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भगवान के चरणों में

उस वृद्ध बेचारे को घर में कोई पूछता नहीं था। वह झाड़-झंखाड़ों से घिरे मंदिर में जाकर बैठ जाता था। एक दिन बड़े सवेरे बीमारी की हालत में वह घर से उस मंदिर की ओर निकल गया। साँझ ढलने के बाद जब घर वालों को उस बुज़ुर्ग का ख़्याल आया तो वे उस मंदिर की ओर गए। जहाँ उन्हें झाड़-झंखाड़ो में फँसे उस बुजुर्ग का शव मिला; तो उन्होंने शोर मचा दिया, ”हमारे बाबा जी कितने कर्मों वाले हैं, जिन्होंने भगवान के चरणों में अपने प्राण दिए।"

उसके बेटे की पत्नी कह रही थी, ” . . . मैंने जब जाकर देखा तो वह सीधे लेटे हुए थे, और उनका माथा ठाकुर जी के चरणों में था . . . कितनी अच्छी मौत पाई है उन्होंने!“

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