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जीवन में प्रेम

 

जीवन जब हो उपवन जैसा
दुख हो तब फिर मन में कैसा? 
हर इक दिल की दुनिया में, 
इक सपना नया पनपता है। 
जीवन यदि हो दुखमय तब भी
सुख-शान्ति मिला करता ही है
यदि प्रेम करोगे जन-जन से तब
सुख की कलियाँ मुस्काएँगी
मन हो यदि उदास कहीं तो
सुख की घड़ियाँ भी आएँगी। 
दिल की हर धड़कन में सचमुच
अन्तर्ध्वनि इक बजती है। 
सपने अपने आकर तब
काव्य-रूप में सजते हैम। 
मन में मानव-प्रेम रहे तब
सुख का संसार पनपता है। 
इच्छाएँ जब घनीभूत हो
अंतःपीड़ा बन जातीं जब
मिलन स्वप्न कल्पना नवीन बन
सपनों का सफ़र तय करती है, 
सामने तो मंज़िल ही है
जो दिखती रह-रह कर हैं। 
जन-जन के हिय प्रेम-वलय में, 
हर पल तृप्ति मिलती है। 

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