अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

हलधर नाग का काव्य संसार

अछूत–(101-208) 


अयोध्या देश के राजा दशरथ के
सबसे बड़े पुत्र राम
जटा बाँधकर घूम रहे जंगल
खाकर कच्चे केंदु, आम॥101॥
 
तेज़ी से चले गए गुरु
कहकर आधा-अधूरा
शबरी के मन में हुआ अफ़सोस
सुन गुरु के शब्द अधूरे॥102॥
 
इस शरीर में देंगे दर्शन
राम देंगे दर्शन
ये शब्द कानों में प्रतिध्वनित होने से
मन हो गया बेचैन॥103॥
 
शिष्यों को बुलाकर गुरु ने सौंपा
आश्रम का भार
योगासन में बैठ योग-ज्योति से
जलकर हो गए खार॥104॥
 
गुरु के जाने के दिन से शबरी का
मन नहीं लगता अब
कहकर गए हैं राम के दर्शन
दर्शन होंगे कब?॥105॥
 
गुरु के वचन तो पत्थर की लकीर
निश्चित ही होंगे राम दर्शन
इस उलझे पथरीली मार्ग को
कर देती हूँ समान॥106॥
 
सुखी जीवन जीने वाला राजकुमार
कोमल होंगे पाँव के तलवा
नुकीले पत्थर और कंकड़
चुभेगा पाँवों में मलबा॥107॥
 
लग्न से रास्ता किया साफ़
कँटीली झाड़ियों हटाकर
कोमल पत्ते फैला दिए
रास्ते के चारों ओर॥108॥
 
चट्टान पर बैठकर मन से
बनाती राम के चित्र
चौदह भुवन के कर्ताधर्ता
राम होंगे मेरे मित्र॥109॥
 
खुली आँखों से देखूँगी
गोल चेहरे का दर्पण
घुँघराले बाँधों को बाँध
करूँगी तरह-तरह जतन॥110॥
 
अपनी भौंहों को ऊपर-नीचे कर
मेरे प्रभु मुस्कुराएँगे गलगल
दोनों नयन लगेंगे जैसे
पदम फूल युगल॥111॥
 
माखन जैसी स्निग्ध देह पर
लगाऊँगी एक बार अपना हाथ
सीधे उनके पकड़ूँगी पाँव
एक घड़ी नहीं छोड़ूँगी साथ॥112॥
 
पाँव पकड़कर रोने से
जानेंगे प्रभु मेरे
पीठ थपाकर पूछेंगे
“शबरी, क्या दुख है तेरे?”॥113॥
 
अमृत की तरह मधुर शब्दों से
पेट मेरा जाएगा भर
ज़ोर-ज़ोर से रोकर कहूँगी, भगवान
तुम्हारी तलाश में रही हूँ मर॥114॥
 
तुम अपना सिर खुजलाओगे
भेदभाव नहीं तुम्हारे पास बिलकुल
अछूत शबरी को क्यों छू लिया तुमने
डूब जाएगा तुम्हारा कूल॥115॥
 
फिर वह सोचने लगी, “कितनी भुलक्कड़ मैं
क्या कर रही विचार
भूखे-प्यासे मेरे भगवान राम
आ रहे पैदल चलकर॥116॥
 
तेज़ धूप में उनका कोमल शरीर
हो जाएगा लाल
पूरे शरीर से टपक रहा होगा
बूँद-बूँद झाल॥117॥
 
अस्थिर मन से हडबड़ाकर भागी
दबाकर टोकरी अपने काँख
फलों के पेड़ नीचे झुककर
खड़े हो गए बाँक॥118॥
 
गुच्छे-गुच्छे फलों का भार
पके रसीले मधुर
मुझे उठाओ जैसे कह रहे हो
नीचे कमर तक झुककर॥119॥
 
