चोट
कथा साहित्य | लघुकथा महेश कुमार केशरी15 Jun 2022 (अंक: 207, द्वितीय, 2022 में प्रकाशित)
बहुत देर बाद नीरव बाबू को होश आया था। शायद वो चूक गये थे। आस-पास के सभी लोग भी जाने पहचाने थे। विवेक, मंटू, पुष्कर, उनके तीनों बेटे। और उनके जान पहचान और जाति सेना वाली संस्था से जुड़े उनके तमाम जाने-पहचाने चेहरे भी आसपास ही थे। रामानुज बाबू, शांतु कुमार ये जाति सेना के अजेय सिपाही थे।
धुँधलाती नज़रें जब कुछ सीधी हुईं तो सामने की बेड पर मतीन मियाँ को देखा। स्लाइन वाले ग्लूकोज की बूँदें जैसे मतीन मियाँ के वुजूद में ज़िन्दगी भर रही थीं।
नीरव बाबू की भृकुटि तन गई। तमतमाते हुए बोले, “ये मनहूस यहाँ क्या कर रहा है? इसकी शक्ल देख लो तो दिनभर खाना नसीब नहीं होता है। विधर्मी कहीं का! नीच!”
“बाबा आप, आराम कीजिए। डाॅक्टर ने आपको ज़्यादा बोलने के लिए मना किया है,” विवेक, उनका बड़ा बेटा उनको तकिये पर लिटाते हुए बोला।
“वैसे भी, आपकी जान मतीन चाचा के कारण ही बच पाई है। जब आपको गाड़ी ने चौराहे पर धक्का मारा था। तो यही मतीन चाचा आपको अपनी बेकरी वाले टेंपो पर लादकर अस्पताल लाये थे। और अस्पताल में आपके ब्लड ग्रुप का ख़ून भी नहीं था। तब मतीन चाचा ने ही आपको ख़ून देकर आपकी जान बचाई थी।”
नीरव बाबू को जैसे सोते से किसी ने जगाया था। वो ताउम्र छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, धर्म-मज़हब की कुंठाओं के बीच जीते आ रहे थे। उन्हें आज एक अदने-से विधर्मी मतीन ने बचा लिया था।
हे भगवान! ये कितना बड़ा पाप वो लगातार करते आ रहे थे। उन्हें उनकी आत्मा ने धिक्कारना शुरू कर दिया। झूठे आडंबरों-कुंठाओं में कितना लताड़ते रहे उस भले आदमी को।
पता नहीं उन्हें क्या सूझा। वो उठकर बिस्तर से नीचे उतरे और मतीन मियाँ को अपनी बाँहों में अंकवार लिया। कमज़ोरी की वजह से वो लडखडा़ये लेकिन तभी मतीन मियाँ ने उन्हें थाम लिया।
फिर, मतीन मियाँ बोले, “अमां यार बेहोश होकर गिर जाओगे। अभी तुम्हारे चलने के दिन नहींं हैं।”
नीरव बाबू अपने आपको सँभालते हुए बोले, “बेहोश तो अबतक था। अब होश में आया हूँ। मतीन मिंयाँ।” और दोनों बूढ़े हो-हो कर हँसने लगे।
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