उदास रात की ख़ूबसूरत सुबह
कथा साहित्य | कहानी महेश कुमार केशरी1 Jul 2022 (अंक: 208, प्रथम, 2022 में प्रकाशित)
“बेटी मेघा, सिन्हा साहब के लिए चाय ले आओ,” रंजीत बाबू ने बैठक से ही आवाज़ लगाई।
मेघा किचन से ही आवाज़ देती हुई बोली, “हाँ, पापा बस दो मिनट, और रुकिए, अभी लाती हूँ।”
ट्रे में चाय उठाये, मेघा, कुछ ही देर में आकर बैठक में दाख़िल हुई। मेघा, सांँवली सी पतली, लंबी देखने में बहुत ख़ूबसूरत सी लड़की थी। बैठक में घुसते ही सबसे पहले सिन्हा साहब को मेघा ने अभिवादन पूर्वक ‘नमस्ते चाचाजी’ कहकर प्रणाम किया, और क़रीने से चाय की प्याली मेज़ पर सजाकर वापस नमकीन लाने किचन में चली गई।
तब, बातों का सिलसिला चल पड़ा। सिन्हा साहब अफ़सोस जताते हुए बोले, “इतनी गाय जैसी सीधी-साधी लड़की के साथ ये लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं। अरे कम-से कम सास-ससुर को तो बीच में कुछ कहना ही चाहिए था।”
तभी बीच में रंजीत बाबू ने सिन्हा साहब को टोका, “अरे, छोड़िये भी सिन्हा साहब अगर मेघा ने मना ना किया होता तो मैं मनोज को छोड़ने वाला नहीं था। मैं अपनी बेटी का मुँह देखकर ही रह गया। मेघा कह रही थी ‘जब, मनोज ही मेरे साथ नहीं रहना चाहता, तो मैं क्यों ज़बरदस्ती उनके साथ रहूँ?’ और, सास-ससुर क्या करेंगे? जब मेरा दामाद मनोज ही नालायक़ निकल गया। हमारे समधी और समधन तो ऐसे सरल हैं कि पूछिए ही मत। आज भी हमारे सम्बन्ध उतने ही प्रगाढ़ हैं। जितने पहले हुआ करते थे। बेचारी का भाग्य ही ख़राब है तो क्या किया जाये?” रंजीत बाबू मेघा के भाग्य को ही ख़राब बताकर संतोष कर रहे थे।
सुबह-सुबह मेघा को बहुत आपाधापी रहती है। सुबह, सबसे पहले जल्दी उठो। नाश्ता तैयार करो। फिर, ख़ुद तैयार होकर, पापा का नाश्ता टेबल पर तैयार करके लगाओ। फिर, ख़ुद नाश्ता करके, अपना टिफ़िन पैक करो। फिर, बच्चों का टिफ़िन पैक करो। ये मेघा की पिछले चार-पाँच सालों से एक जैसी दिनचर्या हो गई है।
चाय और नमकीन देकर वो बाथरूम में गई और जल्दी-जल्दी नहाकर ऑफिस के लिए तैयार हुई। फिर, जल्दबाज़ी में जैसे-तैसे नाश्ता किया और अपने पिता रंजीत बाबू से मुख़ातिब हुई, “पापा, टेबल पर नाश्ता गर्म करके ढँककर रख दिया है . . . आप नाश्ता कर लीजिएगा, नहीं तो ठंडा हो जायेगा। पापा चलती हूँ, ऑफिस के लिए लेट हो रही हूँ।, मेघा अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करते हुए बोली।
“ठीक है, बेटा,” रंजीत बाबू बोले।
