अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

बरसों पहले

बरसों पहले एक युवा हृदय में
एक ओर, कुछ कर गुज़रने की
अदम्भ चाह और उत्साह था
और दूसरी ओर,
भावनाओं के ज्वार के साथ साथ था,
आत्मविश्वास का नितांत अभाव तथा
अनजान भविष्य के प्रति आशंकायें।

 

ऐसा भी सुना था कि, कभी-कभी,
असंभव भी संभव हो जाया करते हैं
कि, मानव के स्पर्शमात्र से
पत्थर भी जीवन धारण करते हैं।
कि, पारस के स्पर्शमात्र से
लौह भी स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है।
सुना तो था, पर विश्वास नहीं था।

 

आज, बरसों के पश्चात्‌
ऐसा प्रतीत होता है कि
इस जगत में सब सम्भव है।
विगत के कुछ वर्षों के अनुभव ने
यह सिद्ध कर दिया है कि
मनुष्य के जीवन में जहाँ एक और विधि है,
वहीं दूजी ओर अमृत भी।

मानवीय सम्बन्धों की पारस मणि
स्पर्श हो, पत्थर भी सोना बन जाता है,
शूल भी फूल बन जाते हैं
तभी तो यह सम्भव हुआ कि
उस आशंकित दुर्बल हृदय व्यक्ति के
पग पग पर आते शूल
फूल में परिवiर्तत होते गये,
आत्मविश्वास, क्रमश: बढ़ता गया,
सारी आशंकायें निर्मूल सिद्ध हुईं
जिसके पारसमय स्पर्श से
यह परिवर्तन सम्भव हुआ,
उसी को समर्पित है -
ये सारे उद्‍गार - सुमन!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

व्यक्ति चित्र

हास्य-व्यंग्य कविता

स्मृति लेख

कविता

बच्चों के मुख से

पुस्तक समीक्षा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं