यूजीसी पे हिंदी कविता
काव्य साहित्य | कविता संदीप कुमार तिवारी ‘श्रेयस’1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
अन्याय के पक्षधर ओ राजा!
आज जीते हो कल हारोगे।
एक एकलव्य के तीर से,
अब कितने अर्जुन मारोगे?
कोई जाती और भेद नहीं,
यह राष्ट्र कर्म प्रधान है।
अधर्म पे धर्म विजयी हो,
यही विधि का विधान है।
कर्ण, दुर्योधन, द्रोण सहित,
कौरव पछाड़े जाते हैं।
जब पाप के पक्ष में सारे हो,
तो भीष्म भी मारे जाते हैं।
क्या तुम भी सत्ता मोह में,
हस्तिनापुर उजाड़ोगे।
एक एकलव्य के तीर से,
अब कितने अर्जुन मारोगे।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र,
ये चार हैं पर एक खंभ हैं।
सत्य सनातन हिंदू के,
अपने ही सब स्तंभ हैं।
अभी तो थे सब एक हुए,
तुमने पल में बाँट दिया।
सनातन वृक्ष के साये को,
टहनी-टहनी से काट दिया।
स्वर्णों का सोने जैसा ये,
क्या स्वर्णिम बाग़ संघारोगे।
एक एकलव्य के तीर से,
अब कितने अर्जुन मारोगे।
है चाह नहीं, कुछ मोह नहीं,
तो ऐसे ना अलगाव करो।
कपटी शकुनि के विचारों में,
तुम पुन: फिर बदलाव करो।
यह याचना का संकेत-सूत्र,
जो तुम्हें समझ नहीं आता है।
तो सुनो, धनानंद और सुनो!
हमें राष्ट्र बनाना आता है।
होंगे ही नहीं यज्ञ में ब्राह्मण,
किस मंत्र से कुल को तारोगे।
एक एकलव्य के तीर से,
अब कितने अर्जुन मारोगे।
अन्याय के पक्षधर ओ राजा!
आज जीते हो कल हारोगे।
एक एकलव्य के तीर से,
अब कितने अर्जुन मारोगे?
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Dr Nisha pareek 2026/01/30 07:21 AM
श्रेष्ठ प्रासंगिक सृजन सत्य है अब तो निम्न अर्थ से होना चाहिए आज के स्रवर्ण कहीं भी भेदभाव नहीं करते स्वयं मैं कारीगर हरीजन भिखारी सबकों चाय खाना देती हूं तब बर्तन अलग नहीं रखती अब जिनके मन में प्रेम है उसे नफरत में बदल रहें हों ये कैसी राजनीति है