संवेदना
कथा साहित्य | लघुकथा संजीव शुक्ल1 Jun 2024 (अंक: 254, प्रथम, 2024 में प्रकाशित)
वे संवेदनशील है, संवेदनाओं के कवि हैं।
अभी-अभी उन्होंने वंचित, सर्वहारा वर्ग के समर्थन में ताज़ा-ताज़ा कुछ लिखा है, लेकिन शोषक सत्ता के ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं लिखा।
वंचित वर्ग के प्रति पूरी करुणा रखने के बावजूद, वे शोषक सत्ता के ख़िलाफ़ कुछ नहीं लिख पाते हैं, तो सिर्फ़ इसलिए कि वे “पाप से घृणा करो पापी से नहीं” में घोर विश्वास रखते हैं।
करुणा अपनी जगह है, सिद्धांत अपनी जगह!
रचनात्मक दायित्व से फ़ुर्सत पाने के बाद अब वे पाठकों की तलाश में हैं।
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