ऋतु-समय की परवाह किए बग़ैर
अदिन फले फल
लता के लता पर लटक रहे
छूने को धरातल॥120॥
 
खजूर, कटहल, कुर्लु, कुसुम
केंदू, अमरूद, बेल, आम
पीपल, पंकेल, खस, अंजीर
कंठऊ, कुर्ली, जाम॥121॥
 
सब प्रकार के फलों से उसकी
भरी टोकरी
बुदई पत्तों से ढककर ध्यान से
रखी टोकरी॥122॥
 
उसे याद आया पूरे रास्ते चलने से
राम का गला गया होगा सुख
फल कैसे खाएँगे वे? 
जब तक पानी न जाएगा मुख॥123॥
 
दौड़ते जाकर तुरंत लाई
पानी की मटकी
ठंडा करने के लिए मटकी को रख
बालू में, देखती टकटकी॥124॥
 
शिष्यों ने ताना मारा एक दिन
बोले, “अरे, शबरी
झूठ बात कह ठगा गुरु ने
फिर भी मान रही हो, शबरी”॥125॥
 
युगों-युगों से जोगी साधु
कैसे-कैसे योगी मुनि
जिस राम दर्शन के लिए
मर रहे हैं हरगुनि॥126॥
 
बिना जप-तप के राम
देंगे तुम्हें दर्शन? 
इतना भरोसा है तुम्हें
गुरु के वचन?॥127॥
 
चित्रकूट की तलहटी में
जाकर करो इंतज़ार
भगवान राम आएँगे सीधे
तुम्हारी छोटी कुटीर?॥128॥
 
“नज़रअंदाज़ मत करो, शबरी
तुम्हें वहाँ मिलेंगे राम
कहीं वे रास्ता नहीं भूल जाए जंगली
लताओं पर पड़ते ही क़दम॥129॥
 
दाँत दिखाते हुए सभी लगे हँसने
पर शबरी को लगता है सत्य
अकाल पड़े या बाढ़ आए
गुरु के वचन नहीं होंगे असत्य॥130॥
 
नाक की सीध वह चलती गई
हाज़िर हो गई चित्रकूट
घनघोर जंगल में मनुष्य के
न कोई स्वर, न स्फुट॥131॥
 
लंबे-लंबे गगनचुंबी पेड़ों के
चढ़ गई वह शिखर
बैठी वहाँ बगुले की तरह
फिराने लगी चारों तरफ़ नज़र॥132॥
 
लंबी पैदल यात्रा से थककर
बैठ गए होंगे किसी पेड़ के तले
चराचर जंगली जीव-जंतु
बता दो मुझे, राम का पता तो चले॥133॥
 
सूर्यास्त के समय भी परेशान
पेड़ से नीचे उतरती
इधर-उधर देखती कुटिया में लौटती
राम-राम पुकारती॥134॥
 
भोर से साँझ तक
और साँझ से भोर तक
नींद, भूख-प्यास
मन में नहीं विचार॥135॥
 
भूख ने कहा, “अरे शबरी! 
क्या तुम्हें नहीं स्मरण? 
कई दिनों से खाना नहीं खाया
कैसे बचेगा तुम्हारा जीवन?”॥136॥
 
प्यास ने कहा, “नहीं खाती हो फिर भी
कम से कम पी लो कुछ नीर
बेचैन मन शांत होगा
लगेगा कुछ बेहतर”॥137॥
 
नींद कहती, “अरे शबरी
आ जाओ फिर से मेरी कोल
कई दिनों से तुम नहीं सोई
सो जाओ सब-कुछ भूल”॥138॥
 
यह सच है कितने दिनों से
खाई नहीं कुछ मैं
एक पलक तक न झपकी
कैसे रहूँगी जीवित मैं?॥139॥
 
अगर मैं सो गई तो प्रभु आकर
लौट जाएँगे किसी रोज़
मेरा उपवास भी व्यर्थ और प्रार्थना भी
फिर मैं उन्हें नहीं पाऊँगी खोज॥140॥
 
