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हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी संजीव शुक्ल1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
“सर उन्होंने हम पर 50 परसेंट टैरिफ लगा दिया। क्या कहना हैं आपका?”
“लगाने दो। हम देने के क़ाबिल हैंं इसीलिए लगाया। हम विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था हैंं।”
“सर उन्होंने हमारे नागरिकों को हथकड़ियों और बेड़ियों में भेजा।”
“हाँ तो क्या ग़लत किया? जब वीसा की अवधि का ध्यान नहीं रखेंगे और दूसरे देश में पड़े-पड़े रोटी तोड़ते रहेंगे तो यहीं होबे करेगा।”
“नहीं सर फिर भी यह उस तरह का अपराध नहीं था कि उन्हें हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ा जाय।”
“अपराध कैसा था यह तो उस देश की सरकार तय करेगी, हम थोड़े न करेंगे!”
“लेकिन सर यह भी तो सोचिए कि हथकड़ियों में जब वे अपने देश की ज़मीन पर उतरे होंगे तो उन्हें अपनी दशा देख अपने और अपनी सरकार पर कितनी शर्म आई होगी!”
“हम समझ सकते हैंं भाई उनकी मनोदशा! इसीलिए तो हमने उन्हें दूर शहर में आँधी रात को जहाज़ से उतरवाया, ताकि उनको शर्मिंदगी न महसूस हो। न वे किसी को देख सकें और न कोई उन्हें।”
“ओह्ह!”
“भाई अगला सवाल लो . . . हमें और भी जगह जाना हैं! जल्दी करो।”
“सर ऑपरेशन सुहाग में अपना वहीं जिगरी दोस्त कह रहा हैं कि सीज़फ़ायर हमने करवाया हैं। क्या यह सही हैं?”
“नहीं! बिलकुल नहीं।”
“तो फिर सर इसका कड़ा विरोध करना चाहिएँ। सही बात हैं सर हम ख़ुद अपने मामलों के मालिक हैंं। किसी को क्या हक़ हैं हमारे मामलों में बोलने का।”
“हम हर ऐरे-ग़ैरे बयानों का जवाब नहीं देते। उसकी तो आदत हैं उल्टा-सीधा बोलते रहने की।”
“सर सुना हैं पड़ोसी देश के सैनिक हमारी सीमा में घुस आएँ थे।”
“न कोई घुसा था और न कोई घुसा हैं और न कोई घुसेगा!”
“लेकिन सर सुना हैं उसने हमारे क्षेत्रों को भी अपने नक़्शे में दिखा रहा हैं। कुछ के तो नाम भी बदल दिए हैंं। मुखिया जी से कहिये कि उसको तत्काल आँखें दिखाएं।”
“नहीं दिखा सकते!”
“पर क्यों?”
“वह हमसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं।”
“सर वो दो देशों के युद्ध में फ़लाने अरे वहीं माई डियर फ़्रेंड वाले देश ने हमारे नाविकों की भी हत्या कर दी? क्या हमारे मुखिया इसका कड़ा प्रतिवाद करेंगे?”
“जरूर करेंगे! हमारे उनका अभी ग़ुस्सा देखा नहीं हैं! आइंदा ऐसा करने के पहले आदमी सौ बार सोचेगा।”
“लेकिन सर सुना हैं इस समय फ़लाँ अंतरराष्ट्रीय मीटिंग में हमारे मुखिया और फ़लाने का आमना-सामना भी हुआ! क्या इस बाबत कुछ बात हुई?”
“हाँ हुई न!”
“क्या हुआ सर?
“हमारे प्रधान ने बहुत कड़ी नाराज़गी जताई। सामने वाला नज़रें झुकाएँ चुपचाप सुनता रहा। और करता भी क्या?”
“क्या कहा सर? वहीं बिरयानी खाने वाला हाल तो नहीं हुआ? जैसे एक बार ललकारते-ललकारते अचानक बिना प्रोटोकॉल के बर्थडे-बधाई देने और बिरयानी खाने पहुँच गए थे।”
“नहीं ऐसा नहीं हैं। हम भले के लिए भले हैंं और दुश्मन के लिए साक्षात्काल।”
“तो फिर क्या कहा सर ने मीटिंग में?”
“हाँ कहा क्यों नहीं! यहीं कहा कि-Your Excellency, । am very pleased to meet you।”
“अंय . . .”
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