क्यूँ ना थोड़ा अलग बना जाए
काव्य साहित्य | कविता दीपमाला1 Sep 2023 (अंक: 236, प्रथम, 2023 में प्रकाशित)
क्यूँ न थोड़ा अलग बना जाए
औरों सा नहीं ख़ुद सा बना जाए।
अलग सोच अलग समझ
अलग ही विचार हो
अपने से ही ना हो केवल
सबसे सरोकार हो।
ख़ुश रहने की सलाह नहीं
ख़ुश रहने की वजह बना जाए।
क्यूँ न थोड़ा अलग बना जाए।
अन्याय को अनदेखा ना करके
थोड़ी सी इंसानियत धरके
थोड़ा सा साहस जुटाकर
थोड़ा आगे क़दम बढ़ाकर
झूठ को पराजित किया जाए।
क्यूँ न थोड़ा अलग बना जाए।
भीड़ में चलने का नहीं
अलग चलने का नाम है ज़िन्दगी
जीवन के संघर्षों में
डटे रहने का नाम है ज़िन्दगी।
जीवन को ऐसे जिया जाए
क्यूँ न थोड़ा अलग बना जाए।
छोटे-छोटे पल चुराकर
थोड़ा थोड़ा मुस्कुराकर
ग़म के काँटों से भी ख़ुशी के
कुछ फूल चुन लिए जाएँ।
क्यूँ ना थोड़ा अलग बना जाए।
रुकना नहीं पथ पर अपने
मंज़िल के मिलने से पहले
राह में सुस्ता लेना भले
क़दम लड़खड़ाने से पहले
क्या पता मंज़िल सामने मिल जाए।
क्यूँ ना थोड़ा अलग बना जाए।
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