“तुमने अपना टिफ़िन और छाता ले लिया है ना . . . बाहर बहुत घूप है। छाता लेकर ही बाहर निकलना,” रंजीत बाबू अख़बार साइड में रखते हुए बोले।
“अरे . . . पापा छाता भूल गई थी। आपने अच्छा किया, मुझे याद दिलाया,” टेबल के नीचे से छाता निकालते हुए वो बोली।
और, मेघा बस लेने के लिए बस स्टाॅप पर आकर खड़ी हो गई।
♦ ♦ ♦
“तुम मुझे बेवक़ूफ़ समझते हो . . . क्या मनोज . . .?” मेघा को जब मनोज की दूसरी शादी के बारे में पता चला था तो, जैसे वो चीख पड़ी थी।
“ऐसा, मैंने कब कहा?” मनोज संयत स्वर में बोला।
“ऐसा नहीं है तो फिर, कैसा है? एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। ये तो तुम्हें पता ही है, ठीक, वैसे ही मेरे रहते तुम रोज़ी के साथ नहीं रह सकते,” मेघा समझौता करने के लिए तैयार नहीं थी।
“तुम और रोज़ी दोनों मेरे साथ रहेंगे। मैं तुम्हें अपने घर से भगा थोड़े ही रहा हूँ,” मनोज सफ़ाई देता हुआ बोला।
“मैं, आज की लड़की हूँ, और स्वाभिमानी भी हूँ। मैं अपनी सौत के साथ ज़िन्दगी नहीं बिता सकती। तुम्हें मेरे और रोज़ी के बीच में से किसी एक को चुनना होगा,” मेघा अपने आदर्शों से तिल मात्र भी समझौता नहीं करना चाहती थी।
मनोज भी सपाट स्वर में बोला, “तुम्हें जो अच्छा लगता है करो, लेकिन, रोज़ी मेरे साथ ही रहेगी।”
“तो मैं, किस हैसियत से तुम्हारे घर में रहूँ, एक बीबी की हैसियत से या एक रखैल की हैसियत से?” मेघा बोली।
“तुम, ऐसा क्यों कह रही हो . . .? सारे समाज के सामने, हमारी शादी हुई है, फिर, तुम मेरी रखैल कैसे हो गई . . .? तुम्हें पहले की तरह ही मान-सम्मान इस घर में मिलेगा,” मनोज सफ़ाई देता हुआ बोला।
“मान-सम्मान की बात तुम ना ही करो तो ज़्यादा अच्छा है। पूरी-पूरी रात तुम उस राँड़ रोज़ी के कमरे में बिताते हो, और उसका बिस्तर गर्म करते हो। मेरे कमरे में झाँकने तक नहीं आते, और मान-सम्मान की बात करते हो। कल मैं पूरी रात बिस्तर पे सिरदर्द और बुखार से तड़पती रही, लेकिन, तुम मुझे देखने तक नहीं आये। क्या यही मान-सम्मान तुम मुझे दे रहे हो? . . . पति-पत्नी का रिश्ता केवल सुख का नहीं होता, बल्कि दु:ख का भी होता है, और, समाज! . . . किस समाज की तुम बात करते हो? तुम अगर, समाज की ज़रा भी परवाह करते तो ऐसी गंदी हरकत कभी ना करते। छि:! . . . एक बीबी के रहते तुमने दूसरी शादी कर ली। तुमने कभी ये भी ना सोचा की हमारे बच्चे क्या सोचेंगे? उनके संस्कारों पर क्या असर होगा? वो तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे . . .?”
