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सेठ और चूहा

 

सेठ करोड़ी मल मज़े से खर्राटे ले रहा था। रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी थी। तभी एक चूहा आकर, सेठ की भारी- भरकम देह के ऊपर उछल-कूद करने लगा। जब सेठ को गुदगुदी हुई तो उसने अपनी मुट्ठी में उस चूहे को दबोच लिया। जब चूहे का दम घुटने लगा तो वह सेठ के आगे गिड़गिड़ाने लगा, “सेठ जी मुझे छोड़ दो, ऐसी हरकत फिर कभी नहीं करूँगा।”

“ओ चूहे के बच्चे, आधी रात को तूने मेरी नींद ख़राब की है . . . अब तो मैं तुझे किसी सूरत में भी नहीं छोड़ूँगा।” यह कहते हुए, सेठ ने मुट्ठी को भींच दिया, जिससे चूहे का दम घुटने लगा। फिर चूहा बड़ी मुश्किल से बोल पाया, “सेठ जी! अगर आप मुझे ज़िन्दा छोड़ दें तो शायद मैं आपके कुछ काम आ सकूँ . . . मेरे परदादा ने, जाल काटकर, जाल में फँसे एक शेर को मुक्त करवाया था . . .”

“अरे तू मेरा क्या जाल काटेगा? . . . पिछले दिनों, तूने तिज़ोरी में घुसकर मेरे नोट काट डाले थे . . . अब तू मेरी अनाज की बोरियाँ काटेगा, और क्या करेगा?” सेठ ग़ुस्से के साथ चिल्लाया तो, उसकी पत्नी की नींद खुल गई, वह झल्लाकर बोली, “इतनी रात में भी तुम्हें चैन नहीं . . . किस पर ग़ुस्सा कर रहे हो?”

सेठ ने मुट्ठी में पकड़े चूहे की और इशारा किया जिसे देखकर, वह आपे से बाहर हो गई, “छोड़ दो इसे, तुम्हें कुछ अक़्ल भी है? मैंने सवेरे गणेश चतुर्थी का व्रत रखना है . . . और तुम उन्हीं के वाहन को परेशान कर रहे हो?”

सेठ ने घबरा कर मुट्ठी खोल दी, और चूहा उछलकर भाग गया। अगली ही रात, लुटेरे सेठ की खिड़की तोड़कर उसके शयनकक्ष में पहुँच गए। उन्होंने सेठ और उसकी पत्नी के मुँह में कपड़ा ठूँसकर, उनके हाथ-पाँव बाँध दिए। फिर उन्हें उठाकर कबाड़ वाली कोठरी में फेंक कर उस कोठरी के दरवाज़े की बाहर से कुंडी लगा दी। फिर उन्होंने बेफ़िक्र होकर सेठ की कोठी को खंगालना शुरू कर दिया।

कोठरी के फ़र्श पर बेबस पड़े सेठ ने अपने शरीर पर उसी चूहे की हरकत महसूस की; जिसे पिछली रात, उसने अपनी मुट्ठी में बेरहमी से भींच लिया था। वह उसके शरीर पर चलता हुआ, उसके बँधे हुए हाथों तक पहुँच गया। फिर उसने अपने तीखे दाँतों से उस रस्सी को काट डाला, जिससे सेठ के हाथ बँधे हुए थे—जिससे सेठ के हाथ खुल गए। फिर क्या था, सेठ ने अपने पैरो की रस्सी खोल डाली। फिर अपने मुँह से कपड़ा निकालने के बाद वह इतनी ज़ोर से चिल्लाया कि आस-पास के लोग अपने घरों से निकल-निकलकर सेठ के घर की और भागे, और लुटेरे जिस तरफ़ मुँह सिर आया उस तरफ़ भागे। 

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