“नहीं, मैं तुम तीनों को जानती हूँ
तुम तीनों हो कालपाश
जो तुम्हें पालते हैं
उनका करते सत्यानाश”॥141॥
 
भाग जाओ भूख, भाग जाओ प्यास
भाग जा नींद भाग
प्रभु से मेरे मिलन तक
नहीं फटक आसपास॥142॥
 
पहाड़ी के नीचे किसी पेड़ पर
कोयल कूकी, कूही कूही
भागी शबरी, क्या राम ने पुकारा? 
मगर दिखा, वहाँ राम नहीं॥143॥
 
दिन के उजाले की तरह रात
बादलों से झाँकता चाँद
कुछ दूर से उसकी निगाह पड़ी
पगडंडी के पास कोई खड़ा॥144॥
 
मन ही मन चकित होकर लगी देखने लगी
वहीं से आ रहे हैं राम
सीधे भागी, देखा उसने
था वह एक ठूँठ द्रूम॥145॥
 
सूखे पत्तों की सरसराहट
जैसे कोई चल रहा हो
ध्यान-भंग हो लौटी जीवन
कहीं राम रास्ता न भूल गए हो॥146॥
 
आवाज़ सुनकर दौड़ी शबरी
हिरण भाग गया डरकर
न काम में मन, न उत्साह
व्यग्र हो भटकती इधर-उधर॥147॥
 
फिर उसने सोचा अगर यहाँ रही कहीं
कहीं सब पर पानी न फिर जाए
प्रभु दूसरे मार्ग से आ सकते हैं
कुटिया में शायद बैठ जाएँ॥148॥
 
लौट कर देखी कुटिया में राम
नहीं आए अभी तक
आते तो उनके पद चिह्न
रेत पर दिखते वहाँ तक॥149॥
 
इधर-उधर के झंझट में नहीं
होगी राम से भेंट
आकर यदि नहीं मिले तो
चले जायेंगे लौट॥150॥
 
मुख्य खंभे पर झुककर
बरामदे में गई रुक
किसी अंग में कोई हलचल नहीं
केवल देखती अपलक॥151॥
 
राम-राम कहते आत्मा उसकी
राम के देह में हो गई लीन
काठ की खड़ी मूर्ति बन
देखती रात-दिन॥152॥
 
सीता को खोकर राम-लक्ष्मण
घूम रहे वन-वन
बिना खाए-पिए घूम रहे राम
हो गए कई दिन॥153॥
 
पीछे लक्ष्मण किसी आड़ में
नहीं आ रहे नज़दीक
जल्दी-जल्दी चल रहे थे राम
एकदम सीधे अपनी नाक॥154॥
 
लक्ष्मण ने कहा, “रुको
इतनी जल्दी क्यों, भैया राम? 
चलते-चलते अकड़ गए पाँव
चलो, थोड़ी देर कर ले विश्राम”॥155॥
 
“कोई मुझे खींच रहा है, लक्ष्मण
पकड़कर मेरी गर्दन
तान रही है ज़ोर से मुझे
शबरी कर अपने जतन”॥156॥
 
लक्ष्मण ने कहा, “भाई
तुम्हारे शब्द लग रहे अर्थहीन
चौदह भुवन जिनके अंदर
कैसे हो सकता है वह शक्तिहीन?”॥157॥
 
“जिस शबरी में इतनी ताक़त! 
जो ले रही राम को तान
सूर्पनखा के नाक की तरह
काट दूँ इसके कान”॥158॥
 
राम ने कहा, “अरे, लक्ष्मण
तुम बात कर रहे हो जैसे हो मूर्ख
सौ राम को दबा सकती है
अकेली शबरी अपने काँख”॥159॥
 
“तुम देख नहीं सकते कितनी मज़बूती से
बँधा हूँ मैं उसके प्रेम-बंधन
सुत भाव से कहूँगा शबरी
ढीली कर दो मेरी गर्दन”॥159॥
 
