गौरैया
चीं चीं चीं चीं कलरव करती
कभी इधर और कभी उधर वो
आँगन में थी उड़ती फिरती।
जब सब भोर में सोकर उठते
मधुरिम आवाज़ थी उसकी आती
ऐसा लगता था मानो ज्यों
कानों में मिश्री घुल जाती।
बार-बार उड़ उड़कर जब वो
तिनका-तिनका चुनकर लाती
इतनी मेहनत करके अपने
बच्चों का बसेरा है बनाती।
आँगन में सब पेड़ खो गए
सारे घर अब बंद हो गए
गौरैया का रहा ना ठिकाना
पंछी सारे बेघर हो गए।
एक झलक पाने को उसकी
नैन हमारे तरस हैं जाते
कहाँ मिलेगी अब गौरैया
काश हमें अब कोई बता दे।
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