एक सीट ख़ाली है
काव्य साहित्य | कविता डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
(दुर्घटना में मृत बेटे के लिए माँ का विलाप)
मैंने तुझे कोख में नहीं,
आँसुओं में पाला था।
हर धड़कन पर हाथ रखकर
डर-डर कर सँभाला था।
रातों को करवट बदलती
तेरी साँसें गिनती थी,
दर्द सहकर, भय सहकर
मैं तुझको इस दुनिया में लाई थी।
तेरे पहले रोने से
मेरा आकाश खुला था,
तेरी पहली हँसी ने
मुझे माँ बना दिया था।
पिता ने तुझे आँखों का तारा कहा,
धूप में अपना साया बनाया,
तेरी साइकिल के पीछे-पीछे
अपने सपने को दौड़ाया।
स्कूल का पहला दिन,
तेरी काँपती उँगली,
कॉलेज की पहली जीत,
तेरी चमकती आँखें—
आज भी
दीवारों से झाँकती हैं।
और फिर एक दिन . . .
बस एक दिन . . .
एक लापरवाही,
एक तेज़ रफ़्तार,
और तू चला गया।
न कोई विदा,
न आख़िरी बात।
फोन बजा था,
पर आवाज़ नहीं थी—
सिर्फ़ सन्नाटा था।
आज तेरी थाली
चुपचाप रखी जाती है,
तेरी कुर्सी
ख़ाली होकर भी भरी लगती है।
तेरी तस्वीर हँसती है,
और मैं हर दिन
अपने भीतर
रुदन ढोती हूँ।
बेटा,
तू चला गया,
पर साथ ले गया
मेरी नींद,
मेरी हँसी,
मेरी आवाज़।
तेरे पिता
आँखों में आँसू नहीं रखते,
वे उन्हें भीतर
पत्थर की तरह जमा लेते हैं।
रात को
मेरे आँचल में
चुपचाप टूट जाते हैं।
नई पीढ़ी से
एक माँ की विनती है—
मौज करो,
हँसो,
जियो . . .
पर ज़िंदगी को
लापरवाही मत बनाओ।
रात का नशा
और तेज़ रफ़्तार
एक पल में
माँ की गोद को
शून्य कर देते हैं।
यह कविता नहीं,
यह एक माँ का रुदन है।
एक ऐसा विलाप
जिसमें शब्द नहीं,
सिर्फ़ साँसें बची हैं।
अगर मेरी यह आवाज़
किसी एक माँ को
यह कहने से बचा दे—
“मेरा बेटा . . .” तो समझना
मेरा लाल“
थोड़ा-सा जी उठा।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और असली हक़ीक़त
- अपराध की एक्सप्रेस: टिकट टू अमेरिका!!
- अस्त्र-शस्त्र
- आओ ग़रीबों का मज़ाक़ उड़ायें
- आहार दमदार आज के
- एमबीबीएस बनाम डीआईएम
- कचरा संस्कृति: भारत का नया राष्ट्रीय खेल
- काम क्यों करें?
- गर्म जेबों की व्यवस्था!
- चंदा
- जनसंख्या नियंत्रण: अब कोई योजना नहीं, बस हालात
- झुकना
- टमाटर
- ड्रम युग: आधुनिक समाज का नया फ़र्नीचर
- ताक़तवर कौन?
- देश के दुश्मनों की देशभक्ति
- पेट लवर पर होगी कार्यवाही
- मज़ा
- यमी यमी मिल्क राइस
- रीलों की दुनिया में रीता
- रफ़ा-दफ़ा
- विदेश का भूत
- विवाह आमंत्रण पिकनिक पॉइंट
- विवाह पूर्व जासूसी अनिवार्य: वरमाला से पहले वेरिफ़िकेशन
- संस्कार एक्सप्रेस–गंतव्य अज्ञात
- सावित्री से सपना तक . . .
- होली का हाहाकारी हाल: जब रंगों ने पहचान ही मिटा दी!
- क़लम थामी जब
कविता
- अपने हक़ को जाने
- एक सीट ख़ाली है
- कान्हा
- गांधारी का मौन रहना
- नदी
- नदी और नारी
- पापा की यादें
- प्रार्थना
- बस रह गई तन्हाई
- माता–पिता की वृद्धावस्था: एक मौन विलाप
- मानव तुम कहलाते हो
- शिक्षक
- सभ्यता के कफ़न में लिपटी हैवानियत: एक महाकाय व्यंग्य
- सावन आया
- सावन मनभावन
- स्त्री—हर युग में कटघरे में
- हमारे वृद्ध
- हिंदुस्तान महान है
हास्य-व्यंग्य कविता
अनूदित कविता
नज़्म
चिन्तन
कहानी
लघुकथा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं