प्लीज़ ऑफ़िस को घर न बनाइए
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी संजीव शुक्ल15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
भाई नौकरी के कुछ अघोषित नियम-क़ानून और परंपराएँ होती हैं, उन्हें निभाना ही पड़ता है। उन्हें पारिवारिक रिश्तों से जोड़ना ठीक नहीं! घर और ऑफ़िस दो अलग-अलग जगहें हैं। दो अलग-अलग कार्यक्षेत्र हैं। उनको आपस में नहीं मिलाया जा सकता।
अब जैसे कि ऑफ़िस में अधिकारी या बाबू मेज़ के नीचे से लिफ़ाफ़ा लेता है, तो इसके मतलब यह थोड़े है कि वह अपने घर में भी माता-पिता या बेटे-बेटियों से सारा लेन-देन मेज़ के नीचे से ही करता होगा। अब घर को ऑफ़िस तो नहीं बनाया जा सकता न!
इसलिए भगवान के लिए इस पेशेवर हुनर का सामान्यीकरण कर उसकी इज़्ज़त को सरेआम न उछालिए। सरकारी नौकर की ख़ूबी यह है कि वह इन्हीं व्यस्तताओं के बीच, किसी न किसी तरह सेवा का मौक़ा निकाल ही लेता है।
सो ऑफ़िस वालों को इतने घटियापन की निगाहों से देखना ठीक नहीं। यह बात तहज़ीब के ख़िलाफ़ जाती है।
और हाँ, एक अनुरोध और कि इस तरह के ऑफ़िशियल लेन-देन को, सिर्फ़ ऊपर तक पहुँचाने की विवशता के रूप में ही न देखा जाए। भई, यह किसी की ज़िद भी तो हो सकती है।
ख़ैर! एक परिचित बड़े बाबू राजबिहारी का तो खुला कहना है कि “हम लेते हैं तो सिर्फ़ आपके लिए, आपकी सुविधा के लिए। अन्यथा हमें क्या पड़ी कि पड़ी लकड़ी लेकर आपको ऑफ़िसों के चक्कर लगवाने से बचाते फिरें।”
अब बताइए यह सेवा के प्रति उनका अनन्य अनुराग नहीं तो और क्या है? लेकिन जो सोचो कि इसके लिए कोई उनकी तारीफ़ करेगा, सवाल ही नहीं। यह मतलबी दुनिया तुच्छ दक्षिणा के नाम पर उन्हें सिर्फ़ लानतें ही भेजेगी। यहाँ निःस्वार्थ सेवा आसान नहीं है।
यही सब देखकर गोसाईं जी ने भी कहा है —”सेवा धर्म कठिन जग जाना।”
नौकरी पेशा वालों की अपनी मर्यादाएँ हैं। काम करने के उनके अपने तरीक़े हैं। उन्हें हिक़ारत से देखना बंद करना चाहिए। भई वो भी इंसान ही हैं, कोई रोबोट नहीं। उनके पास भी एक अदद दिल है। और जब दिल है तो वह किसी की सेवा के लिए मचल भी सकता है।
पर यहाँ तो सरकारी (प्राइवेट फिर माफ़ है) नौकरी में रहकर सेवा करने को, सेवा माना ही नहीं जाता। अरे भाई क्या तभी सेवा को सेवा मानोगे, जब तलक आदमी अपने घर की कुर्की कराकर फटी नेकर और बनियान में सड़क पर न आ जाए।
दरअसल इस प्रवृत्ति के पीछे हमारी वही पुरानी मानसिकता है, जिसमें सरकारी अधिकारी/कर्मचारी के ऑफ़िस के कामों पर निगाह रखते हुए, उससे वैसा ही घर पर करने की उम्मीद रखी जाती है और जब वह ऐसा नहीं कर पाता है, तो उसे पैदायशी चोर मान लिया जाता है।
अब देखिए न! हाल की ही बात है। एक बड़े अधिकारी ने सेवा की अति करते हुए एक मान्यता प्राप्त, बहू पूजित अति सम्पन्न मठाधीश के चरणों में बैठकर उसके लिए दो फुल्के क्या सेंक दिए, पूरी कायनात उसके ख़िलाफ़ हो गई। कुछ तो यह भी पूछने लगे कि क्या ये महाशय इतने नौकरों के बीच अपने घर में रोटियाँ सेकते होंगे? उसने दो फुल्के क्या बना दिए, आप उससे घर की रोटियाँ सिकवाने की ज़िद करने लगे?
अब बताइए ऐसे माहौल में कोई कैसे सेवा के लिए आगे बढ़े।
वो तो कहिए कि धरती अभी भी सेवादारों से पूरी तरह बंजर नहीं हुई है। हालाँकि लच्छन तो बंजर होने के ही हैं।
अभी गत वर्ष कांवड़ यात्रा को विशेष सुविधाजनक बनाने के सरकारी फ़रमान को गंभीरता से ले, एक पुलिस अधिकारी ने अपनी लोक सेवाओं को क्षैतिज विस्तार देने का निश्चय किया। इसी क्रम में वे अतिशय भावविह्वल होकर हाथ आए यात्रियों के चरण दबाने लगे। इस पैकेज का फ़ायदा उठाकर तमाम यात्री पुलिस वालों को देखते ही पसर जाते और अपनी टाँगें उनके आगे कर देते। हालाँकि कुछ लोग तो यह भी बताते पाए गए कि इस सेवा से कुछ हताहत भी हुए। कुछ के इतने ज़ोर से दबाए गए कि वे कांवड़ यात्रा को बीच में ही छोड़ हड्डियों के अस्पताल पहुँच गए। निश्चित ही ऐसा अतिशय भावुकता में शक्ति के मिश्रण से हुआ होगा। और अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ज़रूर यह सेवा को कलंकित करने वालों की तरफ़ से उड़ाई गई अफ़वाह होगी।
जो भी हो पर यह चिंता की बात नहीं थी। चिंता की बात यह थी कि कुछ रिटायर्ड अधिकारी सेवा के इस विशेष पैकेज के उपलब्ध कराने जाने को सीधे दिल पर ले लिए। वे सेवा के इस क्षैतिज विस्तार पर छींटाकशी करने लगे। कहने लगे कि यह तो राजकीय सेवा का अंग नहीं है। क्या वे अमुक अधिकारी अपने माँ बाप के भी ऐसे ही पैर दबाते होंगे? फ़िर वही ऑफ़िस और घर का राग!
ये क्या बात हुई कि यदि कोई सर्विसधारी कांवरियों के पैर दबाए, तो आप उस बेचारे से अपने घर में भी इसी तरह अपने माँ-बाप के पैर दबाने की इच्छा पाल लें। यह तो हद है!
क्या अब सेवा-सेवा में भेद किया जाएगा?
क्या स्वतंत्र देश में लोकसेवक को इतनी भी आज़ादी नहीं कि वह अपने मन से सेवा कर सके?
क्या अब घर के माई-बाप को भी सरकारी माई-बाप के बराबर रखा जाएगा?
यह सरासर नाइंसाफ़ी है।
दरअसल सात्विक सोच न रखने से ही ऐसे कुत्सित विचार आते हैं।
अभी हम लोग इतने भी गिरे हुए नहीं हैं कि हर बात की समीक्षा कर कर्त्तव्य पालन में प्रवृत्त हों।
-संजीव शुक्ल
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