चित्रकूट की सीमा जैसे ही
पार किए लक्ष्मण-राम
क़तारबद्ध हो कंकड़-पत्थर
कहते राम, राम॥160॥
 
पगडंडी के दोनों तरफ़ लिखा हुआ
बालू पर राम-राम
लताओं के झुरमुट भी ऐसे लग रहे
जैसे लिखा हो राम नाम॥161॥
 
हिरण, नीलगाय, चीतल, सांभर
बैठ गए घुटनों के बल
करने को राम-दर्शन
नतमस्तक भक्त-वत्सल॥162॥
 
अपनी सतरंगी पूँछ फैलाकर मोर
कर रहा था पंखा ज़ोर
चंअरी गाय चँवर झुलाती
लोमेश पूँछ लहराकर॥163॥
 
बेंगराज पक्षी कह रहा था
“हे राम, मुझे संसार से मुक्त कर” 
तोता बोला, “श्री चक्रधर, 
हे चक्रधर, कमला के वर”॥164॥
 
सारे जंगल में राम, राम
देखा चकित लखन
राम के सेवकों में सोच रहा था
अपने को सबसे महान॥165॥
 
राम आ रहे हैं, राम आ रहे हैं, 
हर जगह फैल गई ख़बर
जल्दी-जल्दी सजा दिए शिष्यों ने
अपना आश्रम अति सुंदर॥166॥
 
केले के पेड़ गाढ़े जगह-जगह
लगाया आम की पत्तियों के तोरण
जयराम कहते हुए गए
सुस्वागतम, राम-लखन॥167॥
 
आगे और पीछे खड़े हो गए
राम लखन लाल
आश्रम वासी दौड़कर आए
हाथों में लिए फूलमाल॥168॥
 
हाथ उठाकर कहा राम ने
“आश्रमवासी, रहो! 
कहाँ है शबरी का आश्रम
वह मुझे कहो”॥169॥
 
शिष्य ने कहा, “तालाब के उस पार
शबरी का कुटीर
पहले आश्रम घूम-फिरकर
जाएँ फिर उस तीर”॥170॥
 
राम ने कहा, “लौटते हुए
अगर मिला समय तो आऊँगा
मुख्य काम तो शबरी का स्थान
नहीं जाने से नहीं चलेगा”॥171॥
 
तेज़ी से आगे बढ़कर राम-लखन
शबरी को किया नमन
लक्ष्मण ने सोचा, इस शबरी के लिए क्यों
राम के मन में इतना सम्मान॥172॥
 
जानबूझकर शबरी
भरने लगी स्वाँग
न पूछा, न उत्तर दिया
बाँहों में पकड़ लिया खूटांग॥173॥
 
खर-खर दन-दन लखन ने
कहीं कठोर बात
“तुम्हें शबरी पसंद है, भाई
मगर वह है घिनौनी औरत जात”॥174॥
 
“अरे, लक्ष्मण! तिलक चंदन
ललाट की शोभा
गिरते पड़ते जाना, नाम-कीर्तन
यह तो मात्र लोक-दिखावा”॥175॥
 
भीतर यदि हिंसा-अहंकार
कूर-कपट, धोखा, छल
भले ही, वे मुझे आजीवन पुकारे
नहीं मिलूँगा उन्हें बिल्कुल॥176॥
 
माटी के पुतले जैसी शबरी से
करते हो ईर्ष्या
ख़ून, मांस, हड्डियों को भेदकर
मानस-पटल पर छाई वह शिष्या॥177॥
 
सबकी अंतरात्मा में बँधकर
रहता हूँ हर काया
जिस पोखरी में स्फटिक पानी
उसमें दिखती मेरी छाया॥178॥
 
शबरी, शबरी कहकर राम ने
थपथपाई उसकी कमर
चेतना लौट आई उसकी
जैसे सूखे पेड़ पर अंकुर॥179॥
 
