सहयोगी बना पाओगे
काव्य साहित्य | कविता दीपमाला15 Mar 2026 (अंक: 294, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
बराबरी नहीं करनी मुझे तुमसे
ना ही कोई हक़ चाहिए।
मुझे दे सको तो बस इक मान चाहिए
तुमसे इक सहयोगी का सम्मान चाहिए।
क्या बना पाओगे सहयोगी मुझे अपनी?
और क्या मान भी पाओगे?
सहयोगी मुझे सुख-दुख की
सहयोगी तुम्हारे हर पल-छिन की
क्या बना पाओगे सहयोगी अपने अंतर्मन की
सहयोगी जीवन और मरण की
सहयोगी अपने हर दिन की।
सिर्फ़ कहने भर के लिए
सहयोगी नहीं होती स्त्री
अपनाना पड़ता है उसे पूरे मन से
सँवारना होता है पूरे जतन से।
तभी बन पाती है वो सहयोगी
जीवन के संपूर्ण सफ़र में
कुटुंब, समाज और घर में।
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