मेघा आज फ़ैसले के मूड में थी। वो मनोज से यही चाहती थी कि वो, आज, मेघा या रोज़ी में से किसी एक को चुनें। ताकि, मेघा को अपनी ज़िन्दगी की राह चुनने में आसानी हो।
मेघा ने इस दुनियाँ में बहुत कष्ट सहा था। बचपन में माँ गुज़र गई। पिता ने किसी तरह पाल-पोसकर उसे बड़ा किया। बचपन मांँ के बिना बिता।
“मैंने कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिससे मुझे समाज के सामने शर्मिंदा होना पडे़। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं और मुग़ल बादशाहों की हज़ार-पटरानियांँ हुआ करती थीं। उन्होंने कभी इसका विरोध नहीं किया, लेकिन, पता नहीं तुम्हें क्यों एतराज़ है? मेरी और रोज़ी के साथ रहने से,” मनोज ने अपने कुतर्क और कुंठा को ढकने के लिए अपना तर्क दिया।
“अपनी नाकामियों और घृणित कारगुज़ारियों को छिपाने के लिए कम-से-कम ऐसे कुतर्क तो मत ही गढ़ो मनोज। तुम्हारे तर्क के हिसाब से अगर मैं चलूँ तो पुराने मातृसत्तात्मक समाज में स्त्रियाँ बहु-विवाह करतीं थीं, तो क्या . . . मैं भी दस शादियाँ कर लूँ? नहीं ऐसा आधुनिक समय में नहीं हो सकता। जब मैं ऐसा नहीं कर सकती तो तुम पुराने समय के राजे-महाराजाओं और मुग़ल बादशाहों का उदाहरण क्यों दे रहे हो? आज के समय में हमारा संविधान हमें पहली पत्नी के मर जाने या पत्नी के दुराचारी होने पर ही या तलाक़ के बाद ही दूसरी शादी की इजाज़त देता है, और जब तक तलाक़ ना हो जाये तब तक दूसरी शादी अवैध मानी जाती है।”
“तो . . . क्या तुम मुझसे तलाक़ लोगी?” मनोज खिड़की को घूरते हुए बोला।
“हाँ, बिना तलाक़ के हम दोनों अपनी आनेवाली ज़िन्दगी का फ़ैसला नहीं कर सकते। बेहतर होगा हमारा तलाक़ हो जाये, ताकि तुम भी रोज़ी के साथ अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सको,” मेघा निर्णयात्मक लहजे में बोली।
♦ ♦ ♦
मेघा ने घड़ी पर नज़र डाली उसकी नौ बजे वाली आज की बस छूट गई थी। वह अक़्सर लेट हो जाती है। वो भी करे तो आख़िर क्या करे? बच्चों का टिफ़िन तैयार करे। उनको स्कूल भेजे। दफ़्तर संँभाले। या कि घर संँभाले। एक अकेली जान आख़िर क्या-क्या करे . . .? . . . आज से पहले वो कभी इतनी लेट नहीं हुई। आज ज़रूर बाॅस से डांँट पड़ेगी।
किसी तरह बस में सवार हुई, और किनारे की सीट पकड़कर बैठ गई। बस में भी आना-जाना उसे बहुत ही उबाऊ लगता है। पापा अक़्सर कहते हैं, बेटा कोई छोटी कार ही ले लो। मेरा रिटायरमेंट का पैसा तो पड़ा हुआ है ही। समय से घर आओगी और दफ़्तर भी समय से चली जाओगी। आजकल जुग-जमाना बहुत ही ख़राब हो गया है। रात को छोड़ो आजकल दिन-दहाड़े हत्या और बलात्कार हो रहे हैं। तुम जब बाहर निकलती हो तो मेरा जी बहुत घबराता है। कल मैंने अख़बार में पढ़ा था कि दिल्ली में एक बुज़ुर्ग महिला के साथ रेप हो गया है।
लेकिन, मेघा बहुत ही स्वाभिमानी है। ये उसके पिता भी बख़ूबी जानते हैं। वो, अपने कमाये हुए पैसों से सब कुछ ख़रीदती है। घर भी अब उसके पैसों से ही चलता है। किसी प्राइवेट कार का लोन फाइनांस वाली कंपनी में काम करती है।