जिस राम-रूप को देखा मन में
निर्निमेष नेत्रों से लगी निहारने
तुरंत राम के पैरों में गिरी
लगी जीभ से तलवा चाटने॥180॥
 
जिस तरह से गाय चाटती है
अपने बछड़े को
वही जानती है स्वाद नवजात
बछड़े के शरीर का॥181॥
 
जिस राम के पैर केवट ने
पोंछे धोकर
उस पवित्र पैरों की धूल
शबरी ने रखी संचय कर॥182॥
 
उठो हे शबरी, उठो कहा राम ने
उठाया पकड़ बाँह से
तुरंत खड़ी होकर उसने
राम के हाथ पकड़े ज़ोर से॥183॥
 
जन्म से भूखी को मिला
अपार धन
छोड़ा अगर धन तो और नहीं मिलेगा
डर गया उसका मन॥184॥
 
उसके बाद कहीं चले गए वह
मन को नहीं लगेगा अच्छा
खिलाऊँगी, पिलाऊँगी, अपना दुख बताऊँगी
तब पूर्ण होगी मेरी इच्छा॥185॥
 
कहाँ बैठाऊँगी, कहाँ बैठाऊँगी
आने लगे विभिन्न विचार
भीतर ले जाती, बाहर ले आती
नहीं रह सकी स्थिर॥186॥
 
अंत में राम ने कहा, “हे शबरी
लंबे रास्ते आने से हो गया हूँ क्लांत
आओ दोनों बैठे शान्ति से
करे दुख-सुख की बात”॥187॥
 
“भूख से पेट में चूहे कूद रहे हैं
लाओ, कुछ भोजन
प्यास से गला सूख रहा है
विकल हो रहे प्राण”॥188॥
 
जैसा सोचा, वैसा ही हो रहा था
शबरी का मन ख़ुश
हाथ पकड़कर राम को बिठाया
मएसना कुश॥189॥
 
फलों से भरी टोकरी लाकर रख दी
राम के आगे में, 
बोली, “प्रभु, कुछ खट्टे कड़वे हो सकते हैं
थूक दोगे ग़ुस्से में”॥190॥
 
छाँट-छाँटकर मुझे खिलाने दो
हटाकर कड़वे-खट्टे फल
चक्कर देखा जो लगा स्वादिष्ट
राम के मुँह में दिया डाल॥191॥
 
राम हो गए चकित
शबरी का मुँह देख
गाय के पीछे बछड़ा दूध के ख़ातिर
कवि सालवेग का लेख॥192॥
 
खिलाते-खिलाते गुदा फैंककर
खिला देती छिलके का छोर
राम ने सब-कुछ खाया
भाव में हो विभोर॥193॥
 
राम के पैर पकड़ बोली शबरी
“दुख की बात सुन
मैं किससे कहूँ, क्या बताऊँ, 
दुनिया के अवगुण?”॥194॥
 
नाम की मैं मनुष्य योनि में पैदा हुई
असल कुत्ते से भी हीन
यह बात बताने के लिए
मैं गिन रही थी अपने दिन॥195॥
 
दूर से वे मुझसे बात करते हैं
मेरे पानी के छींटे से डरते हैं
मेरे शरीर से टकराकर अगर हवा भी
उन्हें छूती है तो वे कपड़े धोते है॥196॥
 
“गुरु ने कहा था छप्पन कोटि में
मानव-जीवन ही सार
मिलने-जुलने का फिर क्यों
नहीं मेरा अधिकार॥197॥
 
क्या मैंने किसी की गाय मारी या किया कोई पाप
नाक-भौं वे सिकोड़ते इतना
अछूत कहकर ठुकरा देते मुझे
सारा जगत जितना॥198॥
 
सभी मनुष्यों को बनाने के बाद
बचे-खुचे कीचड़ से, हे विभु
क्या उस मिट्टी से मुझे बनाया? 
मुझे बताओ, मेरे प्रभु!॥199॥
 
