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कबीर से द्वितीय संवाद

निराकार जब प्रत्यक्ष होता है
स्वरूपमयता अंगीकार करता है
निर्गुण की भूमिका लेकर
सगुण अवतीर्ण होता है।


बहुत समय से यह
व्यक्त करना चाहती थी
कहने की चेष्टा में
कंठ भंग हो जाता था
जिह्वा स्तंभित हो जाती थी
रुदन करता अंतःकरण
कबीर को पुकारता था।


अचंभित हूँ स्वयं पर
हे कबीर,
तुम्हारा हस्तावलंब
मैंने किसी जन्म में
छोड़ा ही नहीं।
तुम्हारे मूर्त रूप में
धरा पर आने से पहले ही
स्वयं को तुमको
सौंप चुकी थी।


व्यग्रता का व्याख्यागम्य की ओर
सतत बहाव
न कोई शंका, न गुमान
कबीर तुम चंद्रक बन
घोर काले आसमान में
सदैव दीप्त रहे
और मेरे हृदय के
रिक्त पात्र में
क़तरा क़तरा अल्पवृष्टि बन
बरसते रहे।


इस चित्त की नीरवता में
उद्भव होता है मौन।
हृदय प्रस्फुरण के राग
गुप्त अनुभूतियों के रास
अविभाज्य रखते हैं एक कामना
जाने किस पल होगा
मेरा तुमसे सामना।


जैसे वनद्रुमों की भीड़ में
मृग की खोज है कस्तूरी
ऐसे निर्जन जग में
तुमको ढूँढ़ती बदहवास
मैं अधूरी।


© अनुजीत इकबाल 


 

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