वो छेड़छाड़ से भी डरती है। अकेली औरत सबको ‘मुफ़्त’ का माल लगती है। कोई हाथ छूने का बहाना ढूंँढ़ता है। कोई कमर या कूल्हे! एक दिन बस में किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया था। खड़े रहने का सहारा ढूँढ़ते हुए। वो सब समझती है। ये और बात है कि कभी किसी से कुछ कहा नहीं। मिस्टर देशमुख उस दिन फ़ाइल लेने के बहाने उसका हाथ पकड़ना चाहते थे। उसने तब देशमुख को डपट दिया था, “आपको शर्म नहीं आती देशमुख जी, आप बाल-बच्चों वाले आदमी हैं। आपकी पत्नी को जब ये सब पता चलेगा तब उसको कैसा लगेगा? मैं आपकी बेटी की उम्र की हूँ। मुझे घिन आती है, आप जैसे लोगों से।” और वो फ़ाइल फेंककर चली गई थी। फिर, उस दिन के बाद वो आज तक देशमुख के केबिन में कभी नहीं गई। जब कोई फ़ाइल देनी होती तो, पियून के हाथों भिजवाती है देशमुख सर के केबिन में। देशमुख और, उसके जैसे लोग मेघा को फूटी आंँखों नहीं सुहाते।
कंडक्टर ने आकर टोका, “टिकिट . . . टिकिट . . . टिकट . . . लीजिए।”
मेघा की तँद्रा टूटी। उसने टिकिट लिया, और रेज़गारी पैसा अपने पर्स से निकालकर कंडक्टर की ओर बढ़ाया।
किसी को शायद उतरना था। कोई परिवार वाला आदमी था। बस कुछ देर तक यूँ ही खड़ी रही। पहले लगेज उतारा गया। बस काफ़ी देर वहाँ खड़ी रही।
सामने ढेर सारी सुहागिन औरतें वट वृक्ष की पूजा कर रहीं हैं। लाल-नारंगी साड़ियों में वो सब कितनी सुंदर लग रहीं हैं। आपस में बोलती-बतियातींं हँसी-ठहाके लगातीं। माँग में केसरिया सिंदूर नाक से लेकर, माँग तक भरा हुआ है। कितनी हँसी ख़ुशी से जीवन भरा हुआ है इनका। इस पृथ्वी पर सुख और दु:ख एक ही साथ पलते हैं। अलग-अलग लोग एक ही समय में उसको जीते हैं।
मेधा का गला रुँध आया है। एक टीस उसके अंदर पैदा होने लगी है। उसके अंदर एक घाव है जो रह-रहकर टीसता है . . . ऐसे मौक़े उसको बैचैनी से भर देते हैं।
♦ ♦ ♦
उसके जीवन में अब तक दु:ख ही दु:ख भरे थे, लेकिन, उसके जीवन में इधर दो महीने से एक सुख का पौधा अंकुरने लगा है। निशांत से उसकी मुलाक़ात इसी बस में हुई थी। दफ़्तर से लौटते वक़्त। वो उसके बग़ल में ही किसी बीमा कंपनी में काम करता है। अभी नया-नया ही आया है, इस शहर में। एकदम नये उम्र का लड़का है, निशांत। ऑफ़िस से लौटते वक़्त उससे चार-बजे इसी बस में रोज़-रोज़ मुलाक़ातें होने लगी थीं।
मुलाक़ातों का ये सिलसिला जब लंबा चला तो एक दिन मोबाइल पर बातचीत भी होने लगी।
“हाय,” मोबाइल पर पहला मैसेज निशांत ने ही किया था।
“हैलो . . . अब तक सोये नहीं . . .?” मेघा ने लिखा।
“नहीं, नींद नहीं आ रही है,” कुछ सोच रहा हूंँ।
“क्या सोच रहे हो . . .?” मेघा बोली।
“नहीं, जाने दो तुम बुरा मान जाओगी,” निशांत बोला।
“अच्छा, ठीक है, नहीं मानूँगी। अब, बोलो भी . . .!” मेघा ने मनुहार किया।
“बहुत दिनों से मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ,” निशांत बोला।
“बोलो, क्या बोलना चाहते हो . . .?” मेघा बोली।
“कैसे कहूँ? मुझसे कहा नहीं जा रहा है,” निशांत बोला।
“अब, कह भी दो। कोई बात कह देने से मन का बोझ हल्का हो जाता है,” मेघा बोली।
निशांत ने किसी तरह हिम्मत की और अपना मैसेज पूरा किया, “आई लव यू मेघा . . .” लेकिन, ऐसा लिखते ही उसका दिल बल्लियों उछलने लगा।
