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सत्य-भाषण

 

जीवन में सत्य भाषण का विशेष महत्त्व है। मनुष्य के सुखमय तथा शान्तिमय जीवन के लिए सच बोलना आवश्यक कहा गया है, क्योंकि सच बोलने से दिमाग़ शांत रहता है। मन में अच्छी-अच्छी कल्पनाएँ आती हैं तथा चिंता, शोक, पीड़ा, तनाव एवं अवसाद से भी मुक्ति मिलती रहती है। 

आज के भौतिक युग में प्रायः इसका अभाव देखा जा रहा है। लोग भौतिक संसाधनों में उलझकर स्वार्थ में प्रवृत्त होकर येन केन प्रकारेण धन तथा कीर्ति का अर्जन तो कर लेते हैं लेकिन आध्यात्मिक शान्ति नहीं मिल पाती। मनोवैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि मानसिक शान्ति के लिए सच बोलना चाहिए क्योंकि इससे मन में किसी बात को लेकर डर नहीं रहता, मन में कोई ग्रंथि नहीं पनपती तथा आपस का माहौल स्वास्थ्यप्रद और आनंददायी हो जाता है। आज हम अपने जीवन में सुख चाहते हैं तो व्यवहार में सत्य वचन के महत्त्व को समझना होगा। महात्मा गाँधी की आत्म कथा, जिसे सत्य के प्रयोग के तौर पर देखा जाता है, इसका अभिन्न उदाहरण है। प्रायः सभी संत तथा महापुरु‌षों ने सत्य धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाज़ी तक लगा दी थी। राजा हरिश्चंद्र के बारे में ऐसा ही कहा जाता है कि सत्य वचन की रक्षा के लिए उन्होंने पत्नी तक को बेच दिया था तथा ख़ुद भी न जाने कितने कष्ट सहे थे। इतिहास के अमित पन्नों में भी अनेक ऐसे शूरवीर योद्धा हुए हैं जिन्होंने सत्य वचन की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के कष्ट सहे तथा अपने वचन पर क़ायम रहे। भगवान राम ने भी सत्य वचन की रक्षा के लिए ही चौदह वर्ष का वनवास जीवन स्वीकार कर लिया था। 

मानव जीवन के निर्माण में सत्यता का महत्त्व इसलिए भी है कि इससे हमारी ईमानदारी तथा कर्तव्यनिष्ठा का पता चलता है। व्यक्ति का आंतरिक आभूषण है सत्य वचन तथा यदि हम इसे सदैव इसके लिए दृढ़ संकल्प लिए रहते हैं तो इससे हमारे व्यक्तित्व की एक बेहतर तथा विशिष्ट पहचान बनती है। स्कूल-कॉलेज में प्रारंभ से ही यदि सत्य वचन के महत्त्व को समझा दिया जाए तो उनका प्रारंभिक विकास प्रेरणा प्रदान करनेवाला हो सकेगा क्योंकि एक झूठ बोलने मात्र से अनेक तरह के दोषों के आने का ख़तरा बना रहता है। बच्चों में विशिष्ट गुण युक्त चरित्र निर्माण का पहला पाठ सत्यता से ही शुरू होता है। बच्चे देखकर तथा अनुकरण करके ज़्यादा सीखते हैं। यदि घर के सदस्य झूठ बोलना शुरू कर दें तो छोटे-छोटे बच्चों पर बुरा असर पड़ने लगता है। इसलिए ज़रूरी है कि भावी पीढ़ी के चरित्र निर्माण के लिए सदैव अपने व्यवहार तथा आदतों में भी सुधार लाना चाहिए। यदि बच्चों में असत्य भाषण करने की बुरी आदत आ जाएगी तो उन्हें सुधारना बड़ा ही मुश्किल काम हो जाता है। 

आज मोबाइल तथा इंटरनेट के इस बढ़ते युग में विकास के जहरी संसाधनों के उपयोग के साथ यह भी ज़रूरी है कि बच्चे सच बोलने की आदत डालें। इससे उनका मन मज़बूत बनेगा तथा विचार भी परिष्कृत होंगे। इस प्रकार उनका बेहतर चरित्र निर्माण सम्भव हो सकेगा। 

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