धक्के का मेहमान
कथा साहित्य | लघुकथा सुनील कुमार शर्मा15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
उसने सोचा था—जिन रिश्तेदारों के घर शादी है, एक रात उन्हीं के घर रहकर, अगले दिन वापस काम पर आ जाऊँगा। घर जाना मुश्किल था, क्योंकि छुट्टी नहीं थी।
उन रिश्तेदारों को लगा कि डोली जाने के बाद भी यह मेहमान जाने का नाम नहीं ले रहा है। इसका मतलब है कि, यह रात को भी रोटियाँ पाड़ेगा, बिस्तर तोड़ेगा और सुबह चाय-नाश्ता भी करेगा। इसको तो अभी धकेलने में भलाई है। उन्होंने तुरंत अनुभवी, बूढ़ी काकी को मिठाई का डिब्बा पकड़ाकर भेजा।
वह उसे मिठाई का डिब्बा देते हुए, बड़े प्यार से बोली, “बेटा! समय पर निकल जाओ, तुम्हें दूर जाना है . . . कहीं रात ना हो जाए।”
रात तो हो ही चुकी थी; क्योंकि सर्दियों में अँधेरा जल्दी पड़ जाता है। वह सूटकेस उठाकर तेज़ी से बस अड्डे की और भागा . . . कहीं आख़री बस ना निकल जाए।
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