उधर, से मेघना का कोई जवाब नहीं मिला।
निशांत परेशान हो गया। वो मेघा के मैसेज का बहुत देर तक इंतज़ार करता रहा कि उसका कोई जवाब मिले। इस चक्कर में उसे सारी रात नींद नहीं आई। वो, रह-रहकर सारी रात मोबाइल चेक करता रहा।
एक दिन बस से लौटते वक़्त निशांत मेघा से बोला, “मुझे साँवला रंग बहुत पसंद है।”
“क्यों . . .?” उसने निशांत से ऐसे ही पूछ लिया था।
“क्योंकि, मुझे बादल बहुत पसंद हैं जो कि, काले होते हैं। घटाएँ भी बहुत पसंद हैं क्योंकि, वो स्याह होती हैं, और मेघा यानी वर्षा भी मुझे बहुत अच्छी लगती है। ये तीनों, स्याह होते-होते काले हो जाते हैं। वर्षा के कारण ही इस धरती पर जीवन है, हरियाली है। इसलिए मुझे साँवला रंग बहुत पसंद है।”
निशांत द्वी-अर्थी भाषा में बोल रहा था। जिसे मेघा ने ताड़ लिया था।
“और, क्या पसंद है तुम्हें . . .?” मेघा बस का फ़र्श आँखों से छीलते हुई बोली।
“तुम्हारी आँखों का स्याहपन और कत्थई रंग,” निशांत, मेघा का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला था।
मेघना अपना हाथ धीरे से निशांत के हाथ से छुड़ाते हुए बोली थी, “इन कत्थई रंग के ख़ूबसूरत आँखों और रंगों के रूमानियत में मत बहो निशांत। रंग आदमी को हमेशा धोखा दे जाते हैं, और आदमी भी समय के साथ रंग बदलने लगता है।”
मेघा थोड़ा रुककर बोली, “और, बादल और घटाएँ धरती के दु:ख को ही देखकर रोते हैं। धरती की छुपी हुई आँखेंं आसमान हैं। धरती का दु:ख जब आसमान से नहीं देखा जाता तो वो बादल और घटाओं की आड़ लेकर रोता है,” और, सचमुच मेघा की आंँखें भींगने लगी थीं। वो अपनी आँखें पोंछते हुए बोली, “तुम्हें मालूम है, मैं तलाक़शुदा हूँ . . . और मेरे दो बच्चे भी हैं।”
“हाँ जानता हूँ।”
“फिर भी तुम मुझसे शादी करोगे . . .?” मेघा उसी अंदाज़ में बोली।
“हांँ, फिर भी तुमसे ही शादी करूँगा। तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो। और . . . और . . . मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ . . . आइ लव यू . . . मेघा।”
“और, तुम्हारे घर वालों को कोई एतराज़ नहीं है . . .?” मेघा बोली।
“मैं बचपन से अनाथ हूँ। एक बूढ़ी चाची हैं। उन्होंने ही मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया है। उनको मैंने बताया था। उनको कोई एतराज़ नहीं है,” निशांत बोला।
“आई लव यू जैसा सस्ता और हल्का शब्द प्रेम के लिए मत यूज़ करो निशांत, प्लीज़।”
और तब, मेघा ने टालने की ग़रज़ से कहा था, ”“मैं सोचकर बताऊँगी। अपने पापा से पूछकर।”
“मुझे, इसका बेसब्री से इंतज़ार रहेगा,” निशांत बस से उतरते हुए बोला था।
♦ ♦ ♦
अभी और तीस मिनट लगेंगे ऑफ़िस पहुँचने में। उसने एक बार फिर, घड़ी पर नज़र डाली। अभी तो साढ़े दस ही बजे हैं। अभी आधा घंटा और लगेगा ऑफ़िस पहुँचने में।
. . . और अचानक उसकी नज़र बस के साइड मिरर पर पड़ गई। साँवला सा चेहरा। चेहरे पर उदासी पुती हुई थी। सांँवलापन एकाएक उसके पूरे बदन में एक ज़हर की तरह फैल गया, और उसका पूरा बदन ग़ुस्से से सुलगने लगा, “राईज़ एंड लवली, क्रीम किस लिए चाहिए तुम्हें . . .? गोरा होने के लिए . . . हुँह . . .! जब भगवान ने तुम्हें साँवला बना दिया है, तो तुम रोज़ी की तरह कभी गोरी नहीं हो सकती। तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करती . . .?” मनोज, मेघा की एक छोटी सी डिमांड पर ग़ुस्से से बिफरते हुए बोला था।
