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गंगा दशहरा

 

(जब गंगा स्वर्ग से उतरी थी पृथ्वी पर)

 

मेरे मन से निकली गंगा,  
कहाँ रुकी, कहाँ थमी,  
शिव जटा पर घूमी क्षणभर,  
फिर इसी धरा पर अमर रमी।
 
मन से मन तक बही नदी,  
पुण्य भाव में रुकी नदी,  
ओ गंगा, तेरे निकट लोग  
“माँ” कहते-कहते देखे लोग।
  
तू कल-कल, छल-छल करती आयी,  
हिमगिरि का विरह साथ में लायी,  
पवित्रता में आगे-आगे,  
जन-जीवन में बसती आयी।
 
भाव अमर घुलते तुझमें,  
तू समुद्र तक हो आयी,  
कहते स्वर्ग से आना तेरा,  
जल को जीवन कहने आयी।
 
“गंगे” तट-तट पर क्यों आते लोग,  
जल की महिमा रखते लोग,  
पाप नाशिनी हो या न हो,  
पुरखों का आशीष लेते लोग।

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