अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अलाव

 

“रात के 10 बज गए हैं, रात का फ़ीडर आने ही वाला है और सुनो! ‘अलाव’ के लिए दियासलाई भी रख लेना, बहुत ठंड है आज,” रामू के बापू ने फावड़ा कंधे पर रखते हुए कहा। रामू के बापू साठ पार के हैं पर मज़ाल है किसी भी काम के लिए उनके मुँह से ना निकले। कोई भी काम, चाहे अपने वश का हो या ना हो, सबसे पहले निपटाने की पड़ी रहती है उन्हें। आज भी उनकी हालत ठीक नहीं है। रामू के लाख मना करने पर भी फावड़ा कंधे पर रख लिया। कल ही तो बुख़ार उतरा है और आज खेत पर चलने को तैयार हैं।

“आज रहने देंगे तो कोई आफ़त तो आ नहीं जाएगी। मैं सब देख लूँगा, बापू! आज तुम्हारी तबियत भी तो ठीक नहीं है,” रामू ने उनके कंधे से फावड़ा उतारते हुए कहा।

“नहीं, तू अभी ठीक से नहीं जानता है और वैसे भी सर्द रात है, तेरा अकेला जाना ठीक नहीं है, चल अपना कंबल ले और फावड़ा मुझे दे, देर मत कर भाड़े का पानी है,” रामू के बापू ने अपना कंबल सँभालते हुए कहा।

रामू और उसका बापू दोनों खेत की ओर चल दिए। चाँदनी रात थी। हाड़ कँपा देने वाली सर्द हवाएँ चल रहीं थीं। रामू के बापू आगे-आगे चल रहे थे। खेत पर पहुँचते ही भाड़े वाले ने कहा, “जल्दी पाईप ठीक कर लो मैं सबमर्सिबल चालू करता हूँ। पानी चालू हो गया ह। रामू पानी में था जबकि उसके बापू मेढ़ पर बैठ गए थे और अलाव जला लिया था। रामू ने दूसरी क्यारी में पानी मोड़ दिया और बापू के पास आकर हाथ गर्म करने बैठ गया। रामू देखा कि बापू काँप रहे हैं और उसने बापू का हाथ देखा तो उनको तेज़ बुख़ार था।

“मैंने मना किया था न, पर तुम्हें तो काम की ही धुन लगी रहती है। अब कंबल को ठीक से ओढ़ लो। मैं अलाव के लिए कुछ घास-फूस और ले के आता हूँ। कुछ लकड़ी भी लेकर आता हूँ,” रामू ने मेढ़ पर फावड़ा रखते हुए कहा।

“मैं ठीक तो हूँ। तू वैसे ही लगा रहता है। अलाव के पास बैठने से शरीर गर्म हो गया है,” रामू के बापू ने काँपती हुई आवाज़ में कहा।

रामू जैसे ही लकड़ी लेकर अलाव के पास पहुँचा और देखा कि बापू ज़ोर-ज़ोर से काँप रहे थे। उसने अलाव में और लकड़ी डाल दी। ग़रीबी के मारे तीन दिनों से दिखाने भी नहीं जा पाए थे। उसने बापू को ढंग से कंबल से ढाँप दिया। बुख़ार की गोली देकर रामू वापस क्यारी को देखने चला गया। रामू गाँव के ही झोला छाप डॉक्टर से गोली ले कर आया था। आज ज़्यादा तबीयत ख़राब लग रही थी सो गोली दे दी। बापू को थोड़ी नींद आ गई। रामू अगली क्यारी में पानी मोड़ कर वापस फिर बापू के पास आया। थोड़ी बुख़ार में राहत देख कर वापस पानी में चला गया।

बीघा भर खेत ही तो था इनके पास। रामू की माँ को गुज़रे दो वर्ष बीत गए थे। रामू की शादी भी नहीं हुई और बापू की भी तबीयत अब ख़राब रहने लगी थी। रात के 1 बज गए। सर्द हवाओं के साथ अब पाला भी गिरना शुरू हो गया। पाँच-छह क्यारियाँ अब तक भर गयी थीं। रामू बार-बार बापू को देखने आता और तबीयत देखकर वापस फिर पानी देखने चला जाता। ऐसा ही क्रम चलते-चलते सुबह के चार बजने को हो गये। तीन क्यारी बची थीं। अगली क्यारी में पानी मोड़ कर रामू फिर अपने बापू के पास आया। रामू ने जैसे ही अपने बापू के हाथ को देखा तो एक दम से चीख़ पड़ा। क्योंकि बापू की आँखें पथरा गयी थीं और मुँह खुला का खुला ही रह गया था।

अब इस जंगल में वो किसे पुकारे? उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था। भाड़े पर पानी देने वाला मालिक भी तभी पानी चालू कर घर निकल गया था। चाँदनी रात में आक की झाड़ियाँ ऐसे लगती थीं मानो कोई आदमी खड़ा पानी दे रहा हो, लेकिन जैसे ही उसने पुकारा तो कोई नहीं बोला। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि अब वह क्या करे? वह ठंडे पड़े अलाव को जलाने के लिए फिर से लकड़ी और घास-फूस लेने दौड़ा। अलाव पर ताप देने के बाद भी बापू के शरीर में कोई गर्माहट महसूस नहीं हुई।

वह गाँव के डॉक्टर को बुलाने दौड़ा। इतने में सुबह के पाँच बज गए। डॉक्टर को जगा कर खेत पर आने के लिए तैयार करने में साढ़े पाँच बज गए। घने कोहरे में उन्हें पहुँचने में छह बज गए। डॉक्टर ने बापू की नब्ज़ देखी और नब्ज़ बिल्कुल भी नहीं बोली। रामू ने डॉक्टर की ओर आशा से देखा लेकिन डॉक्टर ने नज़र झुका लीं। रामू ज़ोर-ज़ोर से चीख़ पड़ा।

गाँव में सात दिनों में यह पाँचवीं मौत थी। अब तक जेइअन से रात के फ़ीडर को लेकर कई बार शिकायत हो चुकी है। पर हर बार वह यह कह कर पल्लू झाड़ लेता है कि ऊपर से आदेश नहीं है। आदेश होते ही दिन का फ़ीडर चालू हो जाएगा रात का रहेगा ही नहीं। गाँव वाले कलक्टर तक हो आए हैं लेकिन उसने भी कह दिया कि एक सप्ताह ही दिन का फ़ीडर रह सकता है उसके बाद रात का फ़ीडर ही आएगा फिर अगले सप्ताह दिन का हो जाएगा। ऐसा ही क्रम रहेगा . . . यही आदेश है ऊपर से।

गाँव के लोग बहुत ही निराश हैं। जब से उन्हें रामू के बापू की मौत का पता चला है तभी से सभी के मुँह से यही निकल रहा है, “ना जाने कितनी जान और लेगा ये ऊपर से आदेश देने वाला . . . ना जाने कितने अलाव और ठंडे पड़ेंगे इस रात के फ़ीडर में।”

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 तो ऽ . . .
|

  सुखासन लगाकर कब से चिंतित मुद्रा…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

कहानी

लघुकथा

सामाजिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

लेखक की पुस्तकें

  1. प्रेम का पुरोधा