“क्या, यही कारण है कि तुम रोज़ी से शादी करना चाहते हो। मेरा रंग ख़राब है इसलिए?” मेघा बोली।
“कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन मैं रोज़ी से शादी करूँगा, और हर हाल में करूँगा। अब हर चीज़ का कारण बताना मैं तुम्हें ज़रूरी नहीं समझता,” मनोज, पलंग से उठकर खिड़की के पास चला गया, और नीचे बालकनी में देखने लगा।
और, उस दिन के बाद वो, वापस कभी मनोज के पास नहीं गई। अपने दोनों बच्चों, आदि और अवंतिका के साथ वो अपने पिता के घर पर ही रह रही थी।
♦ ♦ ♦
और, इस बीच उसने, अपने पिता से निशांत के बारे में बताया था। कि वो उससे शादी करना चाहता है। रंजीत बाबू अपनी बेटी के समझदारी के क़ायल थे। एक ग़लती उनसे अपनी ज़िन्दगी में मनोज जैसे दामाद को पाकर हुई थी। वो, अपनी ग़लती का पश्चाताप भी करना चाहते थे।
उस दिन ऑफ़िस गई, और वापस आ गई।
इस तरह साल भर बीत गया। पतझड़ के बाद फिर, से वसंत आया। पेड़ पर नये पत्ते आये। बाग़ गुलज़ार हो गया।
और, मेघा ने निशांत को अपने घर बुलाया, और अपने पिता जी से मिलवाया। रंजीत बाबू, निशांत के प्रगतिशील सोच से बहुत प्रभावित हुए। अगले दिन निशांत को खाने पर बुलाया। सिन्हा साहब भी मेघा और निशांत की जोड़ी को देखकर बहुत ख़ुश हुए, और दोनों को ख़ूब आशीर्वाद दिया।
आज, मेघा आईने के सामने खड़ी होकर ख़ुद को निहारने लगी . . . गुलाबी, सूट में वो किसी परी से कम नहीं लग रही थी। आँखों में काजल, दोनों हाथों में लाल-लाल चूड़ियाँ, शाखा-पोला, पांँव में आलता नयी सैंडल। उसने गालों पर राईज़ एंड ग्लो क्रीम लगानी चाही, लेकिन, कुछ सोचकर वो रुक गई। निशांत ने तो मुझे ऐसे ही पसंद किया था, और, वो अपनी नई, ख़रीदी स्कूटी पर सवार होकर निशांत से मिलने होटल पहुंँच गई।
निशांत, आज बड़ी बेसब्री से होटल सन-साईन में मेघा का इंतज़ार कर रहा था। उसने एक टेबल मेघा और अपने लिए पहले से ही बुक कर रखा था। काले-कोट-पैंट में निशांत भी ख़ूब फब रहा था। आते ही उसने मेघा को बुके देकर उसका स्वागत किया। फिर, पूछा, “क्या फ़ैसला किया तुमने . . .?”
मेघा बुके लेते हुए बोली, “वही, जो पहले था। सोचकर बताऊँगी।” और हो-हो करके हँसने लगी।
आज बहुत दिनों के बाद निशांत ने मेघा के चेहरे पर हँसी देखी थी। वो, भी बिना मुस्कुराये नहीं रह सका।
फिर, वो निशांत से बोली, “मेरे बच्चों को तुम अपना नाम दोगे, आई मीन तुम उन्हें अपनाओगे ना। उनकी ज़िम्मेवारी लोगे?”
“हाँ, तुम्हारे साथ-साथ मैं तुम्हारे बच्चों को भी अपनाऊँगा, और, तुम्हारी ज़िम्मेवारी भी उठाऊँगा,” निशांत मेघा के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए बोला।
और, दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
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Rajnandan Singh 2022/07/01 01:40 PM
अच्छी कहानी।