अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मैं हार नहीं मानूँगा

यह जीवन ही है विलक्षण 
हर पल, हर दिन, प्रति क्षण
यहाँ आशा और निराशा में
मैं ख़ुद को करूँगा अर्पण
अब दुःख की विवेचना नहीं 
बस अब कोई याचना नहीं 
हाँ, कोई कार्य सहज नहीं 
पर मैं भी कोई 'महज़' नहीं 
अब काँटे हों चाहे फूल हों 
जो भी मिले, सब क़ुबूल हो 


संशय-विस्मय में लक्ष्य नहीं त्यागूँगा!
बस! मैं अब कभी हार नहीं मानूँगा ।
 
कुछ नहीं तो कुछ ही सही
रहना मुझे अब क्षुब्ध नहीं
मंज़िल नहीं तो आस तो है
एक उम्मीद भी पास तो है
समुद्र का भी तो किनारा है
यहाँ पहले ही कौन हारा है! 
सबकुछ अपने पास होगा 
ख़ुद पे जब विश्वास  होगा 
हौसला  जिसके  अंदर  है 
बस वही आज सिकंदर है 


डूबकर दरिया, तेरी गहराई जानूँगा!
पर! मैं अब कभी हार नहीं मानूँगा।
 
हम जिनके पाले पड़ते हैं 
वो बंद  किवाड़  पड़ते है
बेरहम ज़िंदगी के रास्तों में
यहाँ बहुत ढलान पड़ते हैं
थक जाते हैं पाँव अभागे
जाने कितने नाले पड़ते हैं
आँख भर के रूह सिसकती है 
गले में घुटन,जीभ में छाले पड़ते हैं 
घर में सौ दफ़ा आँच जलती है 
तब जा के मुँह में निवाले पड़ते हैं


किन्तु मैं आँच से जल के नहीं भागूँगा।
बस! अब मैं कभी हार नहीं मानूँगा।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

किशोर हास्य व्यंग्य कविता

कविता-मुक्तक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं