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कविता मेरे लिए ज़्यादा कुछ नहीं

कविता मेरे लिए ज़्यादा कुछ नहीं
हृदय के उद्गारों को
काग़ज़ पर उतारने की प्रक्रिया भर है। 
 
कविता मेरे लिए ज़्यादा कुछ नहीं
विचारों के तूफ़ान में भटकी हुई
बुद्धि के लिए मार्गदर्शक भर है। 
 
कविता मेरे लिए ज़्यादा कुछ नहीं
सर्द पूर्णिमा रात की बहती समीर में
आह्लादित होती चाँदनी भर है। 
 
कविता मेरे लिए ज़्यादा कुछ नहीं
दो जवाँ दिलों में उठे सैलाब को
थामने के लिए बाँध भर है। 
 
कविता मेरे लिए ज़्यादा कुछ नहीं
अनन्त ज्ञान के सागर में भटके हुए
पाठक के लिए 'कंपास' भर है। 
 
कविता मेरे लिए ज़्यादा कुछ नहीं
तन्हा ढलती शामों में
सूर्यास्त की अरुणता भर है। 
 
कविता मेरे लिए ज़्यादा कुछ नहीं
सृजन हृदय की क्षुधा को शांत करने के लिए
झटपट तैयार की हुई गर्म चाय भर है॥

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