मेरी आंँखें भीग जाती हैं
काव्य साहित्य | कविता चेतना सिंह ‘चितेरी’15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
(स्मृति-शेष)
अँखियों से आँसू बहते रहे,
चुपचाप ही हम रोते रहे।
अब कोई ऐसा नहीं कहनेवाला
जो कह सके—
“चुप हो जाओ, मैं हूँ ना . . .
याद आते ही,
आंँखें भर जाती हैं।
सबसे नज़रें छुपाता हूँ,
फिर भी,
छलक कर बह जाती हैं।
दर्द-ए-दिल सुनाऊँ किसे?
छोड़ निशा,
दूर देश चली गई हो,
काश,
जाते-जाते मुड़कर,
एक बार देखा होता।
आयांश, निशांत को लिए,
मैं एकांत एक कोने में,
बिलख-बिलख रो पड़ा।
अब कोई यह न कहनेवाला
जो कह सके—
“चुप हो जाओ, मैं हूँ ना . . .
तुम्हारी स्मृतियों में,
मेरी आंँखें भीग जाती हैं।
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