अंतिम साँस का शहर
कथा साहित्य | लघुकथा सुनील कुमार शर्मा15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
एक औद्योगिक शहर था, जहाँ हवा हमेशा धुएँ और रसायनों से भरी रहती थी। फ़ैक्ट्रियाँ चौबीसों घंटे चलती थीं, और उनके चिमनियों से निकलने वाला ज़हर पूरे शहर पर एक काली चादर की तरह छाया रहता था। यहाँ के लोग अक्सर खाँसते रहते थे और फेफड़ों की बीमारियों से पीड़ित थे। पर्यावरणीय मानकों को हमेशा लाभ के लिए दरकिनार किया जाता था।
एक दिन, एक भयानक रासायनिक रिसाव हुआ। हवा में इतना ज़हर घुल गया कि साँस लेना असंभव हो गया। लोग सड़कों पर गिरते गए, उनकी साँसें थमने लगीं। यह एक ऐसी आपदा थी जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी, लेकिन जिसकी सम्भावना हमेशा मौजूद थी।
बचे हुए कुछ लोग शहर से भाग गए, लेकिन उनके मन में एक गहरी टीस थी। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने अपने लालच में अपने ही घर को ज़हर से भर दिया था। कुछ साल बाद, वह शहर एक भूतिया शहर बन गया। जहाँ कभी फ़ैक्ट्रियों का शोर था, वहाँ अब बस सन्नाटा पसरा था, और हवा में अब भी रसायन की गंध तैर रही थी।
एक युवा वैज्ञानिक, जिसकी दादी त्रासदी में मर गई थी, ने इस शहर को फिर से जीवन देने का संकल्प लिया। उसने अपने शोध से यह साबित किया कि कैसे औद्योगिक नैतिकता का अभाव पूरे समुदाय को नष्ट कर सकता है। उसने उस शहर को एक ‘पर्यावरण शिक्षा केंद्र’ में बदलने का प्रयास किया, जहाँ लोग उन ग़लतियों से सीख सकें जो उस गाँव ने की थीं। यह शहर अब एक जीवित स्मारक था—उस पर्यावरणीय नैतिकता का, जिसे कभी भुला दिया गया था।
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