तर्पण
कथा साहित्य | लघुकथा महेश कुमार केशरी1 Oct 2022 (अंक: 214, प्रथम, 2022 में प्रकाशित)
विवेक की मौत ठंड लगने की वजह से हो गयी थी। दाह-संस्कार से घर लौटकर आते हुए भी तन्मय ने एक बार वही सवाल अपने दादा, गोपी बाबू के सामने दोहराया था। जिसे बार-बार गोपी बाबू टाल जाना चाह रहा थे।
वो कैसे जवाब देते? अभी तो वे, अपने इकलौते बेटे की मौत के सदमे से उबर भी नहीं पाये थे। अपने बेटे की लाश को कंधा देना हर बाप के लिये दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है। गोपी बाबू का कंठ भीगने लगता है, जब कोई विवेक की बात करता है।
क़रीब सप्ताह भर पहले भी घर की सफ़ाई के वक़्त उसने वही सवाल दुहराया था, “दादा, आप घर की सफ़ाई क्यों करवा रहे हैं? उस दिन भी आप लोगों ने पापा के मरने के बाद पूरे घर को धुलवाया था। पंडित जी से पूछा, तो उन्होंने कहा कि मरने के बाद मरे हुए आदमी के कारण घर अपवित्र हो जाता है। इसलिये हम घर की साफ़-सफ़ाई करते हैं। उसे धोते हैं।”
पूरे घर में चारों तरफ़ पेंट की गंध फैली हुई थी।
तन्मय के कार चलाते हुए हाथ अचानक से तब रुक गये। जब उसने गोपी बाबू को अपना सिर मुँड़वाते हुए देखा। हैरत से ताकते हुए उसने अपने दादा गोपी बाबू से पूछा, “दादा आप सिर क्यों मुँड़वा रहे हैं?”
गोपी बाबू पीढ़े पर अधबैठे और झुके हुए ही बोले, “बेटा, ऐसे ही।”
“ऐसे ही कोई काम नहीं होता बताइये ना,” तन्मय ज़िद करते हुए बोला।
इस बार गोपी बाबू बेबस हो गये। फिर वे बोले, “बेटा जब हमारा कोई अपना गुज़र जाता है तो उसको हम अपनी सबसे प्यारी चीज़ अर्पित कर देते हैं। ये हमारा उस व्यक्ति के प्रति हमारी निष्ठा का सूचक होता है। हमारे यहाँ के संस्कार में इसे तर्पण कहते हैं। इस मामले में हमारे बाल हमारी सबसे प्यारी चीज़ों में से एक होते हैं। इसलिये हम अपने बाल मुँड़वाकर अपने पूर्वजों से उऋण होते हैं। उनको सम्मान देते हैं। उनसे ये वादा भी करते हैं कि उसके मरने के बाद उसके बचे हुए कामों को हम पूरा करेंगे। बालों का मुँडन उस मृतक व्यक्ति के प्रति हमारा शोक भी होता है।”
तन्मय ने गोपी बाबू से फिर पूछा, “कैसा शोक दादा? एक तरफ़ हम छुआ-छूत और बीमारियों के डर से अपना बाल मुँड़वा लेते हैं और, शोक का नाम देते हैं। ये हमारा आडंबर नहीं है तो क्या है? पापा के मरने के बाद हम अपने घर को धुलवा रहे हैं। उस पर पुताई करवा रहे हैं। जैसे, पापा मरने के बाद हमारे लिये अछूत हो गये हों। जीते जी उन्होंने इस घर के लिये और हमारे लिये कितना कुछ किया। मैंने एक बार कहा और वो मेरे लिये लैपटॉप ले आये। मम्मी के लिये स्कूटी ख़रीदी। ये घर बनाया। सारी ज़िंदगी मेहनत करते रहे। और मरने के बाद हमारे के लिये अछूत हो गये। कितने मतलबी हैं, हम लोग! जहाँ उन्हें लिटाया गया उस जगह को पानी से धोया गया। घर के ऊपर चूना, वार्निश पेंट-पुचारा हो रहा है। आपके-हमारे बालों का तर्पण हो रहा है। छि: कितनी ख़राब ये है ये दुनिया!” तन्मय के चेहरे पर हिक़ारत के भाव उभर आये थे।
गोपी बाबू का कंठ अपने पोते की बातें सुनकर रुँधने लगा था। वो सच ही तो कह रहा था।
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