मुझे गुरु के पीछे मर जाना चाहिए था
रह गई उनकी बात मानकर
क्या लाभ, क्या उपलब्धि इस जीवन में
सभी ने देखा मुझे हीनमान॥200॥
 
पूरी दुनिया का अभिशाप मैं हूँ
धिक यह जीवन धिक
अछूत जन्म लेकर मुझे
मर जाना ही ठीक॥201॥
 
“किसी का बंधक नहीं है राम
कहीं भी मैं जाता हूँ खिसक
तुम्हारे रस्सी के पाश से बच निकलने का
नहीं था दमख़म या पथ-प्रदर्शक॥203॥
 
“मैंने बहुत कोशिश की पाश को तोड़ने की
मेरी ताक़त हो गई कम
ज़बरदस्ती खींचा चला आया तुम्हारे पास
कौन है दुनिया में तुम्हारे सम?॥204॥
 
“जुगनू की पीठ की चमक का
नहीं उसे पता
तुम्हारे शरीर में जितनी चमक
उसका तो मुझे भी नहीं पता॥205॥
 
“अगर दुनिया कहती है तुम हो
अछूत शबरी
फिर क्यों खिलाया मुझे
अपनी झूठी बेरी?॥206॥
 
“तुम्हारे चाटने से
क्या राम नहीं हुए अपवित्र
फिर भी तुम कहती हो अछूत शबरी
है शबरी अछूत॥207॥
 
अछूत शबरी का खाना खाकर
हुए अछूत राम
नाम पड़ा उस दिन
पतित पावन राम॥208॥

पुस्तक की विषय सूची

  1. समर्पित
  2. भूमिका
  3. अभिमत
  4. अनुवादक की क़लम से . . . 
  5. प्रथम सर्ग
  6. श्री समेलई
  7. पहला सर्ग
  8. दूसरा सर्ग
  9. तीसरा सर्ग
  10. चौथा सर्ग
  11. हमारे गाँव का श्मशान-घाट
  12. लाभ
  13. एक मुट्ठी चावल के लिए
  14. कुंजल पारा 
  15. चैत (मार्च) की सुबह
  16. नर्तकी 
  17. भ्रम का बाज़ार
  18. कामधेनु
  19. ज़रा सोचो
  20. दुखी हमेशा अहंकार
  21. रंग लगे बूढ़े का अंतिम संस्कार
  22. पशु और मनुष्य
  23. चेतावनी 
  24. स्वच्छ भारत
  25. तितली
  26. कहानी ख़त्म 
  27. छोटे भाई का साहस
  28. संचार धुन में गीत
  29. मिट्टी का आदर
  30. अछूत – (1-100)
  31. अछूत–(101-208) 
  32. लालटेन
  33. अग्नि
  34. गर्मी 
  35. बारिश 
  36. पुजारी लुरु के भगवान कालिया
  37. नींद 
  38. छंदा चरण अवतार

लेखक की पुस्तकें

  1. हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श
  2. हलधर नाग का काव्य संसार
  3. शहीद बिका नाएक की खोज दिनेश माली
  4. सौन्दर्य जल में नर्मदा
  5. सौन्दर्य जल में नर्मदा
  6. भिक्षुणी
  7. गाँधी: महात्मा एवं सत्यधर्मी
  8. त्रेता: एक सम्यक मूल्यांकन 
  9. स्मृतियों में हार्वर्ड
  10. अंधा कवि

लेखक की अनूदित पुस्तकें

  1. अदिति की आत्मकथा
  2. पिताओं और पुत्रों की
  3. नंदिनी साहू की चुनिंदा कहानियाँ

लेखक की अन्य कृतियाँ

साहित्यिक आलेख

व्यक्ति चित्र

पुस्तक समीक्षा

अनूदित कहानी

बात-चीत

ऐतिहासिक

कार्यक्रम रिपोर्ट

अनूदित कविता

यात्रा-संस्मरण

रिपोर्ताज

